सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 313

२६४ आत्मतत्त्वविवेके
तथाप्यचित्रे पार्श्वे चित्रप्रत्ययो मा भूत्, धवलप्रत्ययस्तु
कुत इति चेत्, अवयवरूपसञ्चारेणावयविनोऽपि तथा प्रत्य-
यात् । अत एव यत्रावयवरूपं न प्रत्यक्षं तत्र त्रसरेणावेतदपि
नास्ति, दृश्यमेव (वा) ह्यालोकरूपमारोप्य पिञ्जरस्त्रसरेणु-
रालोक्यते ।
स्यादेतत्, यदि चित्रस्य नाम जातिविशेषः, कथं तर्हि
विरुद्धजातीयरूपसमाहारमात्रे चित्रत्वप्रत्यय¹ इति चेत्, न
वै नीलधवलारुणेषु पटेषु क्वचिदपि कार्बुरार्थे² चित्रप्रत्ययः
पूर्वपक्ष—फिर भी जिस अवयवीका एक पार्श्व अचित्र है अर्थात्
धवल है, वहा अवयवीमे चित्रकी प्रतीति भले ही न हो परन्तु उसमे
धवलत्वकी प्रतीति भी कैसे होगी ?
समाधान—इस शङ्काका यही उत्तर होगा कि यहाँ एकभागीय धवल
अवयवके धवलत्वका ही सम्पूर्ण अवयवीमे आरोप हो जानेसे एक
भागसे देखनेवालेको सम्पूर्ण अवयवी ही धवल मालूम पड़ता है । इसी
लिये जहाँ अवयवरूपकी बिल्कुल ही प्रतीति नहीं होती, वहा त्रसरेणुमें
अवयवगत धवलरूपका आरोप भी नहीं होता । त्रसरेणुमें जो भूरापन
की प्रतीति होती है, वह अवयवगतरूपके आरोपसे नहीं होती, क्योंकि
अवयवगतरूप स्वय अदृश्य है । किन्तु दृश्यभूत आलोकके रूपका ही
त्रसरेणुमें आरोप होनेसे वह भूरा मालूम पड़ता है ।
'अस्तु, विभिन्नरूपवाले अवयवोंसे उत्पन्न अवयवीम अभिव्यक्त
चित्रत्व यदि एक जातिविशेष है, तो जहाँ किसी अवयवीकी उत्पत्ति नहीं
होती है, किन्तु विरुद्धजातीय रूपोंका समाहार भर है वहाँ चित्रत्वकी
प्रतीति कैसे होती है' ? ऐसा यदि प्रश्न करो तो यही उत्तर होगा कि
नील, धवल और अरुण पटोंकी ढेर जहा इकट्ठी है, वहाँ कही भी किसी
को भी कर्बुर अर्थमें चित्रशब्दका व्यवहार या चित्रकी प्रतीति नहीं ही
१ चित्रप्रत्यय इति २ पु० पा०
२. वाये वाये इति ३ पु० पा०