आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
३५२ आत्मतत्त्वविवेके
पाणौ कम्पमाने शरीरं न कम्पत इति प्रत्ययात् ।
अथवा यो यदाश्रिततयोपलभ्यते स तस्मिंश्चलत्य-
चलोऽपि चल एव विभाव्यते दर्पणमुखवत् जलचन्द्रवच्चेत्यपि
द्रष्टव्यम् ।
कृतं प्रतीतिकलहेन, एवमपि सर्वत्र चल एवोपलभ्येतेति
चेन्, चलत्यवयवे सर्वत्र तथैवेति न किञ्चिदनुपपन्नम् । अचले
तु कथं तथोपलभ्यताम् ?
तथापि चलाचलाश्रयस्य चलाचलतया प्रतीतौ चलाचल-
जलचन्द्रवत् द्वैतप्रत्ययोऽपि स्यादिति चेन्, स्यादपि यद्याश्रय-
विच्छेदः स्यात् । न ह्येकस्मिन्नेव जलेऽविच्छिन्नावयवभेदेन
"तब तो क्रियाशील अवयवोंपर आश्रित भी अवयवी स्वयं निष्क्रिय ही
मालूम होना चाहिये" ऐसा दोष दो तो यह मेरे लिये अनिष्ट नहीं है ।
क्योंकि हाथ कँपनेपर भी शरीर नहीं कँपता है, यह सबको अनुभव है।
अथवा, जो जिसके आश्रित होकर उपलब्ध होता है, वह उसके चलते
समय अचल होते हुए भी चल ही मालूम होता है। जैसे, चञ्चल
दर्पणमें प्रतिबिम्बित मुख एवं चञ्चल जलम प्रतिबिम्बित चन्द्रमा स्वयं
अचल होते हुए भी चलता हुआ मालूम होता है, यह भी देखना
चाहिये ।
"कहीं चल और कहीं अचल, इस प्रकारकी विभिन्न प्रतीतियोंका
कलह क्यों हो ? सर्वत्र चल ही क्यों न प्रतीत हो" यदि ऐसा कहो तो
यही उत्तर होगा कि जो जो अवयव चलते हैं, वहाँ वहाँ सर्वत्र ही वह
अवयवी चल ही प्रतीत होता है इसमें कोई अनुपपत्ति नहीं है। किन्तु
अचल अवयवोंमें वह चल क्योंकर प्रतीत होगा ?
'तो भी चल-आश्रयमें चल और अचल आश्रयमें अचलरूपमे अव
यवीकी प्रतीति मानी जाय तो, जैसे चञ्चल जलमें चल प्रतीत होते
हुए और निश्चल जलमे निश्चल प्रतीत होते हुए चन्द्रमामे द्वैतबुद्धि होती
है अर्थात् चन्द्रमा दो मालूम देता है, वैसे ही चल और अचल अव-
बाह्यार्थभङ्गवादः [L] २५३
द्विचन्द्रभ्रमो नाम । किन्तु स एवैकस्थले चल उपलभ्यतेऽचले
त्वचल इति । वीचिषु सोऽपि सहस्रनिभ इति चेत्, एव-
मेतत्, तासां विच्छेदेनाकलनात् ।
अस्तु तर्हि चलाचलयोर्युतसिद्धिप्रसङ्ग इति चेन्न, स्वयं
प्रतिबन्धासिद्धेः । न च प्रसङ्गे व्याप्तावपि पराभ्युपगमः
शरणम् । न चैवं पराभ्युपगमोऽपि । वस्त्रोदकादौ दृश्यते
तावदयमिति चेन्न, तन्तुवस्त्रादौ विपर्ययस्यापि दर्शनात् ।
यवोमे आश्रित अवयवी भी दो मालूम होना चाहिये” ऐसा कहो तो,
यह हो भी सकता है, यदि आश्रयोंका परस्पर विच्छेद हो जाय ।
क्योंकि जिसका अवयव विच्छिन्न नहीं हुआ है, ऐसे एक ही जलमे
दो चन्द्रमाका भ्रम कभी नहीं होता । किन्तु एक ही चन्द्रमा चल
जलमे चल प्रतीत होता है और अचल जलमे तो अचल । यदि कहो
कि—तरङ्गोंमे तो वह भी हजारके समान मालूम देता है—तो हाँ,
ऐसा ही होता है । क्योंकि वहाँ तरङ्गें भी हजाररूपमे विच्छिन्न हुई
मिलती हैं ।
यदि कहो कि—हाथकी चलावस्थामे शरीर यदि अचल ही रहे तो
हाथ और शरीर दोनोकी युतसिद्धि होने लगेगी । अर्थात् हाथ और
शरीर दोनो परस्पर असम्बद्ध होते हुए भी कायम रहें—तो इस प्रकारका
आपादन क्षणिकवादी नहीं कर सकता है । क्योंकि स्वयं क्षणिकवादके
अनुसार चलाचलत्व और युतसिद्धत्वमे व्याप्ति ही असिद्ध है । अर्थात्
हाथ और शरीरमे युतसिद्धत्वकी सिद्धिके लिए दोनोंको कम से कम
तीन क्षण तक स्थायी मानना पड़ेगा । जैसे, प्रथम क्षणमे दोनोंका
परस्पर सम्बद्ध होकर रहना, द्वितीय क्षणमे हाथका चल होकर शरीरसे
अलग होना और तीसरे क्षणमे दोनोंका असम्बद्ध होकर कायम रहना ।
किन्तु क्षणिकवादमे एक क्षणसे अधिक किसी वस्तुकी सत्ता ही नहीं
रहता, फिर तदनुसार युतसिद्धत्वका आपादन क्षणिकवादी कैसे कर
सकता है ?
यहाँ ऐसा नहीं कह सकते कि—प्रसङ्ग देनेमे व्याप्तिके बारेमें भी
२१४ आत्मतत्त्वविवेके
इदं मिथ्येति चेत्, तत् कथं सत्यम् ? अबाधादिति चेत्,
इह तर्हि बाधकान्तरं वाच्यम् । चलाचलत्वमेवेति चेन्न, युत-
सिद्धावपि१ किमिति नेदं बाधकमिति विपर्ययस्यापि वक्तुं
शक्यत्वादिति ।
दूसरेकी स्वीकृति से ही काम चल जायगा । अर्थात् चलाचलत्वरूप
आपादकद्वारा युतसिद्धत्वरूप आपाद्यका प्रसङ्ग देनेमे क्षणिकवादी उक्त
आपादक और आपाद्यमें स्वयं व्याप्तिको न मानते हुए भी नैयायिकद्वारा
स्वीकृत व्याप्तिकी ही शरण लेकर आपादन कर देगा—क्योंकि प्रसङ्गरूप
तर्कमे दूसरेद्वारा सिर्फ आपादककी ही स्वीकृति अपेक्षित होती है, न
कि आपादक और आपाद्यकी व्याप्तिकी भी । अतः व्याप्तिके बारेमे
नैयायिककी स्वीकृतिसे काम नहीं चलेगा । क्षणिकवादीको स्वयं
व्याप्तिकी सिद्धि चाहिये । किन्तु क्षणिकवादमे यह असम्भव है।
साथ ही जो चलाचल होता है, वह युतसिद्ध (असम्बद्ध होते हुए भी
विद्यमान) होता है, इस व्याप्तिको नैयायिक भी नहीं मानता, फिर
उसकी शरण ली भी कैसे जा सकती है ?
