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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 530 में से

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पृष्ठ 296

[Header] बाह्यार्थभङ्गवादः २४७

स्वीकृतौ यं प्रत्यविरोधः प्रसज्येतेति । एतेन कालभेदादिना
ऽप्यविरोधो द्रष्टव्यः ।
अस्तु तर्हि स्थूलघाती विरुद्धधर्माध्यासो ग्रहणाग्रहणादिः
पञ्चविधः, न, असिद्धेः ।
तथाहि, यो येन यत्रैव यदैवोपलभ्यते स तेन तत्रैव तदैव
नोपलभ्यत इति नानुभवः, नाप्यभ्युपगमः । एकावयव-
सहितस्योपलम्भेऽन्यावयवसहितस्यानुपलम्भ इति चेत्, एवं

प्रसङ्ग दिया जा सके। इसीप्रकार देशभेद या अवच्छेदकभेदके नहीं
रहनेपर भी केवल कालभेदसे भी एक ही वस्तुके विधि और निषेधमे
कोई विरोध नहीं होता, ऐसा जानना चाहिये। जैसे, घटादिकार्यका
एक ही कपालमें उत्पत्तिकालके अनन्तर अस्तित्व रहता है तथा प्रागभाव
या प्रध्वंसकालमे नास्तित्व रहता है।
यदि कहो कि—पूर्वोक्त युक्तियोंसे अवयवीका निषेध भले ही न हो
सके, परन्तु ग्रहणाग्रहण, आवृत्तत्वानावृत्तत्व, कम्पाकम्प, रक्तरक्त तथा
संयुक्तासंयुक्तरूप विरुद्धधर्मोंका पञ्चविध अध्यास ही अवयवीका विरोधी
होगा। अर्थात् यदि अवयवोंसे भिन्न कोई एक अवयवी होता तो एक ही
क्षणमें एक ही वस्तु गृहीत अगृहीत, आवृत अनावृत, कम्पमान अकम्पमान
रक्त अरक्त तथा संयुक्त असंयुक्त नहीं होती, किन्तु होती है, इससे
सिद्ध होता है कि अवयवातिरिक्त एक अवयवी नहीं होता—तो ऐसा
नहीं कह सकते। क्योंकि जो विरुद्ध हैं, उनका अध्यास ही असिद्ध है,
तथा जिनका अध्यास है, उनमें विरोध नहीं है। क्योंकि जो वस्तु
जिस व्यक्तिके द्वारा जिस स्थलमे जिस क्षण उपलब्ध होती है, वही
वस्तु उसी व्यक्तिके द्वारा उसी स्थलमे उसी क्षण अनुपलब्ध रहती है,
ऐसा न अनुभव है और न ऐसी किसीकी मान्यता है।
यदि कहो कि—एकावयवके साथ उस वस्तुकी उपलब्धिदशामे ही
अन्यावयवोंके साथ उसकी अनुपलब्धि भी होती है। अर्थात् एक ही
घट एकही क्षणमे एकही व्यक्तिके द्वारा एक भागमे दिखाई पड़ता है
और दूसरे भागमें नहीं दिखाई देता। अतः ग्रहणाग्रहणरूप विरुद्ध