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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 337

३८८ आत्मतत्त्वविवेके
अस्तु तर्हि क्षणमात्रस्थायी स्थूलोऽर्थ इति चेन्न, भाग-
भागिनोर्युगपदुपलम्भबाधितत्वात्, घटपटादिभङ्गे तन्तुकपा-
लादीनामुत्पाद समानोपादानतया सप्रतिघत्वव्याघाताच्चेति ।
सोऽयमधिकरणसिद्धान्तन्यायेन स्थूलत्वसिद्धौ क्षण-
भङ्गभङ्गः ।
यदि कहो कि—प्रत्यक्षत्वकी उपपत्तिके लिये स्थूल वस्तु रहे किन्तु
यह भी क्षणिक ही होगी—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि अवयव
और अवयवी दोनोंकी एककालमे उपलब्धि होनेसे क्षणिकत्वका बाध
हो जाता है । अर्थात् जिस कालमें स्थूल अवयवीका प्रत्यक्ष होगा,
उस काल तक उसका अवयव भी साथ साथ विद्यमान रहेगा, अतः दो
क्षणपर्यन्त उस अवयवके अनुवर्तमान रहनेके कारण क्षणिकवाद वहीं
खण्डित हो गया । एव उत्पत्तिके अग्रिम क्षणमे ही जो घटपटादि नष्ट
हो गया उसका उपादान कारण तन्तु और कपालादि है । तथा वही
तन्तुकपालादि घटपटादिकी भङ्गावस्था मे उत्पन्न तन्तुकपालादिका भी
उपादानकारण है, क्योंकि तुम्हारे मतमे विसदृश सन्तान और सदृश
सन्तान दोनों ही मान्य हैं। ऐसी स्थितिमें एक ही तन्तुकपालादिमाल
घटपटादिका और भङ्गावस्था में उत्पन्न होनेवाली तन्तुकपालादिमालका
भी उपादानकारण होगी, किन्तु यह अनुचित है । क्योंकि समानदेशमें
दो मूर्तोंका रहना व्याहत है ।
इस प्रकार स्थूलत्वकी सिद्धि हो जानेपर अधिकरणसिद्धान्तके
न्यायसे क्षणभङ्ग ( क्षणिकत्व ) का भी अनायास भङ्ग ( खण्डन ) हो
जाता है । अर्थात् स्थूलत्व सिद्ध होता हुआ स्थैर्यको लेकर ही सिद्ध
होता है । क्योंकि पूर्वोक्तरीतिसे अवयव और अवयवीकी एक साथ
उपलब्धिकी दशामे जो स्थूलत्वकी उपलब्धि है, वही स्थिरत्व सिद्धिमे
पर्यवसित हो जाती है । यद्यपि जहाँ अनुमानद्वारा किसी वस्तुकी
सिद्धि करते समय पक्षधर्मताब्रलसे अन्य वस्तुकी सिद्धि हो जाती
है, वहीं अधिकरणसिद्धान्त लागू होता है, यहाँपर तो स्थूलत्वका
प्रत्यक्षद्वारा व्यवस्थापन किया गया है, अतः यहाँ अधिकरणसिद्धान्त
नहीं लागू होगा । फिर भी उसके तुल्य तो इसे कहा ही जा सकता