आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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ह्यविद्येत्येवा१त्माश्रयनिवृत्तिः, तथा सति घटादयोऽपि कुला-
लादिनिरपेक्षाः स्वयमेव भवेयुः ।
अथात्माश्रयदोषोपहततया तन्न स्वस्यैव कारणम्, ततो
यतः कुतश्चित् तस्य जन्म, तच्च दुर्निरूपमतोऽविद्येत्युच्यत
इति विचारार्थः, नाम्नि तर्हि विवादः । न च तदपि
दुर्निरूपम्, प्रतियोगिरूपत्वेनाप्रतीतावधिकरणप्रतीतिरधिकर-
णस्वभावत्वेनास्मृतौ प्रतियोगिस्मृतिश्चेतरेतराभावग्रहणकारण-
मिति निरूपणात् ।
है ? अथवा अविद्यारूप कारणसे भेदज्ञानकी उत्पत्ति होती है, यह
अभिप्राय है ? इनमे यदि प्रथम पक्ष मानो तो इससे क्या लाभ हुआ ?
क्योंकि अविद्याका प्रभाव मान लेनेमात्रसे आत्माश्रयकी निवृत्ति नहीं
होती है । क्योंकि अविद्या माननेपर भी उसे अपने आप ही होना पडता
है । यदि अविद्याका प्रभावमात्र मान लेनेसे आत्माश्रयकी निवृत्ति हो
जाती हो तो घटादिक भी कुम्हार आदिकी बिना अपेक्षा किये अपने
आप ही पैदा हो जाँय ।
यदि दूसरे पक्षका आश्रय लेते हुए कहो कि—आत्माश्रयदोषसे
उपहत होनेके कारण भेदज्ञान अपना ही कारण नहीं है, किन्तु जिस किसी
कारणसे उस भेदज्ञानकी उत्पत्ति होती है, वह दुर्निरूप है । अर्थात् उस
कारणका स्वरूपनिरूपण नहीं किया जा सकता है, यही अभिप्राय है—
तो कारणके नाममात्रमें विवाद है । क्योंकि कारणकी सत्ता तो तुमन भी
स्वीकार कर ही ली । अत भेदकी व्यवस्थामे कोई बाधा नहीं है ।
साथ ही कारणका निरूपण भी अशक्य नहीं है । क्योंकि प्रतियोगि-
तावच्छेदकरूपसे अप्रतीतिके साथ जो अधिकरणकी प्रतीति और
अधिकरणतावच्छेदकरूपसे अप्रतीतिके साथ जो प्रतियोगीकी प्रतीति, ये
दोना ही प्रतीतियाँ इतरेतराभावग्रहणके कारण हैं । इस प्रकार कारणका
निरूपण किया जा सकता है । अर्थात् भिन्न भिन्न रूपोंमें प्रतियोगी
और अधिकरणका ज्ञान ही उनमें इतरेतराभावप्रत्यक्षका कारण है ।
१ न ह्यविद्येत्येवमात्मा इति १ पु० पा०