आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः [L] २५३
द्विचन्द्रभ्रमो नाम । किन्तु स एवैकस्थले चल उपलभ्यतेऽचले
त्वचल इति । वीचिषु सोऽपि सहस्रनिभ इति चेत्, एव-
मेतत्, तासां विच्छेदेनाकलनात् ।
अस्तु तर्हि चलाचलयोर्युतसिद्धिप्रसङ्ग इति चेन्न, स्वयं
प्रतिबन्धासिद्धेः । न च प्रसङ्गे व्याप्तावपि पराभ्युपगमः
शरणम् । न चैवं पराभ्युपगमोऽपि । वस्त्रोदकादौ दृश्यते
तावदयमिति चेन्न, तन्तुवस्त्रादौ विपर्ययस्यापि दर्शनात् ।
यवोमे आश्रित अवयवी भी दो मालूम होना चाहिये” ऐसा कहो तो,
यह हो भी सकता है, यदि आश्रयोंका परस्पर विच्छेद हो जाय ।
क्योंकि जिसका अवयव विच्छिन्न नहीं हुआ है, ऐसे एक ही जलमे
दो चन्द्रमाका भ्रम कभी नहीं होता । किन्तु एक ही चन्द्रमा चल
जलमे चल प्रतीत होता है और अचल जलमे तो अचल । यदि कहो
कि—तरङ्गोंमे तो वह भी हजारके समान मालूम देता है—तो हाँ,
ऐसा ही होता है । क्योंकि वहाँ तरङ्गें भी हजाररूपमे विच्छिन्न हुई
मिलती हैं ।
यदि कहो कि—हाथकी चलावस्थामे शरीर यदि अचल ही रहे तो
हाथ और शरीर दोनोकी युतसिद्धि होने लगेगी । अर्थात् हाथ और
शरीर दोनो परस्पर असम्बद्ध होते हुए भी कायम रहें—तो इस प्रकारका
आपादन क्षणिकवादी नहीं कर सकता है । क्योंकि स्वयं क्षणिकवादके
अनुसार चलाचलत्व और युतसिद्धत्वमे व्याप्ति ही असिद्ध है । अर्थात्
हाथ और शरीरमे युतसिद्धत्वकी सिद्धिके लिए दोनोंको कम से कम
तीन क्षण तक स्थायी मानना पड़ेगा । जैसे, प्रथम क्षणमे दोनोंका
परस्पर सम्बद्ध होकर रहना, द्वितीय क्षणमे हाथका चल होकर शरीरसे
अलग होना और तीसरे क्षणमे दोनोंका असम्बद्ध होकर कायम रहना ।
किन्तु क्षणिकवादमे एक क्षणसे अधिक किसी वस्तुकी सत्ता ही नहीं
रहता, फिर तदनुसार युतसिद्धत्वका आपादन क्षणिकवादी कैसे कर
सकता है ?
यहाँ ऐसा नहीं कह सकते कि—प्रसङ्ग देनेमे व्याप्तिके बारेमें भी