सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

२३४ आत्मतत्त्वविवेके
तानि । तदनुपपत्तौ वा साध्यविकलतया सर्व एवैते दृष्टान्ता-
भासाः । अन्तिमस्तु साधनविकल । सिद्धान्तानां व्या-
घातः परस्परविरहरूपत्वलक्षणः । जलानलयोस्तु वध्यघातक-
स्वभावत्वलक्षणः, न च शब्दसाम्येनानुमानमित्येषा दिक् ।
अस्तु तर्हि दूषणोपक्रमेण विचार इति चेत्, तमपि
पश्याम. कीदृशोऽसाविति । नेदं स्थूलं विरुद्धधर्मसंसर्ग
छिदाक्रिया तथा सिद्धिके प्रति ज्ञानको कर्म सिद्ध करते हो । अर्थात्
बाह्यवस्तु सिद्धिका कर्म तुम्हारी दृष्टिमे भले ही न हो सके किन्तु ज्ञानको
सिद्धिका कर्म तुम भी बताते हो । यदि वैसा न हो अर्थात् कहीं सत्त्व
आदिकी प्रसिद्धि न हो तो सत्त्व आदिका अभावरूप साध्य भी प्रसिद्ध
नहीं हो सकता है । इस प्रकार साध्योंकी अप्रसिद्धिके कारण तुम्हारे
सभी दृष्टान्त साध्यविकल ( साध्यशून्य ) होनेसे दृष्टान्ताभास हो जाते
हैं । अर्थात् दृष्टान्त वे ही हो सकते हैं, जहाँ साध्यका निश्चय हो ।
जल और अग्निरूप अन्तिम दृष्टान्त तो हेतुसे ही रहित हैं। क्योंकि
पक्षभूत सिद्धान्तमे जिस प्रकारका व्याघात है, उस प्रकारका व्याघात
दृष्टान्तभूत जलानलमें नहीं है । कारण, सिद्धान्तोंका व्याघात परस्पर
अभावरूप है, जैसे शब्दनित्यत्व-सिद्धान्त और शब्दानित्यत्व-सिद्धान्त
का । किन्तु जलानलरूप दृष्टान्तमे तो वध्यघातकभावरूप व्याघात है ।
अर्थात् जल अग्निका या अग्नि जलका अभावरूप नहीं है, किन्तु एक
दूसरेका वध्य और घातकरूप है । इस प्रकार दृष्टान्तभूत जलानलमें
सिद्धान्तोंवाला व्याघात है ही नहीं । अत यह दृष्टान्त साधनसे शून्य
हो गया । केवल व्याघातशब्दके साम्यमात्रसे वह दृष्टान्त अनुमानो
पयोगी नहीं हो सकता है । इस तरह स्थापनापक्षमें दूषणोंका दिग्दर्शन
कराया गया ।
अवयविनिषेधका खण्डन
यदि कहो कि—परपक्षदूषणके रूपमे ही विचार किया जाय—तो
उस विचार को भी देखते हैं कि वह कैसा है ? जैसे-घटादि बाह्य स्थूल
नहीं है, क्योंकि यदि स्थूल होता तो उसमें विरुद्ध धर्मोंका संसर्ग नहीं
होता । किन्तु घटादिमे एकभागावच्छेदेन ग्रहण और अन्यभागावच्छे-
देन अग्रहणरूप विरुद्धधर्म देखे जाते हैं । अत वह स्थूल एक

प्रसङ्गात्, नास्थूलं तथाप्रतिभासप्रसङ्गात्, न परापेक्षं सदसद्-
व्यतिरेकप्रसङ्गात्, नैकं तथा प्रतिभासप्रसङ्गात्, नानेकं
भेदव्यवस्थितिप्रसङ्गात्, न च व्यापकं निष्क्रियत्वप्रसङ्गात्,
नाव्यापकम् अविधेयत्वप्रसङ्गादित्यादिरिति चेत्, न, मिथो-
अवयवीरूप नहीं हो सकता है। एव, यह घटादि अस्थूल भी नहीं है,
क्योंकि यदि यह अस्थूल हो तो अस्थूलरूपसे प्रतीति होनी चाहिये,
किन्तु नहीं होती है। अर्थात् घटादि-बाह्य स्थूल भी नहीं है और
अस्थूल भी नहीं है तथा इन दोनोंसे विलक्षण कोई प्रकार भी नहीं है।
इसलिये अगत्या सिद्ध हो जाता है कि वह शून्यरूप है।
एवं, यह घटादि परानपेक्ष अर्थात् अहेतुक नहीं है, क्योंकि यदि
यह अहेतुक होता तो यह आकाशके समान सदातन होता अथवा
शशविषाणके समान सदा असत् ही होता। एव, यह परापेक्ष अर्थात्
अपने होनेके लिये हेतुकी अपेक्षा करनेवाला भी नहीं है, क्योंकि वैसा
होता तो यह सत् और असत् दोनोंसे भिन्न होता। अर्थात् कारण-
व्यापारके पूर्व घट सत् होकर नहीं पैदा होता है एव असत् होकर भी
नहीं पैदा होता है, क्योंकि असत् घटकी उत्पत्ति हो तो घटकारणसे
पटकी भी उत्पत्ति होनी चाहिये। कारण, पूर्वमे जैसे घट असत् है,
वैसे ही पट भी असत् है।
एवं, यह घट एक नहीं है, क्योंकि एक होनेपर वैसी प्रतीति होनी
चाहिये। अर्थात् रूपस्पर्शादिका समुदाय ही घट है। वह यदि एक होता
तो रूपादि का विना भान किये केवल घटमात्रका भान होना चाहिये। घट
अनेक भी नहीं है, क्योंकि अनेक होनेमे भेद व्यवस्थित होने लगेगा,
किन्तु भेद तो आगे दूषित किया जाने वाला है। एवं घट व्यापक नहीं
है, क्योंकि व्यापकमें क्रिया नहीं होनेसे वह भी निष्क्रिय होने लगेगा।
घट अव्यापकभी नहीं है, क्योंकि उसमें अविधेयत्वकी प्रसक्ति होने
लगेगी। अर्थात् अव्यापकत्वका अर्थ है, कहीं असत् होना ओर केवल
सत्त्व ही विधेयत्वका ज्ञापक है। अतः अव्यापक (कहीं असत्)
होनेपर घटमे विधेयत्वका अभाव हो जायगा। इत्यादि पूर्वोक्त प्रकारका
तुम्हारा परपक्षदूषणरूप विचार नहीं हो सकता है-क्योंकि मिथोविरोध,