यदि कहो कि—वस्त्र और जलमे तो युतसिद्धि देखी जाती है।
अर्थात् वस्त्रसे जलके स्खलित हो जानेपर भी दोनो असम्बद्ध होते
हुए विद्यमान रहते हैं, अत उक्त व्याप्तिको अवश्य स्वीकार करना
होगा—तो ऐसा नहीं हो सकता । क्योंकि तन्तु और वस्त्रमे विपरीत
भी देखा जाता है ; अर्थात् तन्तु और वस्त्रके चलाचल होनेपर भी
उनमें असम्बद्ध-विद्यमानता नहीं होती है ।
यदि कहो कि—वहाँ तन्तु और वस्त्रमे सम्बद्धताकी अनुभूति मिथ्या
है—तो यहाँ वस्त्र और जलकी असम्बद्धताकी अनुभूति कैसे सत्य है ?
यदि कहो, अबाधित होनेसे सत्य है—तो तन्तुवस्त्रस्थलमे कोई बाधक
दिखाना चाहिये । यदि कहो कि—तन्तु और वस्त्रका चल अचल होना
ही उनकी सम्बद्धत्वानुभूतिका बाधक है—तो यहाँ चलाचलत्व तन्तु और
वस्त्रके असम्बद्धविद्यमानताका ही बाधक क्यों न होगा ? ऐसा विपरीत
भी कहा ही जा सकता है । अर्थात् विपक्षमे बाधक दिये बिना केवल
१. युतसिद्धावेव इति ३ पृ० पा०
बाह्यार्थभङ्गवादः २५५
रक्तरक्तविरोध इति चेन्न, भ्रान्तत्वात् । तन्मूलरागि-
द्रव्यसंयोगासंयोगविरोधोऽस्त्विति चेन्न, परमाणुवादिनं प्रति
प्रागेव परिहृतत्वात् । इतरं प्रति का वार्तेति चेत्, सैव तावत्,
तथैवाविरोधात् । प्रकारभेदेनापि विरोधाभ्युपगमे व्याप्तेर-
सिद्धेः, संयोगतदभावयोरेवासिद्धेः ।
महच्चारमात्रस चलाचलत्व और युतसिद्धत्व (असम्वद्ध-विद्यमानत्व)
में व्याप्ति निश्चय नहीं हो सकता है ।
यदि कहो कि—रक्त और अरक्तका विरोध अवयवीका बाधक
होगा । अर्थात् जहाँ पटका कुछ भाग रक्त हो और कुछ भाग अरक्त
हो, यहाँ यदि एक अवयवी माना जाय तो एक ही वस्तुमे रक्त और
अरक्त दो विरोधी स्वरूपकी प्रतीति नहीं होनी चाहिये, किन्तु होती है।
अतः एक अवयवी मानना असंगत है—तो ऐसा नहीं कह सकते ।
क्योंकि यहाँ “रक्तः पट.” यह प्रतीति ही भ्रान्त है । अर्थात् पट वस्तुतः
अरक्त ही है । उसके अवयवोंमें ही कुछ रक्त होते हैं और कुछ
अरक्त । अतः विरोध कहाँ है ?
यदि कहो कि—पटमें रक्तत्वभ्रमका मूल जो रङ्गद्रव्यका संयोग है,
उसीको लेकर विरोध होगा । अर्थात् उसी पटमे रङ्गका संयोग भी है,
जिससे वह रक्त मालूम पड़ता है । तथा रङ्गका संयोगाभाव भी है,
जिससे कुछ हिस्सोंमें अरक्त भी है । इस प्रकार एक ही वस्तुमें रङ्ग-
संयोग और रङ्गसंयोगाभावके भी होनेमें विरोध होनेसे अवयवीकी सिद्धि
नहीं हो सकती है—तो ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि ज्ञानातिरिक्त-
परमाणुवादीके प्रति क्षणभङ्ग खण्डनके अवसरपर ही इस आक्षेपका
परिहार किया जा चुका है ।
यदि पूछो कि—विज्ञानवादी (परमाणुको भी विज्ञानस्वरूप ही
माननेवाले) के प्रति क्या बात है ?—तो उसके प्रति भी यही बात
है । क्योंकि प्रकारभेदसे अविरोधकी उपपादिका युक्ति यहाँ भी समान
ही है। यदि प्रकारभेदसे भी संयोग और संयोगाभावके होनेमें विरोध
मानो, तो स्वयं संयोग और संयोगाभावनामकी वस्तु ही सिद्ध नहीं
होगी। फिर यह तुम्हारी व्याप्ति कैसे सिद्ध हो सकेगी कि "पटमें यदि
२५६ आत्मतत्त्वविवेके
सिद्धौ वा प्रकारभेदा विरुद्धस्वाभावसादेश्यापरित्यागात्।
न चैवं पदार्थान्तरवैधर्म्येण संयोग एव निराकर्त्तव्यः, तद्वै-
धर्म्येण तेषामेव निराकरणप्रसङ्गात्।
न चैवमेव न्याय्यम्, नियमवता हि सत्यवैधर्म्येणेतर-
निराक्रियते, असत्यवैधर्म्येण सत्यत्वस्यैव निर्वाहात्, निषेध्य-
संयोग और संयोगाभाव दोनों होंगे तो पट एक अभिन्न अवयवी न होकर
विभिन्न अवयवोंका समुदायरूप हो जायगा"। अर्थात् संयोग और
संयोगाभाव दोनों तभी सिद्ध होंगे जब प्रकारभेदसे दोनोंके रहनेमें कोई
विरोध न हो। किन्तु प्रकारभेदसे भी उन दोनोंके रहनेमें यदि विरोध
ही हो, तो वे स्वयं असिद्ध हो जायेंगे और आपकी उक्त व्याप्ति भी
असिद्ध हो जायगी।
यदि तो प्रकारभेदमे संयोग और संयोगाभावकी सिद्धि मानते हो तो
प्रकारभेदसे संयोगका अविरोधी जो संयोगाभाव, उसका संयोगके साथ
समानदेशमे रहना भी कहाँ छूटा ? अर्थात् पटको एक अवयवी मानते
हुए उसमे प्रकारभेदसे ( अवयवभेदसे ) रङ्गसंयोग और रङ्गसयोगाभाव
दोनोंके रहनेमे कोई बाधा नहीं है।
यहाँ ऐसा भी नहीं कह सकते कि- यद्यपि सयोग संयोगाभावका
विरोधी नहीं है किन्तु सयोगाभावका वैधर्मी अवश्य है, इसलिये पटमे
सयोगका ही निराकरण कर देना होगा-क्योंकि उसी न्यायसे सयोगका
वैधर्मी होनेसे सयोगाभावका ही निराकरण क्यो न होना चाहिये ?
