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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 530 में से

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पृष्ठ 343

[Page Header: २९४ आत्मतत्त्वविवेके]

घादसाधारण्याद्वा । न च विपर्ययोऽपि परेष्या प्रवर्तत इति ।
कः पुनरवयविनि न्यायः ? तत् किं प्रत्यक्षात्न्यायो
गरीयान् ? यद्येवम्, बुद्धावेव१ कोऽसौ ? तस्मादसारमेतत् ।
तथापि, यन्निरस्तसमस्तविरुद्धधर्माध्यासं तदेकमेव व्यव-
हर्तव्यं, यथा विज्ञानम् । तथा च विवादाध्यासित एकस्थूलो-
ऽनुभवगोचर इति स्वभावहेतुः, तन्मात्रानुबन्धित्वादेकता-
व्यवहारस्य । न ह्ययमेकव्यवहारो निर्निमित्तोऽनियमप्रस-

घटको मैं सावयव मानता हूँ, इस आधारपर भी तुम विपर्ययका उपन्यास
नहीं कर सकते । क्योंकि दूसरेकी मान्यताके आधारपर विपर्ययकी
प्रवृत्ति नहीं हुआ करती है ।

अवयवीकी सिद्धिमें न्यायप्रदर्शन

प्रश्न—अवयवीके सम्बन्धमें प्रत्यक्ष अनुभव प्रमाणके रहनेपर भी
उसमे अनुमान प्रमाण क्या है ? बताओ ।
उत्तर—क्या प्रत्यक्षसे अनुमान श्रेष्ठ है ? यदि है तो तुम्हारे
विज्ञानमें भी क्या अनुमान है ? क्योंकि विज्ञानको तुम अनुमानके
बिना ही स्वसंवेद्य मानते हो । अतः उक्त प्रश्न सारहीन है । अर्थात्
अवयवीके बारेमें प्रत्यक्ष-अनुभवको सर्वथा दोषरहित सिद्ध कर चुका
हूँ । साथ ही अनुमानका अङ्गभूत व्याप्तिका ग्राहक प्रत्यक्ष ही है ।
इसलिये अवयवीमे प्रत्यक्ष अनुभव प्रमाणके रहते अनुमान प्रमाणकी
जिज्ञासाका कोई महत्त्व नहीं है ।
तथापि इसमें अनुमान भी यह है कि—जो समस्त विरुद्ध धर्मोंके
अध्याससे रहित है वह एक ही है, ऐसा व्यवहार करना चाहिये, जैसे
तुम्हारा विज्ञान । वैसे ही विवादका विषय तथा एक स्थूलके रूपमे अनु-
भवका गोचर (विषय) घट भी विरुद्धधर्माध्याससे रहित है । इस प्रकार
घटमें विरुद्धधर्माध्यासरहितत्व हेतु स्वभावतः है । क्योंकि एकत्वका
व्यवहार विरुद्धधर्माध्यासराहित्यमात्रकी अपेक्षा करता है । कारण,


१. बुद्धावपि कोऽसौ इति १ पु० पा०