आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
शङ्कयाऽप्युपहन्येत । ततो बाधकव्यसनमपहायानुगमव्यव-
हतिरन्यथाऽप्युपपाद्यताम् । न चैतच्छक्यम्, गत्यन्तराभावात् ।
न च बाधकमप्यस्ति । तद्धि स्वरूपतो वा स्यात् ज्ञानतो
वा स्यात् । स्वरूपतोऽप्यनुपलम्भो वा विरुद्धधर्माध्यासो वा ।
न प्रथमः, असिद्धेः । स्फुरत एव हि साधारणाकारस्य
शरीरं चिन्तयितुमारब्धं नास्फुरतः । अध्यक्षे साधारणस्फुरणं
व्यसेधामो न तु विकल्पे, तस्य समानसङ्केतग्रहतिमिरनिकुर-
निश्चित दोनों ही प्रकारका बाधक नहीं हो सकता है । कारण, जातिको
स्वीकार किये बिना किसी अन्य प्रकारसे जब अनुगत व्यवहारकी
सिद्धि ही नहीं की जा सकती है, तब जातिबाधककी शंका ही कहाँ
है ! अर्थात् अनुगत व्यवहारकी अनन्यथासिद्धि ही बाधक-शङ्काको दूर
कर देती है । अन्यथा विपक्षमें बलवान् बाधकको पाकर अनन्यथा
सिद्धिसे परिपुष्ट भी आपका स्वभावहेतु (अनुमापक हेतु) बाधककी
आशङ्कामात्रसे दूषित हो जायगा । इसलिये बाधकके व्यसनको छोड़कर
जातिके बिना भी अनुगतव्यवहारका उपपादन करनेका प्रयास करो ।
किन्तु जाति माने बिना कोई गति नहीं होनेसे अनुगतव्यवहारका उप-
पादन अशक्य है । क्योंकि अन्यापोहद्वारा अनुगत व्यवहारकी अनुप-
पत्ति दिखायी जा चुकी है ।
एव जातिके प्रति कोई निश्चित बाधक भी नहीं है । क्योंकि वह
जातिस्वरूपका बाधक होगा या उसके ज्ञानका ? स्वरूपपक्षमें भी जाति-
स्वरूपका अनुपलम्भ होगा अथवा विरुद्धधर्मका अध्यास होगा ?
। इसमें अनुपलम्भवाला प्रथम पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि अनुपलम्भ
असिद्ध है । कारण, यहाँ नाना गवादिव्यक्तियोंमें भासित होनेवाले ही
गोत्वादि सामान्यका स्वरूपचिन्तन प्रारम्भ किया गया है न कि नहीं
भासित होनेवालेका । अतः गोत्वादिसामान्यका अनुपलम्भ कहना
असङ्गत है ।
यह कथन भी कि—प्रत्यक्ष (निर्विकल्पक) में ही हम साधारण
धर्मस्फुरणका निषेध करते हैं, न कि सविकल्पकमें । निर्विकल्पक ज्ञानमें
न्वकरम्बितदृष्टिभिरेवोपपादनात् न त्वस्माभिः, कल्पनाकोप-
स्यानन्तप्रसरतया तत्त्वाव्यवस्थापकत्वादिति चेत्, शब्दानु-
सन्धानविरहेऽपि जायमानत्वात् ।
तथापि तद्वासनात एवेति चेत्, किमेकसङ्केतविषयाभा-
वेऽपि समानशब्दसङ्केतग्रहवासनावशादेकाकारपरामर्शस्तत्स-
द्भावे वा ? न तावदाद्यः, नानासास्नादिमद्व्यक्तिवत् स्वर्ग-
लोचनबाणाम्बुकुलिशादिष्वपि गोशब्दसङ्केतग्रहवासनावशात्
तथाविधप्रत्ययानुगमप्रसङ्गात् । इष्ट एवासावर्थ१ इति चेत्,
साधारणधर्मभानका उपपादन तो वे ही करते हैं, जिनका दृष्टि सभी
गोव्यक्तियोंमें समान गवादिशब्दके सङ्केतग्रहरूपी अन्धकारसमूहसे
कलुषित हो गयी है, हम नहीं। कारण कल्पनाकोपके विस्तारका अन्त
नही होनेसे कल्पनाके आधारतत्त्वकी व्यवस्था नहीं हो सकती है। अर्थात्
सविकल्पकज्ञानमें काल्पनिक ही भान होनेसे उसके आधारपर जा
१६४ आत्मतत्त्वविवेके
सोऽयं सास्नादिमतीषु व्यक्तिषु साधारणं रूपं न पश्यति,
पश्यति तु गोशब्दवाच्येषु दशस्विति किमत्र वक्तव्यम् । नून
रुचिरेवास्य१ लोचनमिति । शक्यमिदमितरेणापि वक्तुमिति
चेत्, शक्यम्, न तु व्यवहारस्तन्मूलो विपर्यासयितुम् ।
नन्वेतावतापि विकल्पः सिद्ध्यतु, अनुभवस्तु कथम् ?