अर्थात् वैधर्म्यके कारण वस्तुओंके तादात्म्यका निराकरण होता है न कि
उनके स्वरूपका ही। क्योंकि वैसा होनेपर सभी वस्तुओंमें परस्पर
वैधर्म्य होनेसे सभी पदार्थोंका निराकरण होकर सर्वशून्यत्वका प्रसङ्ग
हो जायगा।
यहाँ ऐसा नहीं कह सकते कि-सब पदार्थोंका निराकरण एव सर्व
शून्यता ही न्यायसङ्गत है-कारण, जहाँ सत्यके साथ बिल्कुल साधर्म्य
न हो किन्तु नियतरूपसे सत्यका वैधर्म्य ही रहे, वहीं सत्यसे इतर
असत्यका निराकरण हो जाता है। असत्यका वैधर्म्य होनेपर तो
सत्यता ही सिद्ध हो जाती है। अर्थात् संयोगमें सत्ता, गुणत्व,
बाह्यार्थभङ्गवादः २५७
प्रतीतिनान्तरीयकत्वाच निषेधसिद्धेः । शशविषाणादौ
कल्पितेन निषेध्येन निषेधसिद्धिरिति चेन्न, निराकृतत्वात्,
संयोगस्य वाङ्मात्रेण काल्पनिकत्वसिद्धावतिप्रसङ्गाच्च ।
शशशृङ्गन्यायस्य च योग्यानुपलम्भाभावेनासिद्धेः । इत एव
बाधकात् तत्सिद्धावितरेतराश्रयत्वम् ।
अभिधेयत्व, प्रमेयत्व आदि सत्यसाधर्म्य भी हैं, अतः नियमतः सत्य-
वैधर्म्य नहीं होनेसे संयोगका स्वरूपतः निराकरण नहीं हो सकता है।
तथा उसमें यदि असत्यका वैधर्म्य मानो तो सुतरां सत्यत्व सिद्ध हो
जायगा।
एवं, निषेध्यवस्तुकी प्रतीतिके बिना निषेधकी प्रतीति नहीं हो सकती,
इसलिये भी संयोगका निषेध करनेके लिये निषेध्यरूपमें संयोगकी सत्ता
माननी ही पड़ेगी।
यदि कहो कि—शशशृङ्गके निषेधस्थलमें शशशृङ्गरूप निषेध्यके
कल्पित होनेपर भी निषेधकी प्रतीति हो जाती है, वैसे ही संयोगको
कल्पित मानते हुए भी उसका निषेध सिद्ध हो सकता है—तो ऐसा नहीं
कह सकते। क्योंकि पूर्वमें क्षणिकत्वसिद्धिके लिये दिये गये व्यतिरेकी
अनुमानके खण्डनप्रकरणमें यह बात खण्डित हो चुकी है। एव, बिना
प्रमाणके केवल वचनमात्रसे यदि संयोग काल्पनिक हो जाय तो सर्वा-
नुभूत नीलपीतादि भी काल्पनिक हो जायँगे। साथ ही योग्यानुपलम्भ
नहीं होनेसे शशशृङ्गका न्याय यहाँ नहीं लागू हो सकता है। अर्थात्
शृङ्ग तो महिषादिमें प्रत्यक्षयोग्य है, अतः शशमें उसका अनुपलम्भ
होनेसे शृङ्गका अभाव सिद्ध हो जाता है। किन्तु प्रत्यक्षयोग्य जो
घटादिका संयोग, उसका अनुपलम्भ नहीं होने पर संयोगाभावकी
सिद्धि नहीं हो सकती है। तथा जो संयोग प्रत्यक्षके अयोग्य है, जैसे
परमाणु आदिका संयोग, उसका अनुपलम्भ होनेपर भी योग्यतारूप
विशेषणके नहीं रहनेसे योग्यानुपलम्भ वहाँ भी नही हुआ, इसलिये उस
संयोगका भी अभाव नहीं सिद्ध हो सकता है।
यदि कहो कि—संयोगके काल्पनिक होनेसे संयोगाभाव सिद्ध है
और इसीसे संयोगका योग्यानुपलम्भ भी सिद्ध हो जायगा—तो यहाँ
१७
२५८ आत्मतत्त्वविवेके
शब्दप्रत्यभिज्ञानवत् संयोगप्रतीतेरन्यथोपपत्तिमात्रेण बा-
धकप्रवृत्तिरिति चेन्न, अनुभवस्य तदनुरूपमुपाधिमुखपिण्डम-
दत्त्वा भ्रान्तत्वेनान्यथोपपत्तौ तद्विपरीतानुमानप्रवर्तनेऽग्नाव-
नुष्णत्वानुमाने प्रवृत्तिप्रसङ्गात् । न च प्रत्यभिज्ञानस्य
सामान्यवत् संयोगप्रत्ययस्य तदनुरूपमुपाध्यन्तरमस्ति ।
अन्योन्याश्रयदोष आ जायगा । क्योंकि संयोगाभाव सिद्ध होनेपर
योग्यानुपलम्भ सिद्ध होगा और योग्यानुपलम्भके सिद्ध हो चुकनेपर ही
संयोभाव सिद्ध हो सकेगा ।
यदि कहो कि—शब्दप्रत्यभिज्ञाके जात्यालम्बन होनेके कारण जैसे
शब्दनित्यत्वबाधक प्रमाणकी प्रवृत्ति हो जाती है, वैसे ही संयोगप्रतीतिकी
भी अन्य प्रकारसे उपपत्ति हो जानेके कारण संयोगबाधक प्रमाणकी
प्रवृत्ति हो जायगी । अर्थात् ' स एवायङ्गकार " यह प्रतीति गत्वजाति
विषयक होनेसे गकारोंकी अभिन्नताको विषय नहीं बनाती है, इसीलिए
शब्दनित्यत्व नहीं सिद्ध हो पाता है, वैसे ही दो द्रव्योंकी अव्यवहित
देशमें उत्पत्ति ही संयोगप्रतीतिका कारण है । अतः संयोगकी भी सिद्धि
नहीं हो सकती है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि अनुभवके
अनुरूप किसी उपाधिरूप मुखपिण्डको बिना उपस्थित किये उस अनुभव
को भ्रामक बताकर उसकी अन्यथा उपपत्ति की जाय और अनुभवके
विपरीत अनुमानकी प्रवृत्ति की जाय तो अग्निके उष्णतानुभवको भी
भ्रामक बताकर उसमें अनुभवविरुद्ध अनुष्णत्वका भी अनुमान होने
लगेगा । अर्थात् वही अनुभव भ्रान्त समझा जाता है, जिसका प्रका-
रान्तरसे उपपादक कोई उपाधि हो । 'स एवाय गकार' इस शब्दाभेद
विषयक प्रत्यभिज्ञाका उपपादक उपाधि गत्वादि जाति है । अर्थात्
गकारव्यक्तिके भिन्न होनेपर भी उसकी गत्व जाति अभिन्न है और वह
जाति ही उस प्रत्यभिज्ञामें भासित होती है । इसीलिये वह प्रत्यभिज्ञा
भ्रामक मानी जाती है तथा शब्दनित्यत्व नहीं सिद्ध हो पाता है ।
किन्तु उसके समान संयोगप्रतीतिका उपपादक उसक अनुरूप कोई
उपाधि है नहीं जिससे संयोगप्रतीतिको भ्रामक समझा जाय और
संयोगकी सिद्धि न हो सके ।
्याप्तिज्ञान भी भ्रान्त हो जायगा और व्याप्तिके शिथिल
होनेसे तुम्हारे अनुमानका पोषक यह तर्क भी, कि 'घट यदि एक