विरोधमूलशैथिल्येष्टापादनानुकूलत्वविपर्ययापर्यवसानैस्तर्काभा-
सत्त्वात् ।
यथा हि नायं पर्वतो निरग्निः निर्धूमत्वप्रसङ्गात्, नाप्य-
ग्निमान् तथोपलब्धिप्रसङ्गात् इत्यनयोरेक आभासः, परस्परा-
र्थप्रतिक्षेपकतयोरुभयोरनाभासत्वानुपपत्ते, तथाऽत्रापि । न
ह्यस्थूलतादिनिषेधादन्यः स्थूलतादिविधिः, तन्निषेधाद्वान्योऽ-
स्थूलतादिविधिरिति ।
मूलशैथिल्य, इष्टापादन, अनुकूलत्व तथा विपर्ययापर्यवसानके कारण
तुम्हारे सभी तर्क तर्काभासरूप हैं । यहाँ मूलशैथिल्यका अर्थ है—तर्कके
मूलभूत जो आपाद्यापादकका व्याप्तिनिश्चय तथा आपादकका अभ्युपगम
है, उनमें दोनोंका अथवा किसी एकका अभाव होना । इष्टापादनका
अर्थ है—वादिस्वीकृत अर्थका ही आपादन करना । अनुकूलत्वका
अर्थ है—वादिस्वीकृत अर्थकी सिद्धिके ही अनुकूल होना । विपर्यया-
पर्यवसानका अर्थ है—व्यतिरेकव्याप्तिका न होना । मिथोविरोधका
अर्थ तो स्पष्ट है ।
जैसे कि—यह पर्वत निरग्नि नहीं है, क्योंकि वैसा होनेपर यह
निर्धूम (धूमरहित) होने लगेगा । एवं यह अग्निमान् भी नहीं है,
क्योंकि यदि अग्निमान् हो तो वैसी उपलब्धि होनी चाहिये । इन दोनों
अनुमानोंमें एक अवश्य आभास है । क्योंकि एक दूसरेका विरोधी
होनेके कारण दोनों अनाभास (सदनुमान) नहीं हो सकते । वैसे ही
यहाँ भी स्थूलत्वनिषेधका अनुमान तथा अस्थूलत्वनिषेधका अनुमान
इन दोनोंमे एक अवश्य आभास है और एक सही है । क्योंकि
अस्थूलतानिषेधसे भिन्न वस्तु स्थूलताकी विधि नहीं है तथा स्थूलता
निषेधसे भिन्न अस्थूलताकी विधि भी नहीं है । अर्थात् यदि अस्थूल-
त्वका निषेध करोगे तो स्थूलत्वका विधान स्वत हो जायगा तथा
स्थूलत्वका निषेध करोगे तो अस्थूलत्वका विधान अवश्य हो जायगा ।
परन्तु एक साथ दोनोंका निषेध परस्पर विरोधी होनेके कारण कथमपि
सम्भव नहीं है ।

बाह्यार्थभङ्गवादः २३७
शिथिलमूलाश्चैते, प्रतिबन्धस्यासिद्धेः। सिद्धौ वा व्याप्य-
व्यापकतदधिकरणानां सिद्धौ विवाद‌निवृत्तेः। इष्टापादनं च
प्रथमे, अनुभूतावसिते स्थूले विरुद्धधर्मासंसर्गस्येष्टत्वात्। तथा
च वक्ष्यामः।
अनुकूलश्च द्वितीयः, अस्थूलताप्रतिषेधस्य स्थूलतोपलम्भा-
नुग्राहकत्वात् तद्रूपताव्यवहारस्य तथाप्रतिभासव्याप्तत्वाच्च।
एवं तृतीयोऽपि, अनपेक्षत्वप्रतिषेधस्य सापेक्षत्वोपलम्भानुग्राह-
कत्वात् अनपेक्षत्वविधेः सदातनत्वव्याप्तत्वाच्च।
एवं, यहाँके सभी हेतु शिथिलमूल हैं, क्योंकि अनुमानका मूलभूत
साध्यसाधनकी व्याप्ति ही असिद्ध है। कारण, यदि व्याप्ति सिद्ध हो तो
व्याप्तिके प्रयोजक व्याप्य, व्यापक और उनके अधिकरणकी भी सिद्धि
अनायास हो जानेसे सर्वशून्यत्ववाद स्वतः खण्डित हो जाता है। इस
प्रकार हमलोगोंका विवाद ही समाप्त हो जाता है।
एवं, प्रथम "नेदं स्थूलम्" इस अनुमानमें तो मुझे इष्टापत्ति ही है;
क्योंकि निर्विकल्पात्मक अनुभव और सविकल्पात्मक अनुव्यवसायके
द्वारा प्रत्यक्षसिद्ध स्थूलमें विरुद्ध धर्मोंका असंसर्ग तो इष्ट ही है। इस
बातको आगे कहेंगे।
"न अस्थूलम्" यह द्वितीय अनुमान तो मेरे अभीष्टकी सिद्धिके ही
अनुकूल है। क्योंकि अस्थूलताका खण्डन स्थूलतासिद्धिका ही पोषक
है। तथा अस्थूलताका व्यवहार अस्थूलताप्रतीतिसे व्याप्त ही है।
अर्थात् जहाँ वस्तुत अस्थूलता है, वहाँ अस्थूलताकी प्रतीति होती है,
इसमें आपत्ति क्या है?
ऐसा ही "न परानपेक्षम्" यह तृतीय अनुमान भी अनुकूल ही
है। क्योंकि अनपेक्षत्वका खण्डन सापेक्षत्वसिद्धिका ही पोषक है।
तथा अनपेक्षत्वका विधान सदातनत्वसे व्याप्त ही है। अर्थात् जो
वस्तुतः हेत्वनपेक्ष है, वह सदातन भी होता ही है, इसमें भी कोई
आपत्ति नहीं है।

२३८ आत्मतत्त्वविवेके
चतुर्थस्त्वप्रसिद्धव्यापकः, सदसत्त्वस्य विरोधेनैकत्र विधि-
वन्निषेधस्याप्यनुपपत्तेः । पञ्चमस्त्वनुकूल एव, अनेकत्वाभिमते
वस्तुन्येकताप्रतिक्षेपस्यानेकतोपलम्भोपष्टम्भकत्वात् ताद्रूप्य-
व्यवहारस्य तथाप्रतिभासव्याप्तत्वाच्चेति । षष्ठस्त्विष्ट
एवास्माकम् ।
ननु भेदः स्वरूपं वा स्यात्, इतरेतराभावो वा, धर्मान्तरं
वा । न पूर्वः, घटो भिन्न इति सहप्रयोगानुपपत्तेः । नापरः,
"न परापेक्षम्" इस चतुर्थ अनुमानमे आपाद्यभूत व्यापक ही
अप्रसिद्ध है। क्योंकि परापेक्ष माननेमें सदसद्व्यतिरेक (निषेध)
का आपादन किया गया है, जो अनुपपन्न है। कारण, सत्त्व-असत्त्वका
परस्परमें विरोध होनेसे, जैसे एक जगह उनका विधान नहीं हो सकता,
वैसे ही उन दोनोंका एक जगह निषेध भी नहीं रह सकता है।
"न एकम्" यह पञ्चम अनुमान भी अनुकूल ही है। क्योंकि जो
वस्तु अनेकरूपमे अभिमत है, उसमें एकताका खण्डन उसकी अनेकता
सिद्धिका ही पोषक है, तथा एकताका व्यवहार एकताप्रतीतिसे व्याप्त भी
है। अर्थात् जहाँ वस्तुत एकता है, वहाँ एकताकी प्रतीति होनेमे
आपत्ति भी नहीं है।
"नानेक भेदव्यवस्थितिप्रसङ्गात्" यह षष्ठ अनुमान भी तो हमें
इष्ट ही है। क्योकि जो वस्तु अनेक मानी गया है, उसमें भेद भी
व्यवस्थित ही है।
यदि कहो कि—भेद ही नहीं है तो उसकी व्यवस्था कैसे हो सकेगी ?
क्योंकि भेद प्रतियोगिस्वरूप होगा या इतरेतराभावरूप होगा ? अथवा
कोई धर्मान्तर होगा ? इनमें पूर्वपक्ष ठीक नहीं है। क्योकि भेद यदि
घटादिप्रतियोगीस्वरूप हो तो पुनरुक्तिदोषके कारण 'घटो भिन्न" ऐसा
घट और भेदका सहप्रयोग नहीं हो सकता। साथ ही इसमें भेद घटका
विशेषण भी नहीं हो सकता, क्योंकि स्वयं ही कोई अपना विशेषण
नहीं होता है।

