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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 530 में से

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पृष्ठ 294

बाह्यार्थभङ्गवाद २५५

र्म्यस्य तु विरोधः, स चैकधर्म्यसमावेश इत्येषा दिक् ।
सप्तमोऽप्यनुकूल एव, घटादौ व्यापकताप्रतिक्षेपस्या-
न्व्यापकतोपलम्भोपष्टम्भकत्वात् व्यापकत्वस्य निष्क्रियत्वव्या-
सक्तत्वाच्च ।
अष्टमस्तु क्वचिदिष्ट एव । यत एव हि क्वचिदनि-
धेयोऽत एव क्वचिद् विधेयोऽव्यापक इति व्यवह्रियते । सर्वत्रे-
ति चेन्न, व्याप्यसिद्धेः विरोधाच्च । न हि यदव्यापकं तत्
और प्रतियोगिसमानाधिकरण जो प्रतीयमान निषेध, वह इतरेतराभाव
कहाता है । वैधर्म्यका लक्षण तो विरोध है, और वह विरोध भी एक
धर्मीमे असमावेशरूप है । अर्थात् घटत्वपटत्वका एक जगह अवस्थित
न रहना ही घटपटका परस्पर वैधर्म्यरूपभेद है । यही संक्षेपमे भेदके
स्वरूपोंका दिग्दर्शन है ।
"घटादिक न व्यापक, निष्क्रियत्वप्रसङ्गात्" यह सप्तम पक्ष भी मेरे
अनुकूल ही है । क्योंकि घटादिमे व्यापकताका खण्डन उसमे अव्यापकता
ज्ञानका ही सहायक है । एवं यह पक्ष मुझे इसलिए भी अनुकूल है,
क्योंकि व्यापकत्व निष्क्रियत्वका व्याप्य होता ही है । अर्थात् जो
व्यापक होता है वह निष्क्रिय होता ही है । अत निष्क्रियत्वप्रसङ्गके
भयसे घटका व्यापक न होना मुझे इष्ट ही है ।
'न अव्यापकम्, अविधेयत्वप्रसङ्गात्' यह अष्टम पक्ष भी कहीं इष्ट
ही है । अर्थात् अव्यापकत्वके द्वारा यदि किसी देशविशेषमे अविधेयत्व-
का आपादन करो तो यह इष्ट ही है । क्योंकि घटाभावस्थलमे घटका
विधान नहीं होता है । चूँकि घट कहीं (अपने अभावस्थलमे )
अविधेय है इसीसे सिद्ध है कि वह कहीं (घटाधिकरणस्थलमे) विधेय
है । इसीकारणसे घटको अव्यापकरूपमे व्यवहृत किया जाता है ।
यदि कहो कि—अव्यापकत्वके द्वारा सर्वत्र अविधेयत्वका आपादन
किया जा रहा है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि अव्यापकत्व और
सार्वत्रिक अविधेयत्वमे व्याप्ति ही असिद्ध है तथा दोनोमें परस्पर विरोध
भी है । क्योंकि जो अव्यापक होता है वह सर्वत्र अविधेय होता है,