होता तो विरुद्ध धर्मोंसे युक्त नहीं होता, जैसे, क्षणिक परमाणु" लागू
नहीं हो सकेगा । लोकव्यवस्थाके अनुसार नीलपीतादिप्रत्यक्षके समान
संयोगके प्रत्यक्षमें भी प्रामाण्यकी सिद्धि हो जायगी तथा उसमें भ्रमा-
त्मकताकी शंकाका अवसर ही नहीं आ सकेगा । कारण, जैसे अर्थ-
क्रियाकारी होनेके कारण नीलपीतादि सत्य हैं तथा उनका प्रत्यक्ष प्रामा-
णिक है, वैसे ही दण्डसंयोगद्वारा भेरीमें शब्दात्मक तथा अग्निसंयोग-
द्वारा घटादिमें पाकजगुणात्मक अर्थक्रियाके किये जानेके कारण संयोग
भी सत्य और उसका प्रत्यक्ष भी प्रामाणिक ही होगा ।
"पूर्वोक्त बाधकोंके अभावमें तद्देशत्व और अतद्देशत्वरूप विरोध
ही अवयवीका बाधक हो" ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि तद्देशत्व
१. सिद्धेः इति ३ पु० पा०
Wait, let's verify if `` for the running head is standard or if running head
२६० आत्मतत्त्वविवेके
क्षणाभावात् । न हि तद्देशसंसर्गविधौ नियमेन देशान्तरसंसर्ग-
निषेधः । तद्देशत्वतददेशत्वयोस्तु स्यात्, तत्संसर्गस्तु केनेष्यते ।
अध्यक्षमेवैकसंसर्गपरिच्छेदकं तदभावव्यवच्छेदमुखेन
तदन्यव्यवच्छेदफलमिमं विरोधमुद्गिरतीति चेत्, स्यादप्येतत्,
यदि नियमेनैकसंसृष्टस्यान्यसंसर्गं प्रतिक्षिपदध्यक्षमुदियात्,
और अतद्देशत्वमें विरोध ही नहीं है । कारण, अतद्देशत्वपदका
नञ् यदि पर्युदासवाचक हो तो उसका अर्थ होगा "उस देशसे भिन्न
देशमें रहना" । किन्तु तद्देशके साथ अवयवीका संसर्ग होनेपर
नियमितरूपसे उससे भिन्न देशके साथ संसर्गका निषेध हो ही जाता
है, ऐसी बात नहीं है । अर्थात् एक ही लम्बे पटात्मक अवयवीका
एकदेशके साथ संसर्ग और उससे भिन्न दूसरे देशके साथ भी संसर्ग
रहता ही है, विरोध कहाँ है ?
यदि अतद्देशत्वपदका नञ् प्रसज्यप्रतिषेध अर्थमें हो तो अतद्दे-
शत्वका अर्थ हो जायगा "उस देशके साथ संसर्गका अभाव" ऐसी
स्थितिमें तद्देशसंसर्ग और तद्देशसंसर्गाभावमें विरोध हो सकता है ।
किन्तु उस देशके साथ संसर्गाभावदशामें उस देशके साथ संसर्ग मानता
ही कौन है कि विरोध होगा । अर्थात् एक ही अवयवीमें एक ही कालमें
तद्देशत्व और तद्देशत्वाभावका सम्बन्ध मैं भी नहीं मानता, फिर प्रसज्य
पक्षमें भी विरोध कैसा ?
यदि कहो कि—एकदेशके साथ अवयवीके संसर्गका अवगाहन
करनेवाला प्रत्यक्ष उस देशमें संसर्गाभावका व्यवच्छेद करता हुआ फलतः
देशान्तर संसर्गका भी व्यवच्छेद कर ही देगा । इस प्रकार तद्देशत्व
और अतद्देशत्वका विरोध सूचित करता है—तो ऐसा तभी हो सकता
है यदि एकके साथ सम्बद्ध वस्तुका प्रत्यक्ष नियमतः दूसरेके साथ
संसर्गको निषिद्ध करता हुआ पैदा हो, किन्तु ऐसा नहीं होता है ।
प्रत्युत एकसाथ एकका अनेकके साथ संसर्गका अवगाहन करनेवाला
प्रत्यक्ष होता है, जैसे "तन्तुषु पट" ।
यह प्रत्यक्ष यदि एक तन्तुमें उस पटके संसर्गका अवगाहन करनेके
कारण अन्य तन्तुओंमें उस पटसंसर्गका निषेध कर दे तो समानन्यायसे
बाह्यार्थभङ्गवादः २६१
नत्वेतदस्ति । युगपदेकस्यानैकसंसर्गप्रवृत्तमध्यक्षमविशेषात् सर्व-
संसर्गं वा प्रतिक्षिपेत्, न वा कमपि, स्वात्मानमेव वा, सर्वथा
न विरोधं दीपयेत् । अन्ततः परमाणोरप्येकस्यानेकैः परमा-
णुभिः संसर्गस्वीकाराच्चेति ।
एतेन वृत्तिविकल्पो निरस्तः, परमाणुवृत्त्याऽवयविवृत्तेस्तु-
ल्ययोगक्षेमत्वात् ।
सभी तन्तुओंसे पटसंसर्गका निषेध करेगा। अथवा वह प्रत्यक्ष भी
अनेकविषयक होनेसे अनेकसंसर्गी हुआ, अतः अवयवीके समान
अपना भी निषेध कर देगा, किन्तु तद्देशत्व और अतद्देशत्वमें किसी
भी हालतमे विरोध नहीं आने देगा। एव, अन्ततः एक परमाणुका
अनेक परमाणुओंके साथ संसर्गको तुम भी मानते ही हो। जैसी
कि तुम्हारी उक्ति है—“षट्केन युगपद् योगात् परमाणोः षडंशता”।
अर्थात् किसी एक परमाणुका चारो तरफ (आगे, पीछे, दोनों बगल
तथा नीचे और ऊपर) छः परमाणुओंके साथ युगपत् संयोग होनेसे एक
परमाणुका छ भाग सिद्ध होता है ।
इससे वृत्तिसम्बन्धी विकल्प भी खण्डित हो गया । अर्थात् “अवयवी
अपने प्रत्येक अवयवोंमें कृत्स्न (सम्पूर्ण) रूपसे वर्तमान रहे तो एक ही
मे उस अवयवीकी सम्पूर्णसत्ताकी परिसमाप्ति हो जानेसे अन्य अवयवोंमें
वह नहीं रह सकेगा। यदि एकदेशरूपसे रहे तो अवयवोंसे अतिरिक्त
कौन सा एकदेश अवयवी का बचा है, जिस रूपसे अवयवी उन अवयवों-
में रहेगा ? अतः कृत्स्न या एकदेश दोनों रूपसे अवर्तमान होनेके
कारण अवयवी है ही नहीं” ऐसा कहना भी खण्डित हो जाता है ।
क्योंकि परमाणुकी वर्तमानताके समान ही अवयवीकी भी वर्तमानताका
योगक्षेम है। अर्थात् यही प्रश्न एक परमाणुका अन्य परमाणुओंके साथ
संयोग होनेके बारेमें भी किया जा सकता है कि “परमाणु सम्पूर्णरूपसे
सम्बद्ध होता है या एकदेशरूपसे ? यहां यदि उत्तर दो कि एक परमाणु-