प्रतीतावात्माश्रयप्रसङ्गात्, भिन्नप्रतियोगिनिरूपणाद्धि तद्-
भावो निरूप्यस्तन्निरूपणमेव च भेदनिरूपणम् । नोत्तरः, अनव-
स्थाप्रसङ्गात् । तत् कथमसौ व्यवतिष्ठतामिति चेत्—
तत् किं भेदज्ञानमेव नास्ति ? सदपि वा नित्यम् ?
अनित्यमपि¹ वा निर्हेतुकम् ? सहेतुकमपि वा निर्विषयकम् ?
सविषयकमपि वा बाध्यमानविषयकमिति ? तत्र प्रथमः

दूसरा मत भी ठीक नहीं है। कारण, प्रतीतिको लेकर आत्माश्रय
दोषका प्रसङ्ग हो जाता है। क्योंकि परस्पर भिन्नरूपमे प्रतियोगियोंका
ज्ञान होनेपर ही भेदस्वरूप इतरेतराभावका ज्ञान होगा और भेदात्मक
अभावका ज्ञान होनेपर ही भिन्नरूपमे प्रतियोगियोंका ज्ञान हो सकेगा।
इसप्रकार द्वितीयमतमे अन्योन्याश्रयदोष आ जाता है।
तीसरा मत भी ठीक नहीं है। क्योंकि घटपटगत पारस्परिक
भेद यदि कोई धर्मान्तररूप हो तो उभयगत वह धर्मान्तर अभिन्न
है या भिन्न भिन्न है ? यदि अभिन्न है तो उसके योगसे उसका
आश्रयीभूत घटपट परस्पर भिन्न कैसे हो सकते हैं ? यदि वह धर्मा-
न्तर (वैधर्म्य) उभयमे भिन्न भिन्न हो तो उस धर्मान्तररूप भेदमें
एक दूसरा भेद मानना पडेगा। इस प्रकार उसमे भी तीसरा और
तीसरेमे भी चौथा आदि भेद मानना पड़ जानेसे अनवस्थादोष आ
जायगा। अत जब भेद ही असिद्ध है तो पूर्वोक्त षष्ठ अनुमानमे
भेदको व्यवस्थित कहते हुए इष्टापत्ति कैसे दी जा सकती है ?—तो मैं
पूछता हूँ कि क्या भेदज्ञान ही नहीं है ? अथवा होता हुआ भी वह
नित्य है ? या अनित्य होता हुआ भी वह अहेतुक है ? या सहेतुक
होता हुआ भी निर्विषयक है ? अथवा सविषयक होता हुआ भी वह
भेदज्ञान बाध्यमानविषयक है ?
यहाँ सर्वतः विरोध हो जानेसे प्रथमपक्ष ठीक नहीं है। अर्थात्
जो भेदज्ञान सर्वजनानुभवसिद्ध है, उसका निषेध नहीं किया जासकता
है। एव भेदज्ञानका निषेध भी तभी किया जा सकता है, जबकि


१. अनित्यमेव इति २ पु० पा०

सर्वतो विरोधादनुत्तरः। द्वितीयः सुषुप्त्यवस्थानुरोधादुपे-
क्षणीयः। तृतीयोऽपि विरोधादेव। चतुर्थस्तु भेदोल्ले-
खादेव त्याज्यः।
पञ्चमस्तु चिन्त्यते—किमेतेष्वन्यतमात्मा तस्य विषयः ?
तदन्यो वा ? तत्र यद्यन्य एव, किमेताभिर्व्यधिकरणानुपपत्ति-
भिस्तस्य बाध्यते । एवं हि चोरापराधेन व्यक्तमयं माण्डव्य-
निग्रहः स्यात् ।
अथान्यतमात्मा¹, तत्रापि यदि धर्मान्तरमेवेति तत्त्वम्,

प्रतियोगीरूपमें भेदज्ञानकी सत्ता मानी जाय । साथ ही "भेदज्ञान
नहीं है" इस कथनमें स्ववचनविरोध भी है। एव भेदज्ञानके
बिना वादिप्रतिवादियोंकी कथा भी नहीं चल सकती है। अतः प्रथम
पक्ष असङ्गत है।
सुषुप्तिके अनुरोधसे द्वितीयपक्ष उपेक्षणीय है। अर्थात् यदि भेद-
ज्ञान नित्य होता तो सुषुप्ति अवस्था होती ही नहीं। तीसरा पक्ष भी
विरोधके कारण त्याज्य है। अर्थात् जो अनित्य होगा, वह अहेतुक
हो नहीं सकता। चौथा पक्ष भी त्याज्य है, क्योंकि भेदज्ञानमे भेदरूप
विषयका उल्लेख ही है। अतः वह निर्विषयक कहाँ हुआ ? पञ्चम पक्ष
तो विचारणीय है कि भेदज्ञानका विषय पूर्वोक्त स्वरूप, इतरेतराभाव
तथा धर्मान्तर इन तीनोंमे कोई एक है जिसे बाध्यमान बताते हो ? अथवा
इन तीनोंसे अन्य है ? यदि अन्य हो तो अन्यगत पूर्वोक्त सहप्रयोगा-
नुपपत्ति, आत्माश्रय तथा अनवस्थारूप दोषोंसे इन तीनोंका बाध कैसे
हो सकेगा ? क्योंकि सहप्रयोगानुपपत्ति आदि दोष अन्यमे हों और
ये तीनों बाधित किये जायें तो स्पष्ट ही चोरके अपराधसे निरपराध
माण्डव्यको दण्ड देनेके समान यह हो जायगा ।
यदि मानो कि—भेदज्ञानका विषय भेदके पूर्वोक्त तीनों स्वरूपोंमे
ही कोई एक है और वही बाध्यमान है। एव उनमें भी धर्मान्तर


