आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः २५७
प्रतीतिनान्तरीयकत्वाच निषेधसिद्धेः । शशविषाणादौ
कल्पितेन निषेध्येन निषेधसिद्धिरिति चेन्न, निराकृतत्वात्,
संयोगस्य वाङ्मात्रेण काल्पनिकत्वसिद्धावतिप्रसङ्गाच्च ।
शशशृङ्गन्यायस्य च योग्यानुपलम्भाभावेनासिद्धेः । इत एव
बाधकात् तत्सिद्धावितरेतराश्रयत्वम् ।
अभिधेयत्व, प्रमेयत्व आदि सत्यसाधर्म्य भी हैं, अतः नियमतः सत्य-
वैधर्म्य नहीं होनेसे संयोगका स्वरूपतः निराकरण नहीं हो सकता है।
तथा उसमें यदि असत्यका वैधर्म्य मानो तो सुतरां सत्यत्व सिद्ध हो
जायगा।
एवं, निषेध्यवस्तुकी प्रतीतिके बिना निषेधकी प्रतीति नहीं हो सकती,
इसलिये भी संयोगका निषेध करनेके लिये निषेध्यरूपमें संयोगकी सत्ता
माननी ही पड़ेगी।
यदि कहो कि—शशशृङ्गके निषेधस्थलमें शशशृङ्गरूप निषेध्यके
कल्पित होनेपर भी निषेधकी प्रतीति हो जाती है, वैसे ही संयोगको
कल्पित मानते हुए भी उसका निषेध सिद्ध हो सकता है—तो ऐसा नहीं
कह सकते। क्योंकि पूर्वमें क्षणिकत्वसिद्धिके लिये दिये गये व्यतिरेकी
अनुमानके खण्डनप्रकरणमें यह बात खण्डित हो चुकी है। एव, बिना
प्रमाणके केवल वचनमात्रसे यदि संयोग काल्पनिक हो जाय तो सर्वा-
नुभूत नीलपीतादि भी काल्पनिक हो जायँगे। साथ ही योग्यानुपलम्भ
नहीं होनेसे शशशृङ्गका न्याय यहाँ नहीं लागू हो सकता है। अर्थात्
शृङ्ग तो महिषादिमें प्रत्यक्षयोग्य है, अतः शशमें उसका अनुपलम्भ
होनेसे शृङ्गका अभाव सिद्ध हो जाता है। किन्तु प्रत्यक्षयोग्य जो
घटादिका संयोग, उसका अनुपलम्भ नहीं होने पर संयोगाभावकी
सिद्धि नहीं हो सकती है। तथा जो संयोग प्रत्यक्षके अयोग्य है, जैसे
परमाणु आदिका संयोग, उसका अनुपलम्भ होनेपर भी योग्यतारूप
विशेषणके नहीं रहनेसे योग्यानुपलम्भ वहाँ भी नही हुआ, इसलिये उस
संयोगका भी अभाव नहीं सिद्ध हो सकता है।
यदि कहो कि—संयोगके काल्पनिक होनेसे संयोगाभाव सिद्ध है
और इसीसे संयोगका योग्यानुपलम्भ भी सिद्ध हो जायगा—तो यहाँ
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