आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः [२४९]
सामान्यविशेषस्य ततोऽन्यस्य नियतसामग्रीवेद्यस्य तदभावे
तदुपलम्भेऽप्यनुपलम्भात् ।
एतेन कम्पाकम्पसंसर्गो निरस्तः । सामग्रीभेदेनावयव-
नियतकम्पोत्पादे तस्यां दशायामवयविनो निश्चलत्वात् । एवं
तर्हि कम्पाकम्पयोरवयवयोर्र्विभागात् संयोगनाशे द्रव्यनाशः
स्यादिति चेत्, ततः किम् ? अपसिद्धान्त इति चेन्न, एवमपि
क्वचिदभ्युपगमात् । सर्वत्रैव' प्रसङ्ग इति चेत्, तथाप्यवयविनः
किमत्याहितम् ? न चैवमपि, कर्मणो द्रव्यारम्भकसंयोगप्रती-
भी—प्रतीति नहीं होती है। अर्थात् कुछ अवयवोंके आवरणकालमें भी
वह अवयवी तथा उसका सामान्यपरिमाण उपलब्ध होता है। किन्तु यह
अवयवी दो हाथका है या तीन हाथका है, इसप्रकारके विशेष परिमाण-
की उपलब्धि इसलिये नहीं होती है कि उस विशेषपरिमाणकी भी
उपलब्धिक। कारण एक निश्चित सामग्री है, जो अवयवोंकी आवरण-
दशामें नहीं है।
असिद्ध होनेके कारण अवयवोंमें एक कालमें कम्प और अकम्परूप
विरुद्ध धर्मोंका समावेश भी खण्डन हो गया। क्योंकि सामग्रीविशेषसे
कतिपय अवयवमात्रमें कम्पोत्पाद होनेपर भी उस दशामें अवयवी तो
निष्कम्प (निश्चल) ही रहता है।
यदि कहो कि—कुछ अवयवोंमें कम्पन और कुछ अवयवोंमें अक-
म्पनके माननेपर उन अवयवोंमें परस्पर विभाग होनेसे संयोगका नाश
हो जायगा और संयोगनाश होनेसे द्रव्यका नाश हो जाना चाहिये—
तो इससे क्या हुआ ? यदि कहो—अपसिद्धान्त होगा—तो ऐसा नहीं
हो सकता। क्योंकि ऐसा भी कहीं स्थलविशेषमें माना ही जाता है।
यदि कहो—सर्वत्र ही अवयवी द्रव्यका नाश होने लगेगा—तो इससे
अवयवि-सिद्धिमें क्या बाधा हुई ? अर्थात् अवयवसंयोगके नाशसे
अवयविनाशकी प्रसक्ति भले ही हो जाय किन्तु अवयवी तो सिद्ध हो ही
गया। साथ ही अवयवि-नाशकी प्रसक्ति भी नहीं है। क्योंकि अव-
यवगत कर्मसे द्रव्यारम्भक संयोगका विरोधीभूत अवयवविभाग अवश्य