१. अथान्यतमोऽस्य विषय इति २ पु० पा०

बाह्यार्थभङ्गवादः २४१
तदाऽनवस्थाभिया तदधिक एव प्रवाहस्त्यज्यताम्, तस्य कुत-
स्त्यागः ? न ह्यनवस्था प्रतिभासमानमर्थं निवर्तयति, किन्तु
प्रवाहं परिहापयति, गन्धे गन्धान्तरवत् ।
अथेतरेतराभावमेव भेदज्ञानमवलम्बत इति तत्त्वम्,
तत्रापि क्वात्माश्रय ? तेन हि भेदज्ञानमेव न स्यात् । अस्ति
च तत्, ततो हेत्वन्तरमाक्षिपेत्, न तु स्वात्मनि स्वयमहेतुत्वे
स्वयमेव निवर्तते । अविद्यावशादिति चेत्, किञ्चातः ? न
नामक जो तीसरा पक्ष है वही भेदका स्वरूप विवक्षित है तथा
बाध्यमान है—तो अनवस्थाके डरसे उस धर्मान्तर (वैधर्म्य) से
अतिरिक्त दूसरे वैधर्म्योंके प्रवाहका परित्याग भले ही कर दिया जाय,
किन्तु उस भासमान वैधर्म्यका त्याग क्योकर होगा ? क्योंकि अनवस्थाके
द्वारा भासमान अर्थकी निवृत्ति नहीं हो जाती है, किन्तु उसके प्रवाहका
परित्याग हो जाता है। जैसे, जलादिस पृथिवीका भेदक पृथिवीमे गन्ध
गुण माना गया है। किन्तु गन्धका भिन्न करनेके लिय पुन गन्धमे
दूसरे गन्धगुणका अनवस्थादोषसे परित्याग कर दिया जाता है, न कि
प्रत्यक्षभूत पृथिवीगत गन्धका भी परित्याग हो जाता है।
अथवा यह मानो कि—भेदज्ञान इतरेतराभावका ही वस्तुत अपना
आलम्बन (विषय) बनाता है। अर्थात् भेदज्ञानका विषयभूत भेद
इतरेतराभावरूप है और वह बाध्यमान होनेसे अबाध्य है—तो
इस पक्षमे भी आत्माश्रयदोष कहा है ? क्योकि इतरेतराभाव स्वय भेद-
घटित है। इसलिये भेदज्ञान यदि इतरेतराभावके ज्ञानपर ही आश्रित
रहता तो आत्माश्रयके कारण भेदज्ञान होता ही नही, किन्तु वह तो होता
है। अत वह भेदज्ञान अपनी उत्पत्तिके लिये किसी अन्य हेतुका
भले ही आक्षेप कर ले पर ऐसा नही हो सकता कि अपने प्रति स्वय हेतु
न हो सकनेके कारण उसकी अपनी सत्ता ही निवृत्त हो जाय।
यदि कहो कि—अविद्यावशसे भेदज्ञानकी उत्पत्ति होती है। अर्थात्
भेदज्ञान अविद्याकृत है—तो यहाँ अविद्यावशका क्या अभिप्राय है ?
क्या अविद्याके प्रभावसे भेदज्ञान अपने आप हो जाता है, यह अभिप्राय
१६

२४२ आत्मतत्त्वविवेके
ह्यविद्येत्येवा१त्माश्रयनिवृत्तिः, तथा सति घटादयोऽपि कुला-
लादिनिरपेक्षाः स्वयमेव भवेयुः ।
अथात्माश्रयदोषोपहततया तन्न स्वस्यैव कारणम्, ततो
यतः कुतश्चित् तस्य जन्म, तच्च दुर्निरूपमतोऽविद्येत्युच्यत
इति विचारार्थः, नाम्नि तर्हि विवादः । न च तदपि
दुर्निरूपम्, प्रतियोगिरूपत्वेनाप्रतीतावधिकरणप्रतीतिरधिकर-
णस्वभावत्वेनास्मृतौ प्रतियोगिस्मृतिश्चेतरेतराभावग्रहणकारण-
मिति निरूपणात् ।
है ? अथवा अविद्यारूप कारणसे भेदज्ञानकी उत्पत्ति होती है, यह
अभिप्राय है ? इनमे यदि प्रथम पक्ष मानो तो इससे क्या लाभ हुआ ?
क्योंकि अविद्याका प्रभाव मान लेनेमात्रसे आत्माश्रयकी निवृत्ति नहीं
होती है । क्योंकि अविद्या माननेपर भी उसे अपने आप ही होना पडता
है । यदि अविद्याका प्रभावमात्र मान लेनेसे आत्माश्रयकी निवृत्ति हो
जाती हो तो घटादिक भी कुम्हार आदिकी बिना अपेक्षा किये अपने
आप ही पैदा हो जाँय ।
यदि दूसरे पक्षका आश्रय लेते हुए कहो कि—आत्माश्रयदोषसे
उपहत होनेके कारण भेदज्ञान अपना ही कारण नहीं है, किन्तु जिस किसी
कारणसे उस भेदज्ञानकी उत्पत्ति होती है, वह दुर्निरूप है । अर्थात् उस
कारणका स्वरूपनिरूपण नहीं किया जा सकता है, यही अभिप्राय है—
तो कारणके नाममात्रमें विवाद है । क्योंकि कारणकी सत्ता तो तुमन भी
स्वीकार कर ही ली । अत भेदकी व्यवस्थामे कोई बाधा नहीं है ।
साथ ही कारणका निरूपण भी अशक्य नहीं है । क्योंकि प्रतियोगि-
तावच्छेदकरूपसे अप्रतीतिके साथ जो अधिकरणकी प्रतीति और
अधिकरणतावच्छेदकरूपसे अप्रतीतिके साथ जो प्रतियोगीकी प्रतीति, ये
दोना ही प्रतीतियाँ इतरेतराभावग्रहणके कारण हैं । इस प्रकार कारणका
निरूपण किया जा सकता है । अर्थात् भिन्न भिन्न रूपोंमें प्रतियोगी
और अधिकरणका ज्ञान ही उनमें इतरेतराभावप्रत्यक्षका कारण है ।
१ न ह्यविद्येत्येवमात्मा इति १ पु० पा०

बाह्यार्थभङ्गवादः २४३
अथ स्वरूपमेव भेदप्रतिभासस्य विषय इति तत्त्वम्,
तथापि सहप्रयोग एवानुपपन्नस्त्यज्यताम्, भेदेन तु किमपरा-
द्धम्। सोऽपि दृश्यत इति चेत्, नैमित्तिकस्तु स्यात्, न
स्वरूपतः। न हि घटमानय पटमवलोकयेत्यादौ भेदपदमपि
प्रेक्षावानुपादत्ते। व्याख्यायां तु मूढप्रबोधनाय घटः कुम्भ
इतिवत् सहप्रयोगेऽपि न दोषः।
तथापि कः परमार्थः ? यथार्थं त्रयमपि। पटस्य हि
घटात्मनाऽप्रतीतिरघटात्मना च प्रतीतिस्ततो वैशिष्ट्यप्रतीति-
तथा अधिकरणतावच्छेदकसे युक्त अनुयोगीमें प्रतियोगितावच्छेदकका ग्रह
ही उस प्रत्यक्षका प्रतिबन्धक है।
यदि कहो कि-स्वरूप ही भेदप्रतीतिका वस्तुतः विषय है-तो भी
अनुपपन्न होनेसे "घटो भिन्नः" ऐसा घट और भेदका सहप्रयोग भले ही
त्याज्य हो, किन्तु भेदने क्या अपराध किया है? अर्थात् भेद तो तुम भी
स्वीकार करते ही हो। अब केवल उसमें आनेवाले बाधकका ही निरास
हम दोनों को करना है, और वह इस प्रकार होगा कि सहप्रयोगका ही
त्याग किया जाय। यदि कहो-सहप्रयोग भी देखा जाता है, इसलिये
स्वरूपात्मक भेद ही त्याज्य क्यों न माना जाय?-तो ऐसा नहीं कह
सकते। क्योंकि स्वरूपतः भेदका घटादिके साथ प्रयोग नहीं देखा
जाता है किन्तु किसी निमित्तवशात् ही सहप्रयोग होता है। अर्थात्
"घटो भेदः" ऐसा स्वरूपतः प्रयोग नहीं होता किन्तु घटमें वैधर्म्य या
अन्योन्याभावका वैशिष्ट्य सूचित करनेके लिये "घटो भिन्नः" यही
प्रयोग होता है। अतः इस प्रकारके नैमित्तिक सहप्रयोगमें तो कोई
बाधा नहीं है। क्योंकि "घटमानय, पटमानय" इन प्रयोगोंमें कोई
बुद्धिमान् घट-पटपदोंके साथ भेदपदका भी प्रयोग नहीं किया करता
है। व्याख्याके रूपमें तो मूर्खोको समझानेके लिये "घटः कुम्भः" के
समान घट और भेदका भी साथ प्रयोग करनेमें कोई दोष नहीं है।
फिर भी पूछो कि-भेद वस्तुत किं स्वरूप है?-तो यही उत्तर
होगा कि यथायोग्य तीनों ही स्वरूप होगा। क्योंकि पटकी घटरूपमे

