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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 311

२६२ आत्मतत्त्वविवेके
अस्तु तर्हि चित्रे नीलानीलादिविरोधः। न हि तदेकं
रूपम्, चित्रत्वविरोधात्। नाप्यनेकम्, एकावयविसमवाय-
विरोधात्। न चानेकं व्यापकम्, तथानुपलम्भविरोधात्।
न चाव्यापकम्, स्वाभावनिदेशजातीयत्वविरोधात्। अन्यथा
विरोधाविरोधव्यवस्थाविरोधात्। न चारूप एवावयवी,
चाक्षुषत्वविरोधादिति चेन्न—
चित्रत्वं हि नानात्वं वा मिथोविरुद्धनानाजातिसमवायं
पूर्वपक्ष—विभिन्न वर्णवाले तन्तुओंसे बने चित्रपटमे तो नीलअनील
आदि विरुद्ध धर्मोंका समावेश होनेसे वह एक अवयवी नहीं सिद्ध हो
सकता १ है। कारण, उस पटमें एक रूप नहीं है। क्योकि नानारूप ही
चित्रपदार्थ है। एकरूप होनेपर वह चित्र नहीं हो सकेगा। उस चित्र
पटमें अनेकरूप भी नहीं मान सकते, क्योंकि एक अवयवीमे नानारूपों
का समवाय (सम्बन्धविशेष) नहीं हो सकता है। यह भी नहीं हो
सकता कि उसमे अनेकरूप हैं और वे सभी व्याप्यवृत्ति हैं। अर्थात् सभी
अवयवोंमें व्याप्त होकर रहते हैं। क्योंकि वहा अवयवीके सभी अव-
यवोंमे विजातीयरूपों की उपलब्धि नहीं होती है। यह भी नहीं हो
सकता कि उसमे रहनेवाले अनेक रूप अव्याप्यवृत्ति हों। क्योंकि रूप
उस वस्तुकी जातिके हैं, जो वस्तु अपने अभाववाले देशसे भिन्न देशमें
रहती है। अर्थात् रूप और रूपाभाव दोनों एकत्र नहीं रह सकते
इसलिये वह अव्याप्यवृत्ति नहीं हो सकता है। यदि अव्याप्यवृत्ति
मानकर रूपाभावके साथ रूपको वर्तमान माना जाय तो ससारमे विरोध
और अविरोधकी व्यवस्था ही विलीन हो जायगी। यह भी नहीं हो
सकता कि जैसे गुणविरोधके कारण हरीतकी नोरस ही होती है, वैसे
ही गुणविरोध होनेसे चित्रपट भी नीरूप ही हो। क्योंकि चित्रपट
यदि नीरूप हो तो उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष ही नहीं हो सकेगा।
समाधान—यह आक्षेप नहीं हो सकता है। क्योंकि 'चित्र पट,"

१ सामान्यरूपसे अवयवीमात्रके खण्डनके लिए दिये गये पूर्वोक्त पाँच
विरोधोंका परिहार कर दिये जानेपर पुनः पूर्वपक्षी चित्रपटरूप विशेष
अवयवीके सम्बन्धमे आक्षेप करता है।