आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[वाह्यार्थभङ्गवादः २९३]
त्वात् । तस्माद् येन रूपेण यस्य पक्षत्वं विवक्षितम् तेन सिषा-
धयिषितधर्मविरोधविवादाभ्यां तत्रानुमानप्रवृत्तिर्नातोऽन्यथेति ।
नापि द्वितीयः, विपर्ययापर्यवसानात् । न च विवाद-
विषयो निरवयवस्तस्मान् सन्निति विपर्ययः, न चैवं सावय-
वत्वं पक्षस्यानिच्छता प्रवर्तयितुं शक्यते । न च तत् त्वयेष्यते ।
न च तस्येष्टौ तेनासत्त्वं शक्यसाधनम् , आश्रयासिद्धेर्विरो-
भी नहीं हो सकता । क्योंकि तुम्हारे द्वारा प्रमा माने गये निर्विकल्पक
ज्ञानमें भी सत्त्व-हेतुके रहनेसे यह हेतु व्यभिचारी है । इसलिये
जिस रूपसे जो पक्ष हो, उस रूपसे जहाँ सिषाधयिषित धर्म ( साध्य )
का बाध न हो तथा संशय हो, वहीं अनुमानकी प्रवृत्ति हो सकती है
अन्यथा नहीं ।
प्रसङ्गरूप ( तर्करूप ) द्वितीय पक्ष भी नहीं हो सकता है । क्योंकि
तर्कमें विपर्ययमें पर्यवसान होना आवश्यक है, किन्तु यहां विपर्ययमें पर्य-
वसान नहीं हो सकता है । जैसे, "घट यदि सत् हो तो निरवयव हो"
इस तर्कका पर्यवसान इसी विपर्ययमें होगा कि—विवादका विषय घट
निरवयव नहीं है, इसलिये सत् भी नहीं है । किन्तु जो बौद्ध घटरूप
पक्षको सावयव नहीं चाहता, वह इस प्रकारके विपर्ययको नहीं
प्रवृत्त कर सकता है । तुझे तो घटका सावयवत्व इष्ट नहीं है ।
यदि इष्ट भी हो तो उससे ( सावयवत्वके द्वारा ) उसमें ( घटमें )
असत्त्वका साधन भी नहीं हो सकता है । क्योंकि यहां आश्रयासिद्धि,
विरोध और असाधारण्य दोष उपस्थित हो जायेंगे ।
अर्थात् "घटः असन् सावयवत्वात्" इस विपर्ययसिद्धिमें सावयवत्व-
हेतुका आश्रय ही तुम्हारे मतसे असत् है, अतः आश्रयासिद्धि दोष हुआ ।
यदि उस दोषसे बचनेके लिये आश्रयको सत् मानो तो "असन्" इस
साध्यके साथ विरोध हो जाता है । साथ ही सावयवत्व-हेतुके असत्-
रूपमें प्रसिद्ध शशशृङ्गादिरूप सपक्ष और सत् रूपसे प्रसिद्ध विज्ञान,
परमाणु आदि विपक्ष, दोनों ही से व्यावृत्त होने तथा घटादिरूप पक्ष-
मात्रमें वर्तमान होनेके कारण असाधारण्य दोष हो जाता है । एवं,