or small dot/matra? No, it looks like काई. Wait, let's zoom in: क + ा + ई -> काई!
Wait, look at वैधम्य: does it have a repha?
Above म्य, there is NO repha! It is printed वैधम्य.
Wait, look at इनम: इ न म - no matra on म!

Line 20:
रहता । तथा द्रव्य, गुण और कर्मम स्वरूपात्मक, अन्योन्याभावात्मक
Wait, look at कर्मम: क र्म म - no matra on म!
Look at अन्योन्याभावात्मक:
Wait, look at line 20: स्वरूपात्मक, अन्योन्याभावात्मक
Is it अन्योन्याभावात्मक?
Wait, line 20 has:
रहता । तथा द्रव्य, गुण और कर्मम स्वरूपात्मक, अन्योन्याभावात्मक - wait, where does line 19 end and 20 begin?
Let's check the line breaks in the image:

Let's count lines from the divider:
अप्रतीति होना, एव अघटरूपम प्रतीति होना तथा घटकी अपेक्षा पटमें
वैशिष्ट्य ( धर्मान्तर ) का प्रतीति होना ये तीनों ही अनुभवसिद्ध हैं ।
अर्थात् उक्तप्रतीत

बाह्यार्थभङ्गवाद २५५

र्म्यस्य तु विरोधः, स चैकधर्म्यसमावेश इत्येषा दिक् ।
सप्तमोऽप्यनुकूल एव, घटादौ व्यापकताप्रतिक्षेपस्या-
न्व्यापकतोपलम्भोपष्टम्भकत्वात् व्यापकत्वस्य निष्क्रियत्वव्या-
सक्तत्वाच्च ।
अष्टमस्तु क्वचिदिष्ट एव । यत एव हि क्वचिदनि-
धेयोऽत एव क्वचिद् विधेयोऽव्यापक इति व्यवह्रियते । सर्वत्रे-
ति चेन्न, व्याप्यसिद्धेः विरोधाच्च । न हि यदव्यापकं तत्
और प्रतियोगिसमानाधिकरण जो प्रतीयमान निषेध, वह इतरेतराभाव
कहाता है । वैधर्म्यका लक्षण तो विरोध है, और वह विरोध भी एक
धर्मीमे असमावेशरूप है । अर्थात् घटत्वपटत्वका एक जगह अवस्थित
न रहना ही घटपटका परस्पर वैधर्म्यरूपभेद है । यही संक्षेपमे भेदके
स्वरूपोंका दिग्दर्शन है ।
"घटादिक न व्यापक, निष्क्रियत्वप्रसङ्गात्" यह सप्तम पक्ष भी मेरे
अनुकूल ही है । क्योंकि घटादिमे व्यापकताका खण्डन उसमे अव्यापकता
ज्ञानका ही सहायक है । एवं यह पक्ष मुझे इसलिए भी अनुकूल है,
क्योंकि व्यापकत्व निष्क्रियत्वका व्याप्य होता ही है । अर्थात् जो
व्यापक होता है वह निष्क्रिय होता ही है । अत निष्क्रियत्वप्रसङ्गके
भयसे घटका व्यापक न होना मुझे इष्ट ही है ।
'न अव्यापकम्, अविधेयत्वप्रसङ्गात्' यह अष्टम पक्ष भी कहीं इष्ट
ही है । अर्थात् अव्यापकत्वके द्वारा यदि किसी देशविशेषमे अविधेयत्व-
का आपादन करो तो यह इष्ट ही है । क्योंकि घटाभावस्थलमे घटका
विधान नहीं होता है । चूँकि घट कहीं (अपने अभावस्थलमे )
अविधेय है इसीसे सिद्ध है कि वह कहीं (घटाधिकरणस्थलमे) विधेय
है । इसीकारणसे घटको अव्यापकरूपमे व्यवहृत किया जाता है ।
यदि कहो कि—अव्यापकत्वके द्वारा सर्वत्र अविधेयत्वका आपादन
किया जा रहा है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि अव्यापकत्व और
सार्वत्रिक अविधेयत्वमे व्याप्ति ही असिद्ध है तथा दोनोमें परस्पर विरोध
भी है । क्योंकि जो अव्यापक होता है वह सर्वत्र अविधेय होता है,

२४६ आत्मतत्त्वविवेके

सर्वत्राविधेयमिति प्रतिबन्धः। क्वचिदस्तीत्यव्यापकार्थः,
सर्वत्र नास्तीति चाविधेयार्थस्तवाभिमतस्तदनयोर्विरोधोऽपि
स्यात् ।
यद् विधेयस्वभावं तत् कथं प्रतिषेध्यमिति चेन्न, प्रतिषेध-
स्वभावता हि विधेयस्य विरुद्धा न तु प्रतिषेधप्रतियोगिताऽपि ।
अथ योऽस्ति कथं तस्य प्रतिषेधोऽप्यस्तीति चेत् , को दोषः ?
अनयोरविरोधप्रसङ्ग इति चेत्, प्रकारभेदेन प्रसङ्गो ( क्तो )
ऽपि न दोषमावहति । तदभेदेन तु विधिनिषेधौ केन