में कृत्स्न और एकदेशका विकल्प ही नहीं संभव है, तो वैसे ही एक
अवयवीमें भी कृत्स्न और एकदेशका विकल्प नहीं कर सकते ।
२६२ आत्मतत्त्वविवेके
अस्तु तर्हि चित्रे नीलानीलादिविरोधः। न हि तदेकं
रूपम्, चित्रत्वविरोधात्। नाप्यनेकम्, एकावयविसमवाय-
विरोधात्। न चानेकं व्यापकम्, तथानुपलम्भविरोधात्।
न चाव्यापकम्, स्वाभावनिदेशजातीयत्वविरोधात्। अन्यथा
विरोधाविरोधव्यवस्थाविरोधात्। न चारूप एवावयवी,
चाक्षुषत्वविरोधादिति चेन्न—
चित्रत्वं हि नानात्वं वा मिथोविरुद्धनानाजातिसमवायं
पूर्वपक्ष—विभिन्न वर्णवाले तन्तुओंसे बने चित्रपटमे तो नीलअनील
आदि विरुद्ध धर्मोंका समावेश होनेसे वह एक अवयवी नहीं सिद्ध हो
सकता १ है। कारण, उस पटमें एक रूप नहीं है। क्योकि नानारूप ही
चित्रपदार्थ है। एकरूप होनेपर वह चित्र नहीं हो सकेगा। उस चित्र
पटमें अनेकरूप भी नहीं मान सकते, क्योंकि एक अवयवीमे नानारूपों
का समवाय (सम्बन्धविशेष) नहीं हो सकता है। यह भी नहीं हो
सकता कि उसमे अनेकरूप हैं और वे सभी व्याप्यवृत्ति हैं। अर्थात् सभी
अवयवोंमें व्याप्त होकर रहते हैं। क्योंकि वहा अवयवीके सभी अव-
यवोंमे विजातीयरूपों की उपलब्धि नहीं होती है। यह भी नहीं हो
सकता कि उसमे रहनेवाले अनेक रूप अव्याप्यवृत्ति हों। क्योंकि रूप
उस वस्तुकी जातिके हैं, जो वस्तु अपने अभाववाले देशसे भिन्न देशमें
रहती है। अर्थात् रूप और रूपाभाव दोनों एकत्र नहीं रह सकते
इसलिये वह अव्याप्यवृत्ति नहीं हो सकता है। यदि अव्याप्यवृत्ति
मानकर रूपाभावके साथ रूपको वर्तमान माना जाय तो ससारमे विरोध
और अविरोधकी व्यवस्था ही विलीन हो जायगी। यह भी नहीं हो
सकता कि जैसे गुणविरोधके कारण हरीतकी नोरस ही होती है, वैसे
ही गुणविरोध होनेसे चित्रपट भी नीरूप ही हो। क्योंकि चित्रपट
यदि नीरूप हो तो उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष ही नहीं हो सकेगा।
समाधान—यह आक्षेप नहीं हो सकता है। क्योंकि 'चित्र पट,"
१ सामान्यरूपसे अवयवीमात्रके खण्डनके लिए दिये गये पूर्वोक्त पाँच
विरोधोंका परिहार कर दिये जानेपर पुनः पूर्वपक्षी चित्रपटरूप विशेष
अवयवीके सम्बन्धमे आक्षेप करता है।
वाऽभिप्रेत्य यदि एकत्वाभ्युपगमे विरोध उद्भाव्यते, तदैवमेतत्,
न तु तथाऽभ्युपगमः । न खल्वनेकत्वं चित्रत्वम्, शुक्लेष्व-
प्यनेकेषु चित्रप्रत्ययप्रसङ्गात् । नाप्येकस्मिन् विरुद्धानेक-
जातिसमवायः, विरोधेनैव निराकृतत्वात् । अपि तु नील-
त्वादिवत् चित्रत्वमपि जातिविशेष एव । स चावयववृत्तिवि-
जातीयरूपसमाहाराभिव्यङ्ग्यत्वान्नैकरूपावयवसहितस्यावय-
विन उपलम्भेऽप्युपलभ्यते । अत एव त्र्यणुके चित्रेऽपि चित्र-
प्रत्ययो न कदापि ।
यह प्रतीति नानारूपोंको विषय करती है, यह मानकर, अथवा नीलत्व-
पीतत्व आदि परस्पर विरुद्ध नाना जातियोंसे युक्त एक रूपको विषय
करती है, यह मानकर यदि मैं एक अवयवीसिद्ध करता और विरोधकी
उद्भावना की जाती, तब उक्त आक्षेप हो सकता था । किन्तु मैं वैसा
मानता नहीं । अर्थात् मेरी मान्यताके अनुसार चित्रत्व एक स्वयं जाति
है । उससे युक्त चित्ररूपवाले अवयवी को ही यह प्रतीति विषय करती
है । अतः उसमें विरोधकी गन्ध भी नहीं है । कारण अनेक रूपका
होना चित्रत्व नहीं है । वैसा होनेपर केवल अनेक शुक्लोंके रहनेपर भी
चित्रप्रतीति होने लगेगी ।
एकरूपमें नीलत्वपीतत्व आदि अनेक विरुद्ध जातियोंका समवाय भी
चित्रत्व नहीं है । क्योंकि विरोधके कारण ही यह खण्डित है । किन्तु
नीलत्व पीतत्व आदिकी तरह चित्रत्व भी एक जातिविशेष है, और वह
जाति अवयवोंमें वर्तमान विजातीयरूपोंके सम्मेलनसे व्यङ्ग्य होती है।
इसीलिये जिस अवयवीकी उपलब्धि केवल धवलरूपवाले एकभागके
साथ होती है, वहा उस अवयवीमें चित्रत्वकी उपलब्धि नहीं होती है ।
कारण, धवलसे विजातीयरूपवाले परभागके अवयवकी भी साथ साथ
उपलब्धि नहीं होनेसे उस अवयवीमें चित्रत्वजातिकी अभिव्यक्ति ही नहीं
हो पाती है । इसीलिये त्र्यणुकके चित्र होनेपर भी उसमे चित्रत्व-
प्रतीति कभी नहीं होती है । क्योंकि विजातीयरूपवाले उसके अवयव-
भूत द्व्यणुक स्वयं अदृश्य हैं ।
२६४ आत्मतत्त्वविवेके
तथाप्यचित्रे पार्श्वे चित्रप्रत्ययो मा भूत्, धवलप्रत्ययस्तु
कुत इति चेत्, अवयवरूपसञ्चारेणावयविनोऽपि तथा प्रत्य-
यात् । अत एव यत्रावयवरूपं न प्रत्यक्षं तत्र त्रसरेणावेतदपि
नास्ति, दृश्यमेव (वा) ह्यालोकरूपमारोप्य पिञ्जरस्त्रसरेणु-
रालोक्यते ।
स्यादेतत्, यदि चित्रस्य नाम जातिविशेषः, कथं तर्हि
विरुद्धजातीयरूपसमाहारमात्रे चित्रत्वप्रत्यय¹ इति चेत्, न
वै नीलधवलारुणेषु पटेषु क्वचिदपि कार्बुरार्थे² चित्रप्रत्ययः
पूर्वपक्ष—फिर भी जिस अवयवीका एक पार्श्व अचित्र है अर्थात्
धवल है, वहा अवयवीमे चित्रकी प्रतीति भले ही न हो परन्तु उसमे
धवलत्वकी प्रतीति भी कैसे होगी ?
