आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 348, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽपरिस्फुरतीति तु नियमः । न च क्वचिदपि भेदाभेदावुभावपि
तत्त्वं यतस्तथा स्यादित्येषा दिक् ।
नापि सर्वस्यायथार्थत्वात् , तद्ग्राहकस्य यथार्थत्वा-
यथार्थत्वाभ्यामुत्तरविरोधात् । तत् किञ्चित् प्रमाणं किञ्चिद-
प्रमाणमिति विभाग एव वस्तुगतिः । न चासौ प्रतीतिगति-
मनूद्य व्यवहारगोचरः ॥
अभेदारोपके प्रति दोष कारण है तथा उनमें भेदज्ञानके प्रति दोषाभाव
कारण है । अतः जब दोष और दोषाभावरूप कारण एक साथ नहीं
रह सकते तो अभेदारोप और भेदज्ञानरूप कार्य भी युगपत् कैसे होने
लगेंगे ? हा, आरोपके लिये यह नियम अवश्य है कि दोषके साथ साथ
वहाँ वस्तुतत्त्वका अस्फुरण भी रहना चाहिये । इसलिये जहाँ शुक्तित्व
का ज्ञान रहेगा, वहाँ चाकचिक्यादि-दोषके रहनेपर भी अभेदारोप नहीं
होगा । एव शुक्ति-रजतका भेद तात्त्विक है, इसलिये भेदका अस्फुरण
(अग्रह) भी अभेदारोपके लिये अपेक्षित है । किन्तु शुक्ति रजतका
अभेद तो अतात्त्विक है, इसलिये उसका अस्फुरण (अग्रह) भेदज्ञानके
लिये सर्वथा अनुपयोगी है । अतः अभेदका अग्रह होनेसे पूर्वोक्त भेद-
ज्ञान (भेदारोप) का प्रसङ्ग नहीं दे सकते । क्योंकि कहीं भी भेद
और अभेद दोनों तात्त्विक नहीं होते, जिससे कि वैसा प्रसङ्ग दिया जा
सके । इसका दिङ्मात्र निर्देश किया गया ।
“सभी ज्ञान अयथार्थ होते हैं, इसलिये तथ्यातथ्यका विभाग अनुपपन्न
है” यह भी नहीं कह सकते । क्योंकि अयथार्थत्वका ग्राहक जो ज्ञान
है, वह स्वयं यथार्थ है या अयथार्थ है ? इन प्रश्नोंका जो भी उत्तर दोगे
उससे तुम्हारे उक्त कथनका विरोध हो जायगा । अर्थात् अयथार्थत्वका
ग्राहक ज्ञान यदि स्वय यथार्थ हो तो वही एकज्ञान यथार्थ हो गया, फिर
सभी ज्ञान अयथार्थ कहाँ हुए ? यदि अयथार्थत्वका ग्राहक ज्ञान स्वय
अयथार्थ है तो उसका विषयभूत पूर्वज्ञात यथार्थ सिद्ध हो गया । इस
प्रकार सब ज्ञान अयथार्थ कहाँ हुए ? इसलिए कुछ ज्ञान प्रमाण (यथार्थ)
होते हैं और कुछ अप्रमाण (अयथार्थ) होते हैं, यही वस्तुस्थिति
है । साथ ही इस प्रकारका प्रमाण अप्रमाणका विभाग वैसी प्रतीतिके