ऐसी व्याप्ति नहीं है। साथ ही कहीं अस्तित्ववाला होना अव्यापकका
अर्थ है तथा सर्वत्र न होना अविधेयत्वका अर्थ है, यही तुम्हारा अभि-
मत है। अतः इन दोनोंमें विरोध भी होगा। अर्थात् जो कहीं
स्थलविशेषमें है उसे कैसे कहा जा सकता है कि वह सर्वत्र ही नहीं
है। इस प्रकार आपका आपाद्य आपादक परस्परका ही विरोधी है।
यदि कहो कि—जो विधेयस्वभाव है, वह प्रतिषेध्य कैसे हो सकता
है ?—तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि विधेयवस्तुकी प्रतिषेधरूपता
विरुद्ध है, न कि प्रतिषेधका प्रतियोगी ( प्रतिषेध्य ) होना भी। अर्थात्
भावात्मक वस्तु अभावात्मक नहीं हो सकती है पर अभावका प्रतियोगी
क्यों नहीं हो सकती है ? यदि कहो कि—जो है, उसका प्रतिषेध भी कैसे
हो सकता है ?—तो इसमें क्या दोष है ? यदि कहो कि—अस्तित्व और
निषेध इन दोनोंमें अविरोधका प्रसङ्ग हो जायगा, यही दोष है—तो
प्रकारभेदसे ( अवच्छेदकभेदसे ) एकहीमें अस्तित्व और निषेधका
प्रसङ्ग भी दोषावह नहीं होगा। अर्थात् एक ही वृक्षमें शाखावच्छेदेन
वानरका संयोग भी रहता है और मूलदेशावच्छेदेन उसके संयोगका
अभाव भी। इस प्रकार एक ही जगह प्रकारभेदसे अस्तित्व और निषेध
दोनोंके होनेमें कोई विरोध नहीं है। भिन्न भिन्न जगहोंमें अस्तित्व और
निषेध होनेमें तो विरोधकी गन्ध भी नहीं है।
किंतु अवच्छेदककी ( प्रकारकी ) अभिन्नताकी अवस्थामें एक ही
जगह विधि और निषेधको कौन मानता है

[Header] बाह्यार्थभङ्गवादः २४७

स्वीकृतौ यं प्रत्यविरोधः प्रसज्येतेति । एतेन कालभेदादिना
ऽप्यविरोधो द्रष्टव्यः ।
अस्तु तर्हि स्थूलघाती विरुद्धधर्माध्यासो ग्रहणाग्रहणादिः
पञ्चविधः, न, असिद्धेः ।
तथाहि, यो येन यत्रैव यदैवोपलभ्यते स तेन तत्रैव तदैव
नोपलभ्यत इति नानुभवः, नाप्यभ्युपगमः । एकावयव-
सहितस्योपलम्भेऽन्यावयवसहितस्यानुपलम्भ इति चेत्, एवं

प्रसङ्ग दिया जा सके। इसीप्रकार देशभेद या अवच्छेदकभेदके नहीं
रहनेपर भी केवल कालभेदसे भी एक ही वस्तुके विधि और निषेधमे
कोई विरोध नहीं होता, ऐसा जानना चाहिये। जैसे, घटादिकार्यका
एक ही कपालमें उत्पत्तिकालके अनन्तर अस्तित्व रहता है तथा प्रागभाव
या प्रध्वंसकालमे नास्तित्व रहता है।
यदि कहो कि—पूर्वोक्त युक्तियोंसे अवयवीका निषेध भले ही न हो
सके, परन्तु ग्रहणाग्रहण, आवृत्तत्वानावृत्तत्व, कम्पाकम्प, रक्तरक्त तथा
संयुक्तासंयुक्तरूप विरुद्धधर्मोंका पञ्चविध अध्यास ही अवयवीका विरोधी
होगा। अर्थात् यदि अवयवोंसे भिन्न कोई एक अवयवी होता तो एक ही
क्षणमें एक ही वस्तु गृहीत अगृहीत, आवृत अनावृत, कम्पमान अकम्पमान
रक्त अरक्त तथा संयुक्त असंयुक्त नहीं होती, किन्तु होती है, इससे
सिद्ध होता है कि अवयवातिरिक्त एक अवयवी नहीं होता—तो ऐसा
नहीं कह सकते। क्योंकि जो विरुद्ध हैं, उनका अध्यास ही असिद्ध है,
तथा जिनका अध्यास है, उनमें विरोध नहीं है। क्योंकि जो वस्तु
जिस व्यक्तिके द्वारा जिस स्थलमे जिस क्षण उपलब्ध होती है, वही
वस्तु उसी व्यक्तिके द्वारा उसी स्थलमे उसी क्षण अनुपलब्ध रहती है,
ऐसा न अनुभव है और न ऐसी किसीकी मान्यता है।
यदि कहो कि—एकावयवके साथ उस वस्तुकी उपलब्धिदशामे ही
अन्यावयवोंके साथ उसकी अनुपलब्धि भी होती है। अर्थात् एक ही
घट एकही क्षणमे एकही व्यक्तिके द्वारा एक भागमे दिखाई पड़ता है
और दूसरे भागमें नहीं दिखाई देता। अतः ग्रहणाग्रहणरूप विरुद्ध

२४८ आत्मतत्त्वविवेके
तदवयविन्युपलभ्यमाने कश्चिदवयव उपलभ्यते कश्चिन्नेति
वाक्यार्थः, सविशेषणे हि विधिनिषेधौ विशेषणमुपसङ्क्रामत
इति न्यायात् । तथा चावयवानामुपलम्भानुपलम्भा-
ववयविनि सञ्चार्य प्रसङ्गस्तदलमेनेन ।
एतेनावृतत्वानावृतत्वं व्याख्यातम् । अनावरणदशावत्
कतिपयावयवावरणेऽपि तथाविधस्थौल्योपलम्भः किं न
स्यादिति त्ववशिष्यते । तदप्यसत् । तस्य परिमाणगत-
धर्मोंका अध्यास असिद्ध नहीं है—तो ऐसी परिस्थितिमें आपके कथनका
यही अर्थ होता है कि अवयवीकी उपलब्धिदशामें कोई अवयव उपलब्ध
होता है और कोई नहीं उपलब्ध होता । क्योंकि विशेषणसहित विशेष्य
में होनेवाले विधिनिषेध विशेषणमें ही उपसङ्क्रान्त होते हैं । अर्थात्
वहाँ फलतः विशेषणका ही विधि या निषेध होता है । इस प्रकार
वस्तुतः अवयवगत उपलब्धि और अनुपलब्धिको आपने अवयवीमे
सञ्चारित कर अवयवी निषेधके लिये उक्त प्रकारका प्रसङ्ग दिया है,
किन्तु ऐसा प्रसङ्ग न दें ।
इससे अवयवीका एकही कालमे आवृतत्व और अनावृतत्वसम्बन्धी
अध्यासका भी व्याख्यान हो जाता है । अर्थात् कुछ अवयव ही आवृत
होते हैं और कुछ अनावृत । अवयवी तो अनावृत ही रहता है । अतः
अवयवीमें आवृतत्व अनावृतत्व उभयका एक कालमे समावेश नहीं
होनेसे विरोध कहाँ होता है ? जो अवयवीका बाधक हो ।
यहाँ एक शङ्का अवश्य बच जाती है कि जिस प्रकार सम्पूर्णरूपमें
अवयवीकी अनावरणदशामें उसकी द्विहस्तत्व त्रिहस्तत्वादिरूप स्थूलता
की उपलब्धि होती है, उसी प्रकार कुछ अवयवोंका आवरण हो जानेपर
भी उसके द्विहस्तत्व त्रिहस्तत्वादिरूप परिमाणकी उपलब्धि होनी
चाहिये । क्योंकि अवयविवादीके मतानुसार वह अवयवी अनावृत ही है ।
किन्तु यह शङ्का भी ठीक नहीं है । क्योंकि परिमाणगत उस द्विहस्तत्व
त्रिहस्तत्वादिरूप जातिविशेषको—जो उस अवयवीसे भिन्न वस्तु है
तथा किसी नियत सामग्रीसे ही जाना जाता है, उस नियत सामग्रीके
अभावमें, अवयवीकी और उसके सामान्यपरिमाणकी उपलब्धि होनेपर

