आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 308, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें्याप्तिज्ञान भी भ्रान्त हो जायगा और व्याप्तिके शिथिल
होनेसे तुम्हारे अनुमानका पोषक यह तर्क भी, कि 'घट यदि एक
होता तो विरुद्ध धर्मोंसे युक्त नहीं होता, जैसे, क्षणिक परमाणु" लागू
नहीं हो सकेगा । लोकव्यवस्थाके अनुसार नीलपीतादिप्रत्यक्षके समान
संयोगके प्रत्यक्षमें भी प्रामाण्यकी सिद्धि हो जायगी तथा उसमें भ्रमा-
त्मकताकी शंकाका अवसर ही नहीं आ सकेगा । कारण, जैसे अर्थ-
क्रियाकारी होनेके कारण नीलपीतादि सत्य हैं तथा उनका प्रत्यक्ष प्रामा-
णिक है, वैसे ही दण्डसंयोगद्वारा भेरीमें शब्दात्मक तथा अग्निसंयोग-
द्वारा घटादिमें पाकजगुणात्मक अर्थक्रियाके किये जानेके कारण संयोग
भी सत्य और उसका प्रत्यक्ष भी प्रामाणिक ही होगा ।
"पूर्वोक्त बाधकोंके अभावमें तद्देशत्व और अतद्देशत्वरूप विरोध
ही अवयवीका बाधक हो" ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि तद्देशत्व
१. सिद्धेः इति ३ पु० पा०
Wait, let's verify if `` for the running head is standard or if running head