आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः २४१
तदाऽनवस्थाभिया तदधिक एव प्रवाहस्त्यज्यताम्, तस्य कुत-
स्त्यागः ? न ह्यनवस्था प्रतिभासमानमर्थं निवर्तयति, किन्तु
प्रवाहं परिहापयति, गन्धे गन्धान्तरवत् ।
अथेतरेतराभावमेव भेदज्ञानमवलम्बत इति तत्त्वम्,
तत्रापि क्वात्माश्रय ? तेन हि भेदज्ञानमेव न स्यात् । अस्ति
च तत्, ततो हेत्वन्तरमाक्षिपेत्, न तु स्वात्मनि स्वयमहेतुत्वे
स्वयमेव निवर्तते । अविद्यावशादिति चेत्, किञ्चातः ? न
नामक जो तीसरा पक्ष है वही भेदका स्वरूप विवक्षित है तथा
बाध्यमान है—तो अनवस्थाके डरसे उस धर्मान्तर (वैधर्म्य) से
अतिरिक्त दूसरे वैधर्म्योंके प्रवाहका परित्याग भले ही कर दिया जाय,
किन्तु उस भासमान वैधर्म्यका त्याग क्योकर होगा ? क्योंकि अनवस्थाके
द्वारा भासमान अर्थकी निवृत्ति नहीं हो जाती है, किन्तु उसके प्रवाहका
परित्याग हो जाता है। जैसे, जलादिस पृथिवीका भेदक पृथिवीमे गन्ध
गुण माना गया है। किन्तु गन्धका भिन्न करनेके लिय पुन गन्धमे
दूसरे गन्धगुणका अनवस्थादोषसे परित्याग कर दिया जाता है, न कि
प्रत्यक्षभूत पृथिवीगत गन्धका भी परित्याग हो जाता है।
अथवा यह मानो कि—भेदज्ञान इतरेतराभावका ही वस्तुत अपना
आलम्बन (विषय) बनाता है। अर्थात् भेदज्ञानका विषयभूत भेद
इतरेतराभावरूप है और वह बाध्यमान होनेसे अबाध्य है—तो
इस पक्षमे भी आत्माश्रयदोष कहा है ? क्योकि इतरेतराभाव स्वय भेद-
घटित है। इसलिये भेदज्ञान यदि इतरेतराभावके ज्ञानपर ही आश्रित
रहता तो आत्माश्रयके कारण भेदज्ञान होता ही नही, किन्तु वह तो होता
है। अत वह भेदज्ञान अपनी उत्पत्तिके लिये किसी अन्य हेतुका
भले ही आक्षेप कर ले पर ऐसा नही हो सकता कि अपने प्रति स्वय हेतु
न हो सकनेके कारण उसकी अपनी सत्ता ही निवृत्त हो जाय।
यदि कहो कि—अविद्यावशसे भेदज्ञानकी उत्पत्ति होती है। अर्थात्
भेदज्ञान अविद्याकृत है—तो यहाँ अविद्यावशका क्या अभिप्राय है ?
क्या अविद्याके प्रभावसे भेदज्ञान अपने आप हो जाता है, यह अभिप्राय
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