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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 530 में से

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पृष्ठ 320

बाह्यार्थभङ्गवादः २७१
परमाणुसिद्धयसिद्धिभ्यामेव मूर्तत्वादयो निरवकाशिताः।
आकाशव्यतिभेदादयस्त्वसम्भाविता एव ।
सर्वत्र चात्र हेतुदशायां प्रतिज्ञापदयोर्व्याघातः, कालात्य-
नैयायिकाभिमत परमाणुको भी सावयव सिद्ध करनेवाले मूर्तत्व
आदि हेतु भी परमाणुकी सिद्धि या असिद्धि दोनों ही स्थितियोंमे अनु-
पयुक्त हैं। अर्थात् "परमाणवः सावयवा, मूर्तत्वात्, रूपवत्त्वात्,
स्पर्शवत्त्वात्-घटादिवत्' इस अनुमानद्वारा परमाणुको भी सावयव
सिद्ध करनेका यही अभिप्राय है कि निरवयवात्मक परमाणु होता ही
नहीं है। किन्तु यदि परमाणु असिद्ध है, तो उक्त अनुमानका पक्ष ही
असिद्ध हो गया। अतः आश्रयासिद्धिरूप दोषसे ग्रस्त होनेके
कारण मूर्तत्वादि हेतु सावयवत्वके साधक नहीं हो सकते। और यदि
आश्रयासिद्धिदोषसे बचनेके लिये परमाणुको पक्षरूपमे सिद्ध माना
जाय तो लाघव तथा अनवस्थाप्रसङ्गरूप तर्कोंके आधारपर वह निरवयव
भी सिद्ध हो जाता है।
परमाणुके भीतर आकाशका सम्बन्ध मानते हुए परमाणुको सावयव
सिद्ध करना तो अत्यन्त असम्भव है। अर्थात् "परमाणुके भीतर
आकाश है? या नहीं? यदि है तो परमाणु सावयव सिद्ध हो
गया। यदि नहीं है तो आकाशकी व्यापकता खण्डित हो जाती है।"
यह आक्षेप तो बिलकुल असम्भव है। क्योंकि परमाणुके निरवयव
होनेसे उसमें अभ्यन्तर होता ही नहीं, अतः उसके भीतर आकाश कैसे
रह सकता है? इससे आकाशकी व्यापकतामे भी कोई क्षति नहीं आती
है। क्योंकि 'सर्वमूर्तसंयोगित्वं व्यापकत्वम्' इस लक्षणके अनुसार
सभी मूर्त द्रव्योंके साथ संयोग होनेके कारण आकाश व्यापक कहाता
है। परमाणुमें मध्यभाग नहीं होनेपर भी उसके साथ आकाशका
संयोग है ही।
एवं, पूर्वोक्त सभी अनुमानोंकी दशामें "परमाणुः सावयव" इस
प्रतिज्ञावाक्यान्तर्गत परमाणुपद और सावयवपदमे परस्पर विरोध हो
मूर्त होनेके कारण ही है। अतः उक्त हेतु परमाणुको सावयव सिद्ध
करनेमे सर्वथा असमर्थ हैं।