समाधान—इस शङ्काका यही उत्तर होगा कि यहाँ एकभागीय धवल
अवयवके धवलत्वका ही सम्पूर्ण अवयवीमे आरोप हो जानेसे एक
भागसे देखनेवालेको सम्पूर्ण अवयवी ही धवल मालूम पड़ता है । इसी
लिये जहाँ अवयवरूपकी बिल्कुल ही प्रतीति नहीं होती, वहा त्रसरेणुमें
अवयवगत धवलरूपका आरोप भी नहीं होता । त्रसरेणुमें जो भूरापन
की प्रतीति होती है, वह अवयवगतरूपके आरोपसे नहीं होती, क्योंकि
अवयवगतरूप स्वय अदृश्य है । किन्तु दृश्यभूत आलोकके रूपका ही
त्रसरेणुमें आरोप होनेसे वह भूरा मालूम पड़ता है ।
'अस्तु, विभिन्नरूपवाले अवयवोंसे उत्पन्न अवयवीम अभिव्यक्त
चित्रत्व यदि एक जातिविशेष है, तो जहाँ किसी अवयवीकी उत्पत्ति नहीं
होती है, किन्तु विरुद्धजातीय रूपोंका समाहार भर है वहाँ चित्रत्वकी
प्रतीति कैसे होती है' ? ऐसा यदि प्रश्न करो तो यही उत्तर होगा कि
नील, धवल और अरुण पटोंकी ढेर जहा इकट्ठी है, वहाँ कही भी किसी
को भी कर्बुर अर्थमें चित्रशब्दका व्यवहार या चित्रकी प्रतीति नहीं ही
१ चित्रप्रत्यय इति २ पु० पा०
२. वाये वाये इति ३ पु० पा०
बाह्यार्थभङ्गवादः २६५
कस्यापि१। वैधर्म्यनिमित्तस्तु केन वार्यते ? चित्रशब्दस्याक्षा-
दिपदवदनेकार्थत्वात् ।
नीलपीतादिषु मिथः संसृष्टेष्वनारब्धद्रव्येष्वपि कर्बुर-
प्रत्ययो भवतीति चेत्, सत्यम्, द्रव्यान्तरोत्पादाभिमानात्
स्थौल्यातिशयप्रत्ययवदुपपत्तेरिति ।
अस्तु तर्हि परमाणुनिवृत्तेः सर्वविलोपः । तथाहि,
बहुभिः परमाणुभिः संसृज्यमानः परमाणुः प्रत्येकं किमेक-
देशेन संयुज्यते ? कात्स्न्र्येन वा ? प्रकारान्तराभावात् ।
होती है। वहा पर बैलक्षण्य-अर्थमे चित्रशब्दका प्रयोग या चित्रप्रतीति
को कौन रोकता है ? क्योंकि अक्ष आदि पदोंके समान चित्रपद भी
अनेकार्थक है।
यदि कहो कि—नीलपीतादि जहां परस्परमे मिले भर हैं किन्तु
किसी द्रव्यकी उत्पत्ति नहीं हुई है, वहांपर भी कर्बुरपदका प्रयोग
तथा कर्बुरकी प्रतीति भी होती ही है—तो ठीक है, वहां द्रव्यान्तरकी
उत्पत्तिके भ्रमसे ही वैसा होता है। जैसे, धानकी राशिमें किसी
द्रव्यान्तरकी उत्पत्ति नहीं होनेपर भी उसमें स्थूलताका व्यवहार और
प्रतीति अन्य स्थूलद्रव्यकी उत्पत्तिके भ्रमसे हो जाती है। अर्थात् उक्त
स्थलमें कबुरप्रतीति भ्रमात्मक है, यथार्थ नहीं॥
परमाणुनिराकरणखण्डन
यदि कहो कि—उक्त प्रकारसे अवयवीका निराकरण न हो सकनेपर
भी परमाणु निराकरणसे ही अवयवी आदि सभी बाह्यपदार्थोंका खण्डन
हो जायगा। अर्थात् अवयवी तभी सिद्ध होगा, यदि उसका मूल कारण
परमाणु सिद्ध हो। किन्तु परमाणु ही असिद्ध है। क्योंकि अवयवीके
निर्माणार्थ परमाणुओंको परस्परमें संसृष्ट मानना पड़ेगा। ऐसी परिस्थिति
मे बहुत परमाणुओंसे सम्बद्ध होता हुआ एक परमाणु क्या प्रत्येकके
साथ अपने एक भागसे संयुक्त होता है ? अथवा सम्पूर्णरूपसे ? कारण,
१. कस्यचिदपि इति २ पु० पा०
२६६ आत्मतत्त्वविवेके
न प्रथमः, तस्यैकदेशाभावात्, भावे वा परमाणुत्वव्या-
घातात् । न द्वितीयः, परमाण्वन्तरेणासंसर्गप्रसङ्गात् । न ह्यस्ति
सम्भवः, एकत्रैव परिसमाप्तवृत्तिरन्यत्रापि वर्तत इति ।
न, बुद्ध्या समानयोगक्षेमत्वात् । तथाहि, बुद्धिरपि
सन्तमसन्तं वाऽनेकं विषयमालम्बमानाऽऽकारं वा बिभ्रती
कात्स्न्र्येन वा ? एकदेशेन वा ? न प्रथमः, पीतादिविषया-
कारविलोपप्रसङ्गात् । न ह्यस्ति सम्भवो नील एव विषय
आकारे वा परिसमाप्ताऽऽत्मा पीतादिसम्पृक्ताऽऽत्मा चेति ।
न द्वितीयः, तदभावात् । एवमनाकारत्वमविषयत्वं च
इन दोनों प्रकारोंसे अतिरिक्त तीसरा प्रकार नहीं हो सकता । इनमें
प्रथम पक्ष नहीं हो सकता है । क्योंकि परमाणुमें भाग होता ही नहीं
है । यदि उसमें भी भाग हो तो वह परमाणु ही नहीं हो सकता है ।
द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि एक परमाणुके साथ अपने
सम्पूर्णरूपसे संयुक्त हो चुकनेपर दूसरे परमाणुके साथ उसका संसर्ग
नहीं हो सकेगा । कारण, यह संभव नहीं है कि एक ही जगह जिसकी
वृत्ति (रहना) परिसमाप्त हो चुकी हो, वह दूसरी जगह भी रहे । अर्थात्
उक्त युक्तिसे परमाणु भी असिद्ध ही है और विज्ञानमात्र ही तत्त्व है—
तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि विज्ञानके समान ही इसका भी
योगक्षेम है । क्योंकि बुद्धि भी सत् या असत् अनेक विषयको अपना
आलम्बन बनाती हुई अथवा अनेक आकारको धारण करती हुई अपने
सम्पूर्णरूपसे वैसा करती है ? अथवा अपने एक भागसे ? यहां प्रथम
पक्ष नहीं हो सकता है । क्योंकि नीलावगाहिनी बुद्धि यदि सम्पूर्ण रूपसे
नीलालम्बन हो अथवा नीलाकारको धारण करे तो पीतादिविषयरूप
आकारोंका विलोप हो जायगा । कारण, यह कथमपि संभव नहीं
है कि नील आदि विषय या आकारमें बुद्धिका स्वरूप समाप्त भी हो
जाय तथा पीतादि विषयोंसे संपृक्त भी रहे ।
दूसरा पक्ष भी नहीं हो सकता है । क्योंकि बुद्धिके निरवयव होने-
से उसका एकदेश ही असंभव है । यदि कहो कि-उक्त प्रकारसे
[Header] बाह्यार्थभङ्गवादः २६७
बुद्धेरिष्यत एवेति चेत्, तत् किं यत् प्रतिभासते तदसत् ?
