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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 319

२७० आत्मतत्त्वविवेके
संयोगव्यवस्थापनेनैव षट्केन युगपद्योगात् दिग्देशभेदा-
च्छायावृतिभ्यामित्यादयो निरस्ताः।
कथनमें ही वैचित्र्य है, जिसका कोई उपयोग नहीं है। अर्थात् कथन
मात्र की विचित्रतासे दोनोंकी तुल्यगति होनेमे कोई बाधा नहीं है।
बुद्धिके समान परमाणुका भी स्वरूपसे ही अनेक परमाणुओंके
साथ संयोगकी व्यवस्था कर देनेसे ही—
'षट्केन युगपद्योगात् परमाणोः षडंशता।
दिग्देशभेदश्छायावृतिभ्यां चापि चांशता" ॥
इस कारिकाके अनुसार बौद्धोंद्वारा उपस्थित किये गये परमाणुबाधक
प्रमाण भी खण्डित हो जाते हैं१।
१ एक परमाणुका अपने पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर तथा नीचे
रहने वाले छै परमाणुओंके साथ एकसाथ ही संयोग होनेसे उस परमाणु-
में छ भाग सिद्ध होते हैं। एव यह पूर्वीय परमाणु है, यह पश्चिमीय
परमाणु है इस प्रकारका दिग्देशका भेद भी परमाणुको सावयव सिद्ध
करता है। क्योकि सर्वत्र सावयव घटपटादिमे ही पूर्वीय पश्चिमीय
आदिका व्यवहार होता है। एव परमाणुके मूर्तिमान होनेसे उसके
द्वारा छाया तथा आवरण अवश्य पैदा होंगे, इसलिये भी परमाणु
सावयव सिद्ध होता है। क्योकि लोकमें सावयव द्रव्य ही छाया और
आवरण पैदा करते हैं। अत इन पूर्वोक्त हेतुओसे परमाणुको भी
अवयव होना सिद्ध होता है।
किन्तु बौद्धद्वारा दी गयीं यह परमाणुबाधक युक्तियाँ ठीक
नहीं हैं। क्योकि परमाणुका संयोग अनेक परमाणुओंके साथ नहीं
होता किन्तु परमाणुके इर्दगिर्द अनेक दिशाओके साथ ही होता है। अत
अनेक संयोगके आधारपर परमाणुके सावयव होनेका कोई प्रश्न ही
नहीं है। एव पूर्वीय पश्चिमीय आदि व्यवहार भी दिशाभेदोंके कारण
होता है न कि परमाणुके सावयव होनेके कारण। क्योंकि किसी बडे
दण्ड आदिमे, उसके सावयव होनेपर भी उसके मध्यभागकी अपेक्षा करके,
पूर्वीय पश्चिमीय आदि व्यवहार नहीं होते हैं। इसी प्रकार परमाणु
द्वारा छाया और आवरणका होना भी उसके सावयव होनेसे नहीं किन्तु