आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः २६९
पीताद्याकारा स्यादिति तुल्योऽनुयोगः ।
भवेदेवं यदि नीलाद्याकारतायाः पीताद्याकारत्वाविना-
भावः स्यात्, स एव तु कुतः ? नीलपीताद्याकाराया बुद्धे-
रैकात्म्येनैव निश्चयात् । प्रत्याकारनियतत्वे चित्रप्रतिपत्तेरप्य-
नुपपत्तिरिति चेत्, तदेतत् तुल्यं परमाण्ववयव्यादिष्वपि । न
हि तत्राप्यनेकपरमाणुसंसृष्टस्य परमाणोरनेकावयवसंसृष्टस्या-
वयविनो वा नैकात्मताऽनुभूयते, तथात्वे वा एकस्यानेकसंसर्ग-
प्रतिपत्तिः कदापि न स्यादिति तुल्यैवार्थगतिः । वाचि वैचित्र्यं
तु क्वोपयुज्यत इति ।
पीताद्याकारताको भी बुद्धिमें नहीं होने देगा । ऐसी परिस्थितिमें एक
बुद्धि नील-पीत आदि अनेक आकारवाली कैसे हो सकेगी ? इस प्रकार
परमाणु और अवयवीके ऊपर दिया गया दोष तुल्यरूपसे आपकी बुद्धि
पर भी आ ही जाता है।
यदि कहो कि- बुद्धिमें यह दोष तब आता यदि बुद्धि प्रत्येक आकार-
के साथ अलग अलग नियत रहती तथा नीलाकारताका पीताकारताके
अभावके साथ नियत सम्बन्ध रहता। किन्तु उक्त दोनों ही बातें यहाँ कहाँ
हैं ? क्योंकि नीलपीत आदि अनेक आकारको एकसाथ धारण करनेवाली
बुद्धिमें नील-पीतके भिन्न होनेसे भिन्नता नहीं मानते किन्तु उसमें एका-
त्मता (एकरूपता) ही मानते हैं। कारण, नीलपीत आदि प्रत्येक आकार
के साथ अलग अलग यदि बुद्धिको नियत माना जाय तो चित्राकार
प्रतीति ही नहीं हो सकेगी-तो यह बात परमाणु और अवयवीमे भी समान
ही है । क्योंकि वहाँ भी अनेक परमाणुओंसे संयुक्त परमाणुमें या अनेक
अवयवोंमें आश्रित अवयवीमे एकात्मताका अनुभव न होता हो ऐसी
बात नहीं है । यदि उक्त स्थलोंपर परमाणु और अवयवीमें एकात्मताका
अनुभव न हो तो एकमें अनेकके साथ संसर्गकी प्रतीति कभी न हो सकेगी।
अर्थात् एक सपक्षमें साध्य-साधनरूप अनेकका संसर्ग (सामानाधिकरण्य)
भी न हो सकेगा तथा अनुमानमात्रका उच्छेद हो जायगा । इस प्रकार
बुद्धि और परमाणु तथा अवयवी आदिकी समान ही गति है । केवल