आहोस्वित् न प्रतिभासत एव किञ्चित् ? नाद्यः, असत्यपि
नीलपीतादौ ज्ञानवृत्तितद्विकल्पस्य तदवस्थत्वात् । नहि कृत्स्न-
मेव विज्ञानं नीलोल्लेिख, पीताद्यनुल्लेख¹ प्रसङ्गात् । नापि
तदेकदेशः, तदभावादित्युक्तत्वात् । न द्वितीयः, बाह्येऽपि
वृत्तितद्विकल्पस्यानुपपत्तेरिति ।
स्यादेतत्, निःशेषसमुदायी कृत्स्नशब्दस्यार्थः समुदाये
कश्चिदेव समुदाय्येकदेशपदार्थः, न च बुद्धिः समुदायस्वभावा,
बुद्धिमें आपादित आकारहीनत्व या विषयशून्यत्व इष्ट ही है—तो
बताओ कि बुद्धिमें जो भासित हुआ करता है, वह असत् है ? या
कुछ भासित ही नहीं होता है ? यहां प्रथम पक्ष नहीं हो सकता ।
क्योंकि नीलपीतादि विषय यदि असत् भी हों, तो भी उसके साथ
ज्ञानके सम्बन्धके बारेमे दिया गया उक्त विकल्प यथापूर्व ही रह
जाता है । कारण, सम्पूर्णरूपसे विज्ञान (बुद्धि) नीलविषयका उल्लेख
नहीं कर सकता है। क्योंकि विज्ञान नीलका भान करानेमें ही परि-
समाप्त रहेगा, अतः पीतादि विषयका भान नहीं हो सकेगा ।
यह भी नहीं हो सकता कि—विज्ञान अपने एक भागसे नीलको
भासित करे और दूसरे भागसे पीतादिको, क्योंकि निरवयव होनेसे उसमें
एक देश ही नहीं होता, यह कहा जा चुका है। विज्ञानमे कुछ
भासित ही नहीं होता, यह दूसरा पक्ष भी नहीं हो सकता है। क्योंकि
अवयवीरूप बाह्यके बारेमे भी पूर्वोक्त वृत्तिका विकल्प नहीं दे सकोगे ।
अर्थात् जब बाह्य वस्तु ही असिद्ध है तो 'वह सम्पूर्णरूपसे परमाणुमे
रहेगा या अपने एक अंशसे ? इस प्रकारका पूर्वमे दिया गया विकल्प ही
अनुपपन्न होगा ।
पूर्वपक्ष—अस्तु, कृत्स्नशब्दका अर्थ है "समुदायान्तर्गत सभी
समुदायी" तथा एकदेशपद का अर्थ है "समुदायान्तर्गत कोई एक ही
समुदायी"। प्रकृतमे बुद्धि तो समुदायरूप है, कारण, वह एकात्मक
१. नुल्लेखित्त्व इति ३ पु० पा०
२६८ आत्मतत्त्वविवेके
तस्या एकरूपत्वात्, तत्¹ कुतः कृत्स्नैकदेशविकल्पोत्थानम् ?
कथं तर्हि तद्विषयिणी तदाकारवती वा ? प्रकारान्तराभावा-
दिति यदि, तदा स्वरूपेणेति ब्रूम इति चेत्—स्फुटं निरटङ्कि
तार्किकनेदिकाविटङ्केन केवलमस्मभ्यमभ्यसूयता दूरहतेवेति ।
एतेन तदतद्देशत्वं निरस्तम् । तथाहि बुद्धेर्नीलाकारतां
परिच्छिन्ददध्यक्षं तदभावव्यवच्छेदमुखेन तदविनाभूतां पीता-
द्याकारतामपि व्यवच्छिन्द्यात् । तथा च कथमेका बुद्धिर्नील-
है। अत बुद्धिके सम्बन्धमें पूर्वोक्त प्रकारसे कृत्स्न (सम्पूर्ण) या
एकदेशका विकल्प कैसे उठ सकता है ?। यदि पूछो कि—कृत्स्न
या एकदेशके अतिरिक्त किसी तृतीय प्रकारके नहीं होने से इन दोनोंके
अभावमे बुद्धि नीलादिको अपना विषय कैसे बना सकेगी ? अथवा
वह नीलादि आकारवाली कैसे हो सकेगी ? तो यही कहूँगा कि
सम्पूर्ण या एकदेश विकल्पके बिना ही स्वरूपसे ही बुद्धि नीलादि
विषयिणी या नीलादि आकारवाली होगी।
उत्तरपक्ष—इस प्रकारसे बौद्ध यदि बुद्धिसम्बन्धी विकल्पका
समाधान करे तो निश्चय ही तार्किकोंके स्थानपर पहुँचा हुआ बौद्धधूर्तने
हमारे साथ केवल असूयावश दूर जाकर अर्थात् अपने ऊपर आये दोषके
निराकरणके अवसरपर यह बात कही। अर्थात् हमारा अवयवी भी
कृत्स्न या एकदेश विकल्पके बिना ही स्वरूपसे ही अवयवोंमें रहेगा, इस
बातको पहले नहीं समझते हुए बहुत बाद तब समझा, जबकि उसकी
बुद्धिके बारेमें भी यही कृत्स्न या एकदेशका विकल्प नैयायिकोंकी
ओरसे उपस्थित किया गया।
इससे (पूर्वोक्त बुद्धिरूप प्रतिवन्दिके द्वारा) परमाणु तथा अवयवीमें
भी तद्देशत्व और अतद्देशत्वका विरोध खण्डित हो गया। क्योंकि
एकदेशमें सम्बद्ध परमाणु और अवयवीका देशान्तरमें सम्बन्ध होनेमे
यदि विरोध हो तो बुद्धिमे नीलाकारताका अनुभव करानेवाला प्रत्यक्ष
उसके नीलाभावाकारताके निषेधद्वारा नीलाभावसे नियत सम्बद्ध
१. तदेतत् इति २ पु० पा०
बाह्यार्थभङ्गवादः २६९
पीताद्याकारा स्यादिति तुल्योऽनुयोगः ।
भवेदेवं यदि नीलाद्याकारतायाः पीताद्याकारत्वाविना-
भावः स्यात्, स एव तु कुतः ? नीलपीताद्याकाराया बुद्धे-
रैकात्म्येनैव निश्चयात् । प्रत्याकारनियतत्वे चित्रप्रतिपत्तेरप्य-
नुपपत्तिरिति चेत्, तदेतत् तुल्यं परमाण्ववयव्यादिष्वपि । न
हि तत्राप्यनेकपरमाणुसंसृष्टस्य परमाणोरनेकावयवसंसृष्टस्या-
वयविनो वा नैकात्मताऽनुभूयते, तथात्वे वा एकस्यानेकसंसर्ग-
प्रतिपत्तिः कदापि न स्यादिति तुल्यैवार्थगतिः । वाचि वैचित्र्यं
तु क्वोपयुज्यत इति ।
पीताद्याकारताको भी बुद्धिमें नहीं होने देगा । ऐसी परिस्थितिमें एक
बुद्धि नील-पीत आदि अनेक आकारवाली कैसे हो सकेगी ? इस प्रकार
परमाणु और अवयवीके ऊपर दिया गया दोष तुल्यरूपसे आपकी बुद्धि
पर भी आ ही जाता है।
यदि कहो कि- बुद्धिमें यह दोष तब आता यदि बुद्धि प्रत्येक आकार-
के साथ अलग अलग नियत रहती तथा नीलाकारताका पीताकारताके
अभावके साथ नियत सम्बन्ध रहता। किन्तु उक्त दोनों ही बातें यहाँ कहाँ
