आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः २४३
अथ स्वरूपमेव भेदप्रतिभासस्य विषय इति तत्त्वम्,
तथापि सहप्रयोग एवानुपपन्नस्त्यज्यताम्, भेदेन तु किमपरा-
द्धम्। सोऽपि दृश्यत इति चेत्, नैमित्तिकस्तु स्यात्, न
स्वरूपतः। न हि घटमानय पटमवलोकयेत्यादौ भेदपदमपि
प्रेक्षावानुपादत्ते। व्याख्यायां तु मूढप्रबोधनाय घटः कुम्भ
इतिवत् सहप्रयोगेऽपि न दोषः।
तथापि कः परमार्थः ? यथार्थं त्रयमपि। पटस्य हि
घटात्मनाऽप्रतीतिरघटात्मना च प्रतीतिस्ततो वैशिष्ट्यप्रतीति-
तथा अधिकरणतावच्छेदकसे युक्त अनुयोगीमें प्रतियोगितावच्छेदकका ग्रह
ही उस प्रत्यक्षका प्रतिबन्धक है।
यदि कहो कि-स्वरूप ही भेदप्रतीतिका वस्तुतः विषय है-तो भी
अनुपपन्न होनेसे "घटो भिन्नः" ऐसा घट और भेदका सहप्रयोग भले ही
त्याज्य हो, किन्तु भेदने क्या अपराध किया है? अर्थात् भेद तो तुम भी
स्वीकार करते ही हो। अब केवल उसमें आनेवाले बाधकका ही निरास
हम दोनों को करना है, और वह इस प्रकार होगा कि सहप्रयोगका ही
त्याग किया जाय। यदि कहो-सहप्रयोग भी देखा जाता है, इसलिये
स्वरूपात्मक भेद ही त्याज्य क्यों न माना जाय?-तो ऐसा नहीं कह
सकते। क्योंकि स्वरूपतः भेदका घटादिके साथ प्रयोग नहीं देखा
जाता है किन्तु किसी निमित्तवशात् ही सहप्रयोग होता है। अर्थात्
"घटो भेदः" ऐसा स्वरूपतः प्रयोग नहीं होता किन्तु घटमें वैधर्म्य या
अन्योन्याभावका वैशिष्ट्य सूचित करनेके लिये "घटो भिन्नः" यही
प्रयोग होता है। अतः इस प्रकारके नैमित्तिक सहप्रयोगमें तो कोई
बाधा नहीं है। क्योंकि "घटमानय, पटमानय" इन प्रयोगोंमें कोई
बुद्धिमान् घट-पटपदोंके साथ भेदपदका भी प्रयोग नहीं किया करता
है। व्याख्याके रूपमें तो मूर्खोको समझानेके लिये "घटः कुम्भः" के
समान घट और भेदका भी साथ प्रयोग करनेमें कोई दोष नहीं है।
फिर भी पूछो कि-भेद वस्तुत किं स्वरूप है?-तो यही उत्तर
होगा कि यथायोग्य तीनों ही स्वरूप होगा। क्योंकि पटकी घटरूपमे