आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
पृष्ठ 316, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 316बुद्धेरिष्यत एवेति चेत्, तत् किं यत् प्रतिभासते तदसत् ?
बुद्धिमें आपादित आकारहीनत्व या विषयशून्यत्व इष्ट ही है—तो
[Header] बाह्यार्थभङ्गवादः २६७
बुद्धेरिष्यत एवेति चेत्, तत् किं यत् प्रतिभासते तदसत् ?
आहोस्वित् न प्रतिभासत एव किञ्चित् ? नाद्यः, असत्यपि
नीलपीतादौ ज्ञानवृत्तितद्विकल्पस्य तदवस्थत्वात् । नहि कृत्स्न-
मेव विज्ञानं नीलोल्लेिख, पीताद्यनुल्लेख¹ प्रसङ्गात् । नापि
तदेकदेशः, तदभावादित्युक्तत्वात् । न द्वितीयः, बाह्येऽपि
वृत्तितद्विकल्पस्यानुपपत्तेरिति ।
स्यादेतत्, निःशेषसमुदायी कृत्स्नशब्दस्यार्थः समुदाये
कश्चिदेव समुदाय्येकदेशपदार्थः, न च बुद्धिः समुदायस्वभावा,
बुद्धिमें आपादित आकारहीनत्व या विषयशून्यत्व इष्ट ही है—तो
बताओ कि बुद्धिमें जो भासित हुआ करता है, वह असत् है ? या
कुछ भासित ही नहीं होता है ? यहां प्रथम पक्ष नहीं हो सकता ।
क्योंकि नीलपीतादि विषय यदि असत् भी हों, तो भी उसके साथ
ज्ञानके सम्बन्धके बारेमे दिया गया उक्त विकल्प यथापूर्व ही रह
जाता है । कारण, सम्पूर्णरूपसे विज्ञान (बुद्धि) नीलविषयका उल्लेख
नहीं कर सकता है। क्योंकि विज्ञान नीलका भान करानेमें ही परि-
समाप्त रहेगा, अतः पीतादि विषयका भान नहीं हो सकेगा ।
यह भी नहीं हो सकता कि—विज्ञान अपने एक भागसे नीलको
भासित करे और दूसरे भागसे पीतादिको, क्योंकि निरवयव होनेसे उसमें
एक देश ही नहीं होता, यह कहा जा चुका है। विज्ञानमे कुछ
भासित ही नहीं होता, यह दूसरा पक्ष भी नहीं हो सकता है। क्योंकि
अवयवीरूप बाह्यके बारेमे भी पूर्वोक्त वृत्तिका विकल्प नहीं दे सकोगे ।
अर्थात् जब बाह्य वस्तु ही असिद्ध है तो 'वह सम्पूर्णरूपसे परमाणुमे
रहेगा या अपने एक अंशसे ? इस प्रकारका पूर्वमे दिया गया विकल्प ही
अनुपपन्न होगा ।
पूर्वपक्ष—अस्तु, कृत्स्नशब्दका अर्थ है "समुदायान्तर्गत सभी
समुदायी" तथा एकदेशपद का अर्थ है "समुदायान्तर्गत कोई एक ही
समुदायी"। प्रकृतमे बुद्धि तो समुदायरूप है, कारण, वह एकात्मक
१. नुल्लेखित्त्व इति ३ पु० पा०