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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 310

बाह्यार्थभङ्गवादः २६१
नत्वेतदस्ति । युगपदेकस्यानैकसंसर्गप्रवृत्तमध्यक्षमविशेषात् सर्व-
संसर्गं वा प्रतिक्षिपेत्, न वा कमपि, स्वात्मानमेव वा, सर्वथा
न विरोधं दीपयेत् । अन्ततः परमाणोरप्येकस्यानेकैः परमा-
णुभिः संसर्गस्वीकाराच्चेति ।
एतेन वृत्तिविकल्पो निरस्तः, परमाणुवृत्त्याऽवयविवृत्तेस्तु-
ल्ययोगक्षेमत्वात् ।
सभी तन्तुओंसे पटसंसर्गका निषेध करेगा। अथवा वह प्रत्यक्ष भी
अनेकविषयक होनेसे अनेकसंसर्गी हुआ, अतः अवयवीके समान
अपना भी निषेध कर देगा, किन्तु तद्देशत्व और अतद्देशत्वमें किसी
भी हालतमे विरोध नहीं आने देगा। एव, अन्ततः एक परमाणुका
अनेक परमाणुओंके साथ संसर्गको तुम भी मानते ही हो। जैसी
कि तुम्हारी उक्ति है—“षट्केन युगपद् योगात् परमाणोः षडंशता”।
अर्थात् किसी एक परमाणुका चारो तरफ (आगे, पीछे, दोनों बगल
तथा नीचे और ऊपर) छः परमाणुओंके साथ युगपत् संयोग होनेसे एक
परमाणुका छ भाग सिद्ध होता है ।
इससे वृत्तिसम्बन्धी विकल्प भी खण्डित हो गया । अर्थात् “अवयवी
अपने प्रत्येक अवयवोंमें कृत्स्न (सम्पूर्ण) रूपसे वर्तमान रहे तो एक ही
मे उस अवयवीकी सम्पूर्णसत्ताकी परिसमाप्ति हो जानेसे अन्य अवयवोंमें
वह नहीं रह सकेगा। यदि एकदेशरूपसे रहे तो अवयवोंसे अतिरिक्त
कौन सा एकदेश अवयवी का बचा है, जिस रूपसे अवयवी उन अवयवों-
में रहेगा ? अतः कृत्स्न या एकदेश दोनों रूपसे अवर्तमान होनेके
कारण अवयवी है ही नहीं” ऐसा कहना भी खण्डित हो जाता है ।
क्योंकि परमाणुकी वर्तमानताके समान ही अवयवीकी भी वर्तमानताका
योगक्षेम है। अर्थात् यही प्रश्न एक परमाणुका अन्य परमाणुओंके साथ
संयोग होनेके बारेमें भी किया जा सकता है कि “परमाणु सम्पूर्णरूपसे
सम्बद्ध होता है या एकदेशरूपसे ? यहां यदि उत्तर दो कि एक परमाणु-
में कृत्स्न और एकदेशका विकल्प ही नहीं संभव है, तो वैसे ही एक
अवयवीमें भी कृत्स्न और एकदेशका विकल्प नहीं कर सकते ।