आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 317, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें२६८ आत्मतत्त्वविवेके
तस्या एकरूपत्वात्, तत्¹ कुतः कृत्स्नैकदेशविकल्पोत्थानम् ?
कथं तर्हि तद्विषयिणी तदाकारवती वा ? प्रकारान्तराभावा-
दिति यदि, तदा स्वरूपेणेति ब्रूम इति चेत्—स्फुटं निरटङ्कि
तार्किकनेदिकाविटङ्केन केवलमस्मभ्यमभ्यसूयता दूरहतेवेति ।
एतेन तदतद्देशत्वं निरस्तम् । तथाहि बुद्धेर्नीलाकारतां
परिच्छिन्ददध्यक्षं तदभावव्यवच्छेदमुखेन तदविनाभूतां पीता-
द्याकारतामपि व्यवच्छिन्द्यात् । तथा च कथमेका बुद्धिर्नील-
है। अत बुद्धिके सम्बन्धमें पूर्वोक्त प्रकारसे कृत्स्न (सम्पूर्ण) या
एकदेशका विकल्प कैसे उठ सकता है ?। यदि पूछो कि—कृत्स्न
या एकदेशके अतिरिक्त किसी तृतीय प्रकारके नहीं होने से इन दोनोंके
अभावमे बुद्धि नीलादिको अपना विषय कैसे बना सकेगी ? अथवा
वह नीलादि आकारवाली कैसे हो सकेगी ? तो यही कहूँगा कि
सम्पूर्ण या एकदेश विकल्पके बिना ही स्वरूपसे ही बुद्धि नीलादि
विषयिणी या नीलादि आकारवाली होगी।
उत्तरपक्ष—इस प्रकारसे बौद्ध यदि बुद्धिसम्बन्धी विकल्पका
समाधान करे तो निश्चय ही तार्किकोंके स्थानपर पहुँचा हुआ बौद्धधूर्तने
हमारे साथ केवल असूयावश दूर जाकर अर्थात् अपने ऊपर आये दोषके
निराकरणके अवसरपर यह बात कही। अर्थात् हमारा अवयवी भी
कृत्स्न या एकदेश विकल्पके बिना ही स्वरूपसे ही अवयवोंमें रहेगा, इस
बातको पहले नहीं समझते हुए बहुत बाद तब समझा, जबकि उसकी
बुद्धिके बारेमें भी यही कृत्स्न या एकदेशका विकल्प नैयायिकोंकी
ओरसे उपस्थित किया गया।
इससे (पूर्वोक्त बुद्धिरूप प्रतिवन्दिके द्वारा) परमाणु तथा अवयवीमें
भी तद्देशत्व और अतद्देशत्वका विरोध खण्डित हो गया। क्योंकि
एकदेशमें सम्बद्ध परमाणु और अवयवीका देशान्तरमें सम्बन्ध होनेमे
यदि विरोध हो तो बुद्धिमे नीलाकारताका अनुभव करानेवाला प्रत्यक्ष
उसके नीलाभावाकारताके निषेधद्वारा नीलाभावसे नियत सम्बद्ध
१. तदेतत् इति २ पु० पा०