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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 315

२६६ आत्मतत्त्वविवेके
न प्रथमः, तस्यैकदेशाभावात्, भावे वा परमाणुत्वव्या-
घातात् । न द्वितीयः, परमाण्वन्तरेणासंसर्गप्रसङ्गात् । न ह्यस्ति
सम्भवः, एकत्रैव परिसमाप्तवृत्तिरन्यत्रापि वर्तत इति ।
न, बुद्ध्या समानयोगक्षेमत्वात् । तथाहि, बुद्धिरपि
सन्तमसन्तं वाऽनेकं विषयमालम्बमानाऽऽकारं वा बिभ्रती
कात्स्न्र्येन वा ? एकदेशेन वा ? न प्रथमः, पीतादिविषया-
कारविलोपप्रसङ्गात् । न ह्यस्ति सम्भवो नील एव विषय
आकारे वा परिसमाप्ताऽऽत्मा पीतादिसम्पृक्ताऽऽत्मा चेति ।
न द्वितीयः, तदभावात् । एवमनाकारत्वमविषयत्वं च
इन दोनों प्रकारोंसे अतिरिक्त तीसरा प्रकार नहीं हो सकता । इनमें
प्रथम पक्ष नहीं हो सकता है । क्योंकि परमाणुमें भाग होता ही नहीं
है । यदि उसमें भी भाग हो तो वह परमाणु ही नहीं हो सकता है ।
द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि एक परमाणुके साथ अपने
सम्पूर्णरूपसे संयुक्त हो चुकनेपर दूसरे परमाणुके साथ उसका संसर्ग
नहीं हो सकेगा । कारण, यह संभव नहीं है कि एक ही जगह जिसकी
वृत्ति (रहना) परिसमाप्त हो चुकी हो, वह दूसरी जगह भी रहे । अर्थात्
उक्त युक्तिसे परमाणु भी असिद्ध ही है और विज्ञानमात्र ही तत्त्व है—
तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि विज्ञानके समान ही इसका भी
योगक्षेम है । क्योंकि बुद्धि भी सत् या असत् अनेक विषयको अपना
आलम्बन बनाती हुई अथवा अनेक आकारको धारण करती हुई अपने
सम्पूर्णरूपसे वैसा करती है ? अथवा अपने एक भागसे ? यहां प्रथम
पक्ष नहीं हो सकता है । क्योंकि नीलावगाहिनी बुद्धि यदि सम्पूर्ण रूपसे
नीलालम्बन हो अथवा नीलाकारको धारण करे तो पीतादिविषयरूप
आकारोंका विलोप हो जायगा । कारण, यह कथमपि संभव नहीं
है कि नील आदि विषय या आकारमें बुद्धिका स्वरूप समाप्त भी हो
जाय तथा पीतादि विषयोंसे संपृक्त भी रहे ।
दूसरा पक्ष भी नहीं हो सकता है । क्योंकि बुद्धिके निरवयव होने-
से उसका एकदेश ही असंभव है । यदि कहो कि-उक्त प्रकारसे