हैं ? क्योंकि नीलपीत आदि अनेक आकारको एकसाथ धारण करनेवाली
बुद्धिमें नील-पीतके भिन्न होनेसे भिन्नता नहीं मानते किन्तु उसमें एका-
त्मता (एकरूपता) ही मानते हैं। कारण, नीलपीत आदि प्रत्येक आकार
के साथ अलग अलग यदि बुद्धिको नियत माना जाय तो चित्राकार
प्रतीति ही नहीं हो सकेगी-तो यह बात परमाणु और अवयवीमे भी समान
ही है । क्योंकि वहाँ भी अनेक परमाणुओंसे संयुक्त परमाणुमें या अनेक
अवयवोंमें आश्रित अवयवीमे एकात्मताका अनुभव न होता हो ऐसी
बात नहीं है । यदि उक्त स्थलोंपर परमाणु और अवयवीमें एकात्मताका
अनुभव न हो तो एकमें अनेकके साथ संसर्गकी प्रतीति कभी न हो सकेगी।
अर्थात् एक सपक्षमें साध्य-साधनरूप अनेकका संसर्ग (सामानाधिकरण्य)
भी न हो सकेगा तथा अनुमानमात्रका उच्छेद हो जायगा । इस प्रकार
बुद्धि और परमाणु तथा अवयवी आदिकी समान ही गति है । केवल
२७० आत्मतत्त्वविवेके
संयोगव्यवस्थापनेनैव षट्केन युगपद्योगात् दिग्देशभेदा-
च्छायावृतिभ्यामित्यादयो निरस्ताः।
कथनमें ही वैचित्र्य है, जिसका कोई उपयोग नहीं है। अर्थात् कथन
मात्र की विचित्रतासे दोनोंकी तुल्यगति होनेमे कोई बाधा नहीं है।
बुद्धिके समान परमाणुका भी स्वरूपसे ही अनेक परमाणुओंके
साथ संयोगकी व्यवस्था कर देनेसे ही—
'षट्केन युगपद्योगात् परमाणोः षडंशता।
दिग्देशभेदश्छायावृतिभ्यां चापि चांशता" ॥
इस कारिकाके अनुसार बौद्धोंद्वारा उपस्थित किये गये परमाणुबाधक
प्रमाण भी खण्डित हो जाते हैं१।
१ एक परमाणुका अपने पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर तथा नीचे
रहने वाले छै परमाणुओंके साथ एकसाथ ही संयोग होनेसे उस परमाणु-
में छ भाग सिद्ध होते हैं। एव यह पूर्वीय परमाणु है, यह पश्चिमीय
परमाणु है इस प्रकारका दिग्देशका भेद भी परमाणुको सावयव सिद्ध
करता है। क्योकि सर्वत्र सावयव घटपटादिमे ही पूर्वीय पश्चिमीय
आदिका व्यवहार होता है। एव परमाणुके मूर्तिमान होनेसे उसके
द्वारा छाया तथा आवरण अवश्य पैदा होंगे, इसलिये भी परमाणु
सावयव सिद्ध होता है। क्योकि लोकमें सावयव द्रव्य ही छाया और
आवरण पैदा करते हैं। अत इन पूर्वोक्त हेतुओसे परमाणुको भी
अवयव होना सिद्ध होता है।
किन्तु बौद्धद्वारा दी गयीं यह परमाणुबाधक युक्तियाँ ठीक
नहीं हैं। क्योकि परमाणुका संयोग अनेक परमाणुओंके साथ नहीं
होता किन्तु परमाणुके इर्दगिर्द अनेक दिशाओके साथ ही होता है। अत
अनेक संयोगके आधारपर परमाणुके सावयव होनेका कोई प्रश्न ही
नहीं है। एव पूर्वीय पश्चिमीय आदि व्यवहार भी दिशाभेदोंके कारण
होता है न कि परमाणुके सावयव होनेके कारण। क्योंकि किसी बडे
दण्ड आदिमे, उसके सावयव होनेपर भी उसके मध्यभागकी अपेक्षा करके,
पूर्वीय पश्चिमीय आदि व्यवहार नहीं होते हैं। इसी प्रकार परमाणु
द्वारा छाया और आवरणका होना भी उसके सावयव होनेसे नहीं किन्तु
बाह्यार्थभङ्गवादः २७१
परमाणुसिद्धयसिद्धिभ्यामेव मूर्तत्वादयो निरवकाशिताः।
आकाशव्यतिभेदादयस्त्वसम्भाविता एव ।
सर्वत्र चात्र हेतुदशायां प्रतिज्ञापदयोर्व्याघातः, कालात्य-
नैयायिकाभिमत परमाणुको भी सावयव सिद्ध करनेवाले मूर्तत्व
आदि हेतु भी परमाणुकी सिद्धि या असिद्धि दोनों ही स्थितियोंमे अनु-
पयुक्त हैं। अर्थात् "परमाणवः सावयवा, मूर्तत्वात्, रूपवत्त्वात्,
स्पर्शवत्त्वात्-घटादिवत्' इस अनुमानद्वारा परमाणुको भी सावयव
सिद्ध करनेका यही अभिप्राय है कि निरवयवात्मक परमाणु होता ही
नहीं है। किन्तु यदि परमाणु असिद्ध है, तो उक्त अनुमानका पक्ष ही
असिद्ध हो गया। अतः आश्रयासिद्धिरूप दोषसे ग्रस्त होनेके
कारण मूर्तत्वादि हेतु सावयवत्वके साधक नहीं हो सकते। और यदि
आश्रयासिद्धिदोषसे बचनेके लिये परमाणुको पक्षरूपमे सिद्ध माना
जाय तो लाघव तथा अनवस्थाप्रसङ्गरूप तर्कोंके आधारपर वह निरवयव
भी सिद्ध हो जाता है।
परमाणुके भीतर आकाशका सम्बन्ध मानते हुए परमाणुको सावयव
सिद्ध करना तो अत्यन्त असम्भव है। अर्थात् "परमाणुके भीतर
आकाश है? या नहीं? यदि है तो परमाणु सावयव सिद्ध हो
गया। यदि नहीं है तो आकाशकी व्यापकता खण्डित हो जाती है।"
यह आक्षेप तो बिलकुल असम्भव है। क्योंकि परमाणुके निरवयव
होनेसे उसमें अभ्यन्तर होता ही नहीं, अतः उसके भीतर आकाश कैसे
रह सकता है? इससे आकाशकी व्यापकतामे भी कोई क्षति नहीं आती
है। क्योंकि 'सर्वमूर्तसंयोगित्वं व्यापकत्वम्' इस लक्षणके अनुसार
सभी मूर्त द्रव्योंके साथ संयोग होनेके कारण आकाश व्यापक कहाता
है। परमाणुमें मध्यभाग नहीं होनेपर भी उसके साथ आकाशका
संयोग है ही।
एवं, पूर्वोक्त सभी अनुमानोंकी दशामें "परमाणुः सावयव" इस
प्रतिज्ञावाक्यान्तर्गत परमाणुपद और सावयवपदमे परस्पर विरोध हो
मूर्त होनेके कारण ही है। अतः उक्त हेतु परमाणुको सावयव सिद्ध
करनेमे सर्वथा असमर्थ हैं।