आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 297, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें२४८ आत्मतत्त्वविवेके
तदवयविन्युपलभ्यमाने कश्चिदवयव उपलभ्यते कश्चिन्नेति
वाक्यार्थः, सविशेषणे हि विधिनिषेधौ विशेषणमुपसङ्क्रामत
इति न्यायात् । तथा चावयवानामुपलम्भानुपलम्भा-
ववयविनि सञ्चार्य प्रसङ्गस्तदलमेनेन ।
एतेनावृतत्वानावृतत्वं व्याख्यातम् । अनावरणदशावत्
कतिपयावयवावरणेऽपि तथाविधस्थौल्योपलम्भः किं न
स्यादिति त्ववशिष्यते । तदप्यसत् । तस्य परिमाणगत-
धर्मोंका अध्यास असिद्ध नहीं है—तो ऐसी परिस्थितिमें आपके कथनका
यही अर्थ होता है कि अवयवीकी उपलब्धिदशामें कोई अवयव उपलब्ध
होता है और कोई नहीं उपलब्ध होता । क्योंकि विशेषणसहित विशेष्य
में होनेवाले विधिनिषेध विशेषणमें ही उपसङ्क्रान्त होते हैं । अर्थात्
वहाँ फलतः विशेषणका ही विधि या निषेध होता है । इस प्रकार
वस्तुतः अवयवगत उपलब्धि और अनुपलब्धिको आपने अवयवीमे
सञ्चारित कर अवयवी निषेधके लिये उक्त प्रकारका प्रसङ्ग दिया है,
किन्तु ऐसा प्रसङ्ग न दें ।
इससे अवयवीका एकही कालमे आवृतत्व और अनावृतत्वसम्बन्धी
अध्यासका भी व्याख्यान हो जाता है । अर्थात् कुछ अवयव ही आवृत
होते हैं और कुछ अनावृत । अवयवी तो अनावृत ही रहता है । अतः
अवयवीमें आवृतत्व अनावृतत्व उभयका एक कालमे समावेश नहीं
होनेसे विरोध कहाँ होता है ? जो अवयवीका बाधक हो ।
यहाँ एक शङ्का अवश्य बच जाती है कि जिस प्रकार सम्पूर्णरूपमें
अवयवीकी अनावरणदशामें उसकी द्विहस्तत्व त्रिहस्तत्वादिरूप स्थूलता
की उपलब्धि होती है, उसी प्रकार कुछ अवयवोंका आवरण हो जानेपर
भी उसके द्विहस्तत्व त्रिहस्तत्वादिरूप परिमाणकी उपलब्धि होनी
चाहिये । क्योंकि अवयविवादीके मतानुसार वह अवयवी अनावृत ही है ।
किन्तु यह शङ्का भी ठीक नहीं है । क्योंकि परिमाणगत उस द्विहस्तत्व
त्रिहस्तत्वादिरूप जातिविशेषको—जो उस अवयवीसे भिन्न वस्तु है
तथा किसी नियत सामग्रीसे ही जाना जाता है, उस नियत सामग्रीके
अभावमें, अवयवीकी और उसके सामान्यपरिमाणकी उपलब्धि होनेपर