आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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द्वन्द्वविभागजनननियमानभ्युपगमात्। कारणविशेषात् कस्य-
चिदेव कर्मणस्तथाभूतविशेषोपलब्धेः।
एतेन पाणौ चलति तन्मूलभूतः परमाणुरपि चलेत्,
ततोऽचलत्तद्भुजपरमाणोर्विभागः, ततो यो येन संयुज्यते
विभज्यते वा स तत्कार्यद्रव्येणापीति न्यायेन भुजपाण्योरपि
विभागः, ततः संयोगनाशः, ततः शरीरनाश इति
निरस्तम्। न हि पाणिपरमाणुक्रिया भुजपरमाणुर्विभाग-
मारभते नियमेन।
पैदा हो जायगा, यह नियम अमान्य है। अर्थात् अवयवोंके जिन
संयोगोंसे द्रव्यका आरम्भ (उत्पत्ति) होता है, अवयवमें क्रिया होनेपर
उन संयोगोंके विरोधी (अवयवीको नष्ट कर देनेवाले) विभागकी
उत्पत्ति होती ही है, ऐसा नियम मान्य नहीं है। ऐसा माननेपर विकास
होनेपर कमलका नाश होना मानना पड़ जायगा और यह वही कमल
है, ऐसी प्रत्यभिज्ञा नहीं होनी चाहिये। हां, विशेषकारणवश कुछ ही
कर्म द्रव्यारम्भक संयोग के विरोधीभूत विभागको पैदा करते हुए पाये
जाते हैं, न कि नियमितरूपसे सभी कर्म।
सभी अवयवकर्मों में द्रव्यारम्भकसंयोगविरोधी-विभागजनकत्वका
नियम नहीं माननेसे यह आशङ्का भी खण्डित हो जाती है कि—हाथके
चल होनेपर उसका मूलभूत परमाणु भी चल हो उठेगा, उसके बाद उस
क्रियाशील हस्तपरमाणुका अचल भुजपरमाणुके साथ विभाग हो जायगा।
तदनन्तर “जो जिससे संयुक्त होता है या विभक्त होता है, वह उसके
कार्यद्रव्यसे भी संयुक्त या विभक्त हो जाता है” इस नियमके अनुसार
द्व्यणुकादि-विभागके क्रमसे हाथ और भुजा में भी विभाग हो जायगा।
उसके बाद शरीरका आरम्भ करनेवाले हाथ और भुजाका संयोग नष्ट हो
जायगा तथा उसके बाद शरीरका भी नाश हो जायगा—कारण, हाथ
और उसके परमाणुमे क्रिया होनेसे भुजा और उसके परमाणुके साथ
विभाग पैदा हो जायगा, ऐसा नियम नहीं है।