बाह्यार्थभङ्गवादः [२४९]

सामान्यविशेषस्य ततोऽन्यस्य नियतसामग्रीवेद्यस्य तदभावे
तदुपलम्भेऽप्यनुपलम्भात् ।
एतेन कम्पाकम्पसंसर्गो निरस्तः । सामग्रीभेदेनावयव-
नियतकम्पोत्पादे तस्यां दशायामवयविनो निश्चलत्वात् । एवं
तर्हि कम्पाकम्पयोरवयवयोर्र्विभागात् संयोगनाशे द्रव्यनाशः
स्यादिति चेत्, ततः किम् ? अपसिद्धान्त इति चेन्न, एवमपि
क्वचिदभ्युपगमात् । सर्वत्रैव' प्रसङ्ग इति चेत्, तथाप्यवयविनः
किमत्याहितम् ? न चैवमपि, कर्मणो द्रव्यारम्भकसंयोगप्रती-


भी—प्रतीति नहीं होती है। अर्थात् कुछ अवयवोंके आवरणकालमें भी
वह अवयवी तथा उसका सामान्यपरिमाण उपलब्ध होता है। किन्तु यह
अवयवी दो हाथका है या तीन हाथका है, इसप्रकारके विशेष परिमाण-
की उपलब्धि इसलिये नहीं होती है कि उस विशेषपरिमाणकी भी
उपलब्धिक। कारण एक निश्चित सामग्री है, जो अवयवोंकी आवरण-
दशामें नहीं है।
असिद्ध होनेके कारण अवयवोंमें एक कालमें कम्प और अकम्परूप
विरुद्ध धर्मोंका समावेश भी खण्डन हो गया। क्योंकि सामग्रीविशेषसे
कतिपय अवयवमात्रमें कम्पोत्पाद होनेपर भी उस दशामें अवयवी तो
निष्कम्प (निश्चल) ही रहता है।
यदि कहो कि—कुछ अवयवोंमें कम्पन और कुछ अवयवोंमें अक-
म्पनके माननेपर उन अवयवोंमें परस्पर विभाग होनेसे संयोगका नाश
हो जायगा और संयोगनाश होनेसे द्रव्यका नाश हो जाना चाहिये—
तो इससे क्या हुआ ? यदि कहो—अपसिद्धान्त होगा—तो ऐसा नहीं
हो सकता। क्योंकि ऐसा भी कहीं स्थलविशेषमें माना ही जाता है।
यदि कहो—सर्वत्र ही अवयवी द्रव्यका नाश होने लगेगा—तो इससे
अवयवि-सिद्धिमें क्या बाधा हुई ? अर्थात् अवयवसंयोगके नाशसे
अवयविनाशकी प्रसक्ति भले ही हो जाय किन्तु अवयवी तो सिद्ध हो ही
गया। साथ ही अवयवि-नाशकी प्रसक्ति भी नहीं है। क्योंकि अव-
यवगत कर्मसे द्रव्यारम्भक संयोगका विरोधीभूत अवयवविभाग अवश्य

२५० आत्मतत्त्वविवेके
द्वन्द्वविभागजनननियमानभ्युपगमात्। कारणविशेषात् कस्य-
चिदेव कर्मणस्तथाभूतविशेषोपलब्धेः।
एतेन पाणौ चलति तन्मूलभूतः परमाणुरपि चलेत्,
ततोऽचलत्तद्भुजपरमाणोर्विभागः, ततो यो येन संयुज्यते
विभज्यते वा स तत्कार्यद्रव्येणापीति न्यायेन भुजपाण्योरपि
विभागः, ततः संयोगनाशः, ततः शरीरनाश इति
निरस्तम्। न हि पाणिपरमाणुक्रिया भुजपरमाणुर्विभाग-
मारभते नियमेन।
पैदा हो जायगा, यह नियम अमान्य है। अर्थात् अवयवोंके जिन
संयोगोंसे द्रव्यका आरम्भ (उत्पत्ति) होता है, अवयवमें क्रिया होनेपर
उन संयोगोंके विरोधी (अवयवीको नष्ट कर देनेवाले) विभागकी
उत्पत्ति होती ही है, ऐसा नियम मान्य नहीं है। ऐसा माननेपर विकास
होनेपर कमलका नाश होना मानना पड़ जायगा और यह वही कमल
है, ऐसी प्रत्यभिज्ञा नहीं होनी चाहिये। हां, विशेषकारणवश कुछ ही
कर्म द्रव्यारम्भक संयोग के विरोधीभूत विभागको पैदा करते हुए पाये
जाते हैं, न कि नियमितरूपसे सभी कर्म।
सभी अवयवकर्मों में द्रव्यारम्भकसंयोगविरोधी-विभागजनकत्वका
नियम नहीं माननेसे यह आशङ्का भी खण्डित हो जाती है कि—हाथके
चल होनेपर उसका मूलभूत परमाणु भी चल हो उठेगा, उसके बाद उस
क्रियाशील हस्तपरमाणुका अचल भुजपरमाणुके साथ विभाग हो जायगा।
तदनन्तर “जो जिससे संयुक्त होता है या विभक्त होता है, वह उसके
कार्यद्रव्यसे भी संयुक्त या विभक्त हो जाता है” इस नियमके अनुसार
द्व्यणुकादि-विभागके क्रमसे हाथ और भुजा में भी विभाग हो जायगा।
उसके बाद शरीरका आरम्भ करनेवाले हाथ और भुजाका संयोग नष्ट हो
जायगा तथा उसके बाद शरीरका भी नाश हो जायगा—कारण, हाथ
और उसके परमाणुमे क्रिया होनेसे भुजा और उसके परमाणुके साथ
विभाग पैदा हो जायगा, ऐसा नियम नहीं है।

तदनारम्भकत्वे कर्मलक्षणक्षतिरिति चेन्न, आकाशा-
दिदेशविभागजननादपि तदुपपत्तेः, नुद्यकर्मवत्। कुतोऽयं
विशेष इति चेत्, कारणविशेषादित्युक्तम्।
एवं तर्हि यद्यवयवकम्पेऽप्यकम्प एवावयवी, हन्तावयव-
संयोगिविभागिभ्यामाकाशादिदेशाभ्यां न संयुज्येत न
विभज्येतेति चेन्न, अवयवसंयोगविभागाभ्यामेव तत्सिद्धेः।
एतच्च सम्यगवबोद्धुं वैशेषिकमनु¹सन्धेयम्। तर्हि चलदव-
यवसमाश्रितोऽप्यचलन्नेत्रावयवुपलभ्येतेति चेत्, नेदमनिष्टम्,
यदि कहो कि—उक्तक्रिया यदि उक्त विभागको पैदा न करे तो
“संयोगविभागयोरनपेक्षं कारणं कर्म” इस कर्मलक्षणकी ही उस क्रियामे
अव्याप्ति हो जायगी—तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि आकाशादि-
देशके साथ विभाग पैदा करनेसे भी उसमे कर्मलक्षणकी संगति हो
जाती है। जैसे, नुद्य (ठेली जाती हुई) वस्तुमे होनेवाली क्रियासे
नोदक (ठेलनेवाले व्यक्ति) के साथ विभाग नहीं पैदा होनेपर भी
आकाशादिके साथ विभाग पैदा करनेके कारण ही उस नुद्यनिष्ठ कर्ममे
कर्मका लक्षण संगत हो जाता है। यदि पूछो कि—कुछ कर्म द्रव्या-
रम्भक संयोगका विरोधी विभाग पैदा करता है और कुछ कर्म नहीं,
इस प्रकारकी विशेषता कर्मोंमे कहाँसे आती है? तो पहले ही बता चुका
हूँ कि कारणगत विशेषतासे कर्मोंमे उक्त विशेषता आती है।
यहाँ यह शङ्का भी नहीं हो सकती है कि-इस प्रकार यदि अवयवमे
कम्प होनेपर भी अवयवी निष्कम्प ही रहे, तब तो हाय! आपका
अवयवी अवयवसंयुक्त आकाशसे न तो संयुक्त ही होगा और न अव-
यवके साथ विभक्त आकाशसे विभक्त ही होगा—क्योंकि अवयवीके
निष्कम्प माननेपर भी आकाशके साथ हुए अवयवके ही संयोग और
विभागद्वारा अवयवीका भी संयोग और विभाग सिद्ध हो जायगा।
अर्थात् कारणके संयोग और विभागसे कार्यका भी संयोग और विभाग
हो जाता है। इस तत्त्वका अच्छी तरह ज्ञान करनेके लिए वैशेषिक-
शास्त्रका अनुशीलन करना होगा।
१. मधोष्य इति २ पु० पा० ।

