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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 530 में से

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पृष्ठ 303

२१४ आत्मतत्त्वविवेके

इदं मिथ्येति चेत्, तत् कथं सत्यम् ? अबाधादिति चेत्,
इह तर्हि बाधकान्तरं वाच्यम् । चलाचलत्वमेवेति चेन्न, युत-
सिद्धावपि१ किमिति नेदं बाधकमिति विपर्ययस्यापि वक्तुं
शक्यत्वादिति ।
दूसरेकी स्वीकृति से ही काम चल जायगा । अर्थात् चलाचलत्वरूप
आपादकद्वारा युतसिद्धत्वरूप आपाद्यका प्रसङ्ग देनेमे क्षणिकवादी उक्त
आपादक और आपाद्यमें स्वयं व्याप्तिको न मानते हुए भी नैयायिकद्वारा
स्वीकृत व्याप्तिकी ही शरण लेकर आपादन कर देगा—क्योंकि प्रसङ्गरूप
तर्कमे दूसरेद्वारा सिर्फ आपादककी ही स्वीकृति अपेक्षित होती है, न
कि आपादक और आपाद्यकी व्याप्तिकी भी । अतः व्याप्तिके बारेमे
नैयायिककी स्वीकृतिसे काम नहीं चलेगा । क्षणिकवादीको स्वयं
व्याप्तिकी सिद्धि चाहिये । किन्तु क्षणिकवादमे यह असम्भव है।
साथ ही जो चलाचल होता है, वह युतसिद्ध (असम्बद्ध होते हुए भी
विद्यमान) होता है, इस व्याप्तिको नैयायिक भी नहीं मानता, फिर
उसकी शरण ली भी कैसे जा सकती है ?
यदि कहो कि—वस्त्र और जलमे तो युतसिद्धि देखी जाती है।
अर्थात् वस्त्रसे जलके स्खलित हो जानेपर भी दोनो असम्बद्ध होते
हुए विद्यमान रहते हैं, अत उक्त व्याप्तिको अवश्य स्वीकार करना
होगा—तो ऐसा नहीं हो सकता । क्योंकि तन्तु और वस्त्रमे विपरीत
भी देखा जाता है ; अर्थात् तन्तु और वस्त्रके चलाचल होनेपर भी
उनमें असम्बद्ध-विद्यमानता नहीं होती है ।
यदि कहो कि—वहाँ तन्तु और वस्त्रमे सम्बद्धताकी अनुभूति मिथ्या
है—तो यहाँ वस्त्र और जलकी असम्बद्धताकी अनुभूति कैसे सत्य है ?
यदि कहो, अबाधित होनेसे सत्य है—तो तन्तुवस्त्रस्थलमे कोई बाधक
दिखाना चाहिये । यदि कहो कि—तन्तु और वस्त्रका चल अचल होना
ही उनकी सम्बद्धत्वानुभूतिका बाधक है—तो यहाँ चलाचलत्व तन्तु और
वस्त्रके असम्बद्धविद्यमानताका ही बाधक क्यों न होगा ? ऐसा विपरीत
भी कहा ही जा सकता है । अर्थात् विपक्षमे बाधक दिये बिना केवल
१. युतसिद्धावेव इति ३ पृ० पा०