सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 307

२५८ आत्मतत्त्वविवेके
शब्दप्रत्यभिज्ञानवत् संयोगप्रतीतेरन्यथोपपत्तिमात्रेण बा-
धकप्रवृत्तिरिति चेन्न, अनुभवस्य तदनुरूपमुपाधिमुखपिण्डम-
दत्त्वा भ्रान्तत्वेनान्यथोपपत्तौ तद्विपरीतानुमानप्रवर्तनेऽग्नाव-
नुष्णत्वानुमाने प्रवृत्तिप्रसङ्गात् । न च प्रत्यभिज्ञानस्य
सामान्यवत् संयोगप्रत्ययस्य तदनुरूपमुपाध्यन्तरमस्ति ।
अन्योन्याश्रयदोष आ जायगा । क्योंकि संयोगाभाव सिद्ध होनेपर
योग्यानुपलम्भ सिद्ध होगा और योग्यानुपलम्भके सिद्ध हो चुकनेपर ही
संयोभाव सिद्ध हो सकेगा ।
यदि कहो कि—शब्दप्रत्यभिज्ञाके जात्यालम्बन होनेके कारण जैसे
शब्दनित्यत्वबाधक प्रमाणकी प्रवृत्ति हो जाती है, वैसे ही संयोगप्रतीतिकी
भी अन्य प्रकारसे उपपत्ति हो जानेके कारण संयोगबाधक प्रमाणकी
प्रवृत्ति हो जायगी । अर्थात् ' स एवायङ्गकार " यह प्रतीति गत्वजाति
विषयक होनेसे गकारोंकी अभिन्नताको विषय नहीं बनाती है, इसीलिए
शब्दनित्यत्व नहीं सिद्ध हो पाता है, वैसे ही दो द्रव्योंकी अव्यवहित
देशमें उत्पत्ति ही संयोगप्रतीतिका कारण है । अतः संयोगकी भी सिद्धि
नहीं हो सकती है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि अनुभवके
अनुरूप किसी उपाधिरूप मुखपिण्डको बिना उपस्थित किये उस अनुभव
को भ्रामक बताकर उसकी अन्यथा उपपत्ति की जाय और अनुभवके
विपरीत अनुमानकी प्रवृत्ति की जाय तो अग्निके उष्णतानुभवको भी
भ्रामक बताकर उसमें अनुभवविरुद्ध अनुष्णत्वका भी अनुमान होने
लगेगा । अर्थात् वही अनुभव भ्रान्त समझा जाता है, जिसका प्रका-
रान्तरसे उपपादक कोई उपाधि हो । 'स एवाय गकार' इस शब्दाभेद
विषयक प्रत्यभिज्ञाका उपपादक उपाधि गत्वादि जाति है । अर्थात्
गकारव्यक्तिके भिन्न होनेपर भी उसकी गत्व जाति अभिन्न है और वह
जाति ही उस प्रत्यभिज्ञामें भासित होती है । इसीलिये वह प्रत्यभिज्ञा
भ्रामक मानी जाती है तथा शब्दनित्यत्व नहीं सिद्ध हो पाता है ।
किन्तु उसके समान संयोगप्रतीतिका उपपादक उसक अनुरूप कोई
उपाधि है नहीं जिससे संयोगप्रतीतिको भ्रामक समझा जाय और
संयोगकी सिद्धि न हो सके ।