आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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पाणौ कम्पमाने शरीरं न कम्पत इति प्रत्ययात् ।
अथवा यो यदाश्रिततयोपलभ्यते स तस्मिंश्चलत्य-
चलोऽपि चल एव विभाव्यते दर्पणमुखवत् जलचन्द्रवच्चेत्यपि
द्रष्टव्यम् ।
कृतं प्रतीतिकलहेन, एवमपि सर्वत्र चल एवोपलभ्येतेति
चेन्, चलत्यवयवे सर्वत्र तथैवेति न किञ्चिदनुपपन्नम् । अचले
तु कथं तथोपलभ्यताम् ?
तथापि चलाचलाश्रयस्य चलाचलतया प्रतीतौ चलाचल-
जलचन्द्रवत् द्वैतप्रत्ययोऽपि स्यादिति चेन्, स्यादपि यद्याश्रय-
विच्छेदः स्यात् । न ह्येकस्मिन्नेव जलेऽविच्छिन्नावयवभेदेन
"तब तो क्रियाशील अवयवोंपर आश्रित भी अवयवी स्वयं निष्क्रिय ही
मालूम होना चाहिये" ऐसा दोष दो तो यह मेरे लिये अनिष्ट नहीं है ।
क्योंकि हाथ कँपनेपर भी शरीर नहीं कँपता है, यह सबको अनुभव है।
अथवा, जो जिसके आश्रित होकर उपलब्ध होता है, वह उसके चलते
समय अचल होते हुए भी चल ही मालूम होता है। जैसे, चञ्चल
दर्पणमें प्रतिबिम्बित मुख एवं चञ्चल जलम प्रतिबिम्बित चन्द्रमा स्वयं
अचल होते हुए भी चलता हुआ मालूम होता है, यह भी देखना
चाहिये ।
"कहीं चल और कहीं अचल, इस प्रकारकी विभिन्न प्रतीतियोंका
कलह क्यों हो ? सर्वत्र चल ही क्यों न प्रतीत हो" यदि ऐसा कहो तो
यही उत्तर होगा कि जो जो अवयव चलते हैं, वहाँ वहाँ सर्वत्र ही वह
अवयवी चल ही प्रतीत होता है इसमें कोई अनुपपत्ति नहीं है। किन्तु
अचल अवयवोंमें वह चल क्योंकर प्रतीत होगा ?
'तो भी चल-आश्रयमें चल और अचल आश्रयमें अचलरूपमे अव
यवीकी प्रतीति मानी जाय तो, जैसे चञ्चल जलमें चल प्रतीत होते
हुए और निश्चल जलमे निश्चल प्रतीत होते हुए चन्द्रमामे द्वैतबुद्धि होती
है अर्थात् चन्द्रमा दो मालूम देता है, वैसे ही चल और अचल अव-