३५२ आत्मतत्त्वविवेके
पाणौ कम्पमाने शरीरं न कम्पत इति प्रत्ययात् ।
अथवा यो यदाश्रिततयोपलभ्यते स तस्मिंश्चलत्य-
चलोऽपि चल एव विभाव्यते दर्पणमुखवत् जलचन्द्रवच्चेत्यपि
द्रष्टव्यम् ।
कृतं प्रतीतिकलहेन, एवमपि सर्वत्र चल एवोपलभ्येतेति
चेन्, चलत्यवयवे सर्वत्र तथैवेति न किञ्चिदनुपपन्नम् । अचले
तु कथं तथोपलभ्यताम् ?
तथापि चलाचलाश्रयस्य चलाचलतया प्रतीतौ चलाचल-
जलचन्द्रवत् द्वैतप्रत्ययोऽपि स्यादिति चेन्, स्यादपि यद्याश्रय-
विच्छेदः स्यात् । न ह्येकस्मिन्नेव जलेऽविच्छिन्नावयवभेदेन

"तब तो क्रियाशील अवयवोंपर आश्रित भी अवयवी स्वयं निष्क्रिय ही
मालूम होना चाहिये" ऐसा दोष दो तो यह मेरे लिये अनिष्ट नहीं है ।
क्योंकि हाथ कँपनेपर भी शरीर नहीं कँपता है, यह सबको अनुभव है।
अथवा, जो जिसके आश्रित होकर उपलब्ध होता है, वह उसके चलते
समय अचल होते हुए भी चल ही मालूम होता है। जैसे, चञ्चल
दर्पणमें प्रतिबिम्बित मुख एवं चञ्चल जलम प्रतिबिम्बित चन्द्रमा स्वयं
अचल होते हुए भी चलता हुआ मालूम होता है, यह भी देखना
चाहिये ।
"कहीं चल और कहीं अचल, इस प्रकारकी विभिन्न प्रतीतियोंका
कलह क्यों हो ? सर्वत्र चल ही क्यों न प्रतीत हो" यदि ऐसा कहो तो
यही उत्तर होगा कि जो जो अवयव चलते हैं, वहाँ वहाँ सर्वत्र ही वह
अवयवी चल ही प्रतीत होता है इसमें कोई अनुपपत्ति नहीं है। किन्तु
अचल अवयवोंमें वह चल क्योंकर प्रतीत होगा ?
'तो भी चल-आश्रयमें चल और अचल आश्रयमें अचलरूपमे अव
यवीकी प्रतीति मानी जाय तो, जैसे चञ्चल जलमें चल प्रतीत होते
हुए और निश्चल जलमे निश्चल प्रतीत होते हुए चन्द्रमामे द्वैतबुद्धि होती
है अर्थात् चन्द्रमा दो मालूम देता है, वैसे ही चल और अचल अव-

बाह्यार्थभङ्गवादः [L] २५३

द्विचन्द्रभ्रमो नाम । किन्तु स एवैकस्थले चल उपलभ्यतेऽचले
त्वचल इति । वीचिषु सोऽपि सहस्रनिभ इति चेत्, एव-
मेतत्, तासां विच्छेदेनाकलनात् ।
अस्तु तर्हि चलाचलयोर्युतसिद्धिप्रसङ्ग इति चेन्न, स्वयं
प्रतिबन्धासिद्धेः । न च प्रसङ्गे व्याप्तावपि पराभ्युपगमः
शरणम् । न चैवं पराभ्युपगमोऽपि । वस्त्रोदकादौ दृश्यते
तावदयमिति चेन्न, तन्तुवस्त्रादौ विपर्ययस्यापि दर्शनात् ।


यवोमे आश्रित अवयवी भी दो मालूम होना चाहिये” ऐसा कहो तो,
यह हो भी सकता है, यदि आश्रयोंका परस्पर विच्छेद हो जाय ।
क्योंकि जिसका अवयव विच्छिन्न नहीं हुआ है, ऐसे एक ही जलमे
दो चन्द्रमाका भ्रम कभी नहीं होता । किन्तु एक ही चन्द्रमा चल
जलमे चल प्रतीत होता है और अचल जलमे तो अचल । यदि कहो
कि—तरङ्गोंमे तो वह भी हजारके समान मालूम देता है—तो हाँ,
ऐसा ही होता है । क्योंकि वहाँ तरङ्गें भी हजाररूपमे विच्छिन्न हुई
मिलती हैं ।
यदि कहो कि—हाथकी चलावस्थामे शरीर यदि अचल ही रहे तो
हाथ और शरीर दोनोकी युतसिद्धि होने लगेगी । अर्थात् हाथ और
शरीर दोनो परस्पर असम्बद्ध होते हुए भी कायम रहें—तो इस प्रकारका
आपादन क्षणिकवादी नहीं कर सकता है । क्योंकि स्वयं क्षणिकवादके
अनुसार चलाचलत्व और युतसिद्धत्वमे व्याप्ति ही असिद्ध है । अर्थात्
हाथ और शरीरमे युतसिद्धत्वकी सिद्धिके लिए दोनोंको कम से कम
तीन क्षण तक स्थायी मानना पड़ेगा । जैसे, प्रथम क्षणमे दोनोंका
परस्पर सम्बद्ध होकर रहना, द्वितीय क्षणमे हाथका चल होकर शरीरसे
अलग होना और तीसरे क्षणमे दोनोंका असम्बद्ध होकर कायम रहना ।
किन्तु क्षणिकवादमे एक क्षणसे अधिक किसी वस्तुकी सत्ता ही नहीं
रहता, फिर तदनुसार युतसिद्धत्वका आपादन क्षणिकवादी कैसे कर
सकता है ?
यहाँ ऐसा नहीं कह सकते कि—प्रसङ्ग देनेमे व्याप्तिके बारेमें भी