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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 530 में से

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पृष्ठ 314

बाह्यार्थभङ्गवादः २६५
कस्यापि१। वैधर्म्यनिमित्तस्तु केन वार्यते ? चित्रशब्दस्याक्षा-
दिपदवदनेकार्थत्वात् ।
नीलपीतादिषु मिथः संसृष्टेष्वनारब्धद्रव्येष्वपि कर्बुर-
प्रत्ययो भवतीति चेत्, सत्यम्, द्रव्यान्तरोत्पादाभिमानात्
स्थौल्यातिशयप्रत्ययवदुपपत्तेरिति ।
अस्तु तर्हि परमाणुनिवृत्तेः सर्वविलोपः । तथाहि,
बहुभिः परमाणुभिः संसृज्यमानः परमाणुः प्रत्येकं किमेक-
देशेन संयुज्यते ? कात्स्न्र्येन वा ? प्रकारान्तराभावात् ।
होती है। वहा पर बैलक्षण्य-अर्थमे चित्रशब्दका प्रयोग या चित्रप्रतीति
को कौन रोकता है ? क्योंकि अक्ष आदि पदोंके समान चित्रपद भी
अनेकार्थक है।
यदि कहो कि—नीलपीतादि जहां परस्परमे मिले भर हैं किन्तु
किसी द्रव्यकी उत्पत्ति नहीं हुई है, वहांपर भी कर्बुरपदका प्रयोग
तथा कर्बुरकी प्रतीति भी होती ही है—तो ठीक है, वहां द्रव्यान्तरकी
उत्पत्तिके भ्रमसे ही वैसा होता है। जैसे, धानकी राशिमें किसी
द्रव्यान्तरकी उत्पत्ति नहीं होनेपर भी उसमें स्थूलताका व्यवहार और
प्रतीति अन्य स्थूलद्रव्यकी उत्पत्तिके भ्रमसे हो जाती है। अर्थात् उक्त
स्थलमें कबुरप्रतीति भ्रमात्मक है, यथार्थ नहीं॥
परमाणुनिराकरणखण्डन
यदि कहो कि—उक्त प्रकारसे अवयवीका निराकरण न हो सकनेपर
भी परमाणु निराकरणसे ही अवयवी आदि सभी बाह्यपदार्थोंका खण्डन
हो जायगा। अर्थात् अवयवी तभी सिद्ध होगा, यदि उसका मूल कारण
परमाणु सिद्ध हो। किन्तु परमाणु ही असिद्ध है। क्योंकि अवयवीके
निर्माणार्थ परमाणुओंको परस्परमें संसृष्ट मानना पड़ेगा। ऐसी परिस्थिति
मे बहुत परमाणुओंसे सम्बद्ध होता हुआ एक परमाणु क्या प्रत्येकके
साथ अपने एक भागसे संयुक्त होता है ? अथवा सम्पूर्णरूपसे ? कारण,
१. कस्यचिदपि इति २ पु० पा०