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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 312, कुल 530 में से

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पृष्ठ 312

वाऽभिप्रेत्य यदि एकत्वाभ्युपगमे विरोध उद्भाव्यते, तदैवमेतत्,
न तु तथाऽभ्युपगमः । न खल्वनेकत्वं चित्रत्वम्, शुक्लेष्व-
प्यनेकेषु चित्रप्रत्ययप्रसङ्गात् । नाप्येकस्मिन् विरुद्धानेक-
जातिसमवायः, विरोधेनैव निराकृतत्वात् । अपि तु नील-
त्वादिवत् चित्रत्वमपि जातिविशेष एव । स चावयववृत्तिवि-
जातीयरूपसमाहाराभिव्यङ्ग्यत्वान्नैकरूपावयवसहितस्यावय-
विन उपलम्भेऽप्युपलभ्यते । अत एव त्र्यणुके चित्रेऽपि चित्र-
प्रत्ययो न कदापि ।

यह प्रतीति नानारूपोंको विषय करती है, यह मानकर, अथवा नीलत्व-
पीतत्व आदि परस्पर विरुद्ध नाना जातियोंसे युक्त एक रूपको विषय
करती है, यह मानकर यदि मैं एक अवयवीसिद्ध करता और विरोधकी
उद्भावना की जाती, तब उक्त आक्षेप हो सकता था । किन्तु मैं वैसा
मानता नहीं । अर्थात् मेरी मान्यताके अनुसार चित्रत्व एक स्वयं जाति
है । उससे युक्त चित्ररूपवाले अवयवी को ही यह प्रतीति विषय करती
है । अतः उसमें विरोधकी गन्ध भी नहीं है । कारण अनेक रूपका
होना चित्रत्व नहीं है । वैसा होनेपर केवल अनेक शुक्लोंके रहनेपर भी
चित्रप्रतीति होने लगेगी ।

एकरूपमें नीलत्वपीतत्व आदि अनेक विरुद्ध जातियोंका समवाय भी
चित्रत्व नहीं है । क्योंकि विरोधके कारण ही यह खण्डित है । किन्तु
नीलत्व पीतत्व आदिकी तरह चित्रत्व भी एक जातिविशेष है, और वह
जाति अवयवोंमें वर्तमान विजातीयरूपोंके सम्मेलनसे व्यङ्ग्य होती है।
इसीलिये जिस अवयवीकी उपलब्धि केवल धवलरूपवाले एकभागके
साथ होती है, वहा उस अवयवीमें चित्रत्वकी उपलब्धि नहीं होती है ।
कारण, धवलसे विजातीयरूपवाले परभागके अवयवकी भी साथ साथ
उपलब्धि नहीं होनेसे उस अवयवीमें चित्रत्वजातिकी अभिव्यक्ति ही नहीं
हो पाती है । इसीलिये त्र्यणुकके चित्र होनेपर भी उसमे चित्रत्व-
प्रतीति कभी नहीं होती है । क्योंकि विजातीयरूपवाले उसके अवयव-
भूत द्व्यणुक स्वयं अदृश्य हैं ।