आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः २५५
रक्तरक्तविरोध इति चेन्न, भ्रान्तत्वात् । तन्मूलरागि-
द्रव्यसंयोगासंयोगविरोधोऽस्त्विति चेन्न, परमाणुवादिनं प्रति
प्रागेव परिहृतत्वात् । इतरं प्रति का वार्तेति चेत्, सैव तावत्,
तथैवाविरोधात् । प्रकारभेदेनापि विरोधाभ्युपगमे व्याप्तेर-
सिद्धेः, संयोगतदभावयोरेवासिद्धेः ।
महच्चारमात्रस चलाचलत्व और युतसिद्धत्व (असम्वद्ध-विद्यमानत्व)
में व्याप्ति निश्चय नहीं हो सकता है ।
यदि कहो कि—रक्त और अरक्तका विरोध अवयवीका बाधक
होगा । अर्थात् जहाँ पटका कुछ भाग रक्त हो और कुछ भाग अरक्त
हो, यहाँ यदि एक अवयवी माना जाय तो एक ही वस्तुमे रक्त और
अरक्त दो विरोधी स्वरूपकी प्रतीति नहीं होनी चाहिये, किन्तु होती है।
अतः एक अवयवी मानना असंगत है—तो ऐसा नहीं कह सकते ।
क्योंकि यहाँ “रक्तः पट.” यह प्रतीति ही भ्रान्त है । अर्थात् पट वस्तुतः
अरक्त ही है । उसके अवयवोंमें ही कुछ रक्त होते हैं और कुछ
अरक्त । अतः विरोध कहाँ है ?
यदि कहो कि—पटमें रक्तत्वभ्रमका मूल जो रङ्गद्रव्यका संयोग है,
उसीको लेकर विरोध होगा । अर्थात् उसी पटमे रङ्गका संयोग भी है,
जिससे वह रक्त मालूम पड़ता है । तथा रङ्गका संयोगाभाव भी है,
जिससे कुछ हिस्सोंमें अरक्त भी है । इस प्रकार एक ही वस्तुमें रङ्ग-
संयोग और रङ्गसंयोगाभावके भी होनेमें विरोध होनेसे अवयवीकी सिद्धि
नहीं हो सकती है—तो ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि ज्ञानातिरिक्त-
परमाणुवादीके प्रति क्षणभङ्ग खण्डनके अवसरपर ही इस आक्षेपका
परिहार किया जा चुका है ।
यदि पूछो कि—विज्ञानवादी (परमाणुको भी विज्ञानस्वरूप ही
माननेवाले) के प्रति क्या बात है ?—तो उसके प्रति भी यही बात
है । क्योंकि प्रकारभेदसे अविरोधकी उपपादिका युक्ति यहाँ भी समान
ही है। यदि प्रकारभेदसे भी संयोग और संयोगाभावके होनेमें विरोध
मानो, तो स्वयं संयोग और संयोगाभावनामकी वस्तु ही सिद्ध नहीं
होगी। फिर यह तुम्हारी व्याप्ति कैसे सिद्ध हो सकेगी कि "पटमें यदि