सवस्तुकविकल्पसिद्धेरेव । कथ तस्य सवस्तुकतेति चेत्,
देखता है और गोपदके दश वाच्यार्थों में तो देखता है, यहाँ हम क्या
कहें ? निश्चित ही इसकी अपनी रुचि ही नेत्र है ।
यदि कहो कि—इस प्रकारकी बात बौद्ध भी कह सकता है ।
अर्थात् नैयायिक भी गोपदवाच्यार्थ स्वर्ग आदिमे साधारणरूप
(गोत्व) नहीं देखता है और गोपदवाच्य सास्नामती व्यक्तियोंमे तो
गोत्वको देखता है, ऐसा क्यों ?—तो बौद्ध भी भले ही ऐसा कहे
किन्तु अनुगतधर्ममूलक समानाकारव्यवहारको अन्यथा नहीं कर सकता ।
यहाँ समाधानका आशय यह है कि स्वर्गादिमे भी जो अनुगतरूपसे
गोव्यवहार होता है, उसका कारण है गोशब्दवाच्यत्वरूप अनुगत धर्म ।
कि तु सास्नादिमती व्यक्तियोंमें होनेवाले अनुगत गोव्यवहारका कारण
गोशब्दवाच्यत्वरूप अनुगत धर्म नहीं है, किन्तु गोत्व जाति ही है ।
क्योंकि जिसे गो०व्यक्तियोंमे गोशब्दवाच्यत्वकी व्युत्पत्ति नहीं है, उसे
भी उनमें अनुगतरूपसे गोप्रतीति होती है ।
यदि कहो कि—पूर्वोक्त युक्तिवादसे भी सविकल्पक ज्ञान अनुगत-
जातिविषयक भले ही सिद्ध होवे किन्तु अनुभव (निर्विकल्पक ज्ञान)
जातिविषयक कैसे सिद्ध होगा ?—तो मैं कहूँगा, कि गोत्वरूप वस्तु
विषयक सविकल्पक ही निर्विकल्पक ज्ञानके भी गोत्वविषयक होनेमें
प्रमाण है । क्योंकि कोई बाधक नहीं रहनेपर सविकल्पकज्ञानका
विषय ही निर्विकल्पका भी विषय होता है ।
यदि कहो कि—सविकल्पक ज्ञानकी सवस्तुकता ही अभी तक कहाँ
सिद्ध हुई है ? अर्थात् वह तो अलीकविषयक होता है—तो मैं बता
१ रुचिरेवेवास्य इति क्वचित् पाठ ।
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क्षणभङ्गवादः १६५
शब्दवासनादिकारणान्तरविध्वंसादिति तूष्णीम्भव ।
अन्तराले किमिति नोपलभ्यत इति चेत् , उपलब्धिकार-
णाभावात् ।
पिण्ड एव कुण्डे बदरवत् कुतो नोपलभ्यत इति चेत् , न,
अनन्यदेशत्वात् । भेदेन तूपलभ्यत एव, पिण्डान्तरासंसर्गिणि
पिण्डेऽनुभूयमाने तत्संसर्गितयाऽनुभवात् ।
चुका हूँ कि शब्दसङ्केतग्रह या उसकी वासना आदि अन्य कारणोंके
अभावमें भी "गौरयम्" ऐसी सविकल्पक प्रतीति गोत्वनामक अनुगत
धर्मके कारण ही होती है । इसलिये गोत्व भी वस्तुभूत ही है । अतः
अब कुछ कहनेमे मौन हो जा ।
“गोत्वजाति यदि व्यापक है तो दो पिण्डोंके मध्यदेशमे क्यों नहीं
उपलब्ध होती है ? एव यदि नित्य है तो एक पिण्डके नष्ट होनेपर
पिण्डान्तरकी उत्पत्तिके पूर्वकालमे क्यों नहीं उपलब्ध होती है ? तो
इस प्रश्नका उत्तर है कि नित्य और व्यापक होनेपर भी दो पिण्डोंके
अन्तरालमें जातिकी उपलब्धि इसलिये नहीं होती है कि उसकी अभिव्य-
ञ्जिका सास्नादिमती व्यक्तिका वहाँ अभाव है ।
यदि कहो कि -पिण्डमे यदि कोई जाति है तो जैसे कुण्डमे पृथक्-
रूपसे बदरकी उपलब्धि होती है ? वैसे पिण्डमें पृथक्रूपसे जातिकी
उपलब्धि क्यों नहीं होती है ?-तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि
पृथक् उपलब्धिका अर्थ यदि पिण्डसे भिन्न देशमे उपलब्धि हो तो
जातिका पिण्डसे अतिरिक्त कोई देश ही नहीं है । बदरका तो कुण्डसे
अतिरिक्त अपना अवयव ही देश है । एव पृथक् उपलब्धिका अर्थ
यदि पिण्डसे भिन्नरूपमे उपलब्धि हो तो पिण्डसे भिन्नरूपमें जातिकी
उपलब्धि होती ही है । क्योंकि एक पिण्ड दूसरे पिण्डका असंसर्गी
होकर भासित होता है और उससे भी सम्बद्ध वह जाति होती है ।
अर्थात् पिण्ड और जातिमे यदि अभेद होता तो उस पिण्डसे असम्बद्ध
दूसरे पिण्डमें उस जातिका अनुभव नहीं होता ।
१६६ आत्मतत्त्वविवेके
नापि द्वितीयं बाधकम्, अवयविसमानयोगक्षेमत्वात् ।
जायमानपिण्डसम्बन्धानुपपत्तिरप्रतिसंक्रमात् तत्रासत्त्वात् अनु-
त्पादाच्चेति चेत्, कथं पुनस्तत्रासत्त्वं त्वया व्यज्ञायि ? तत्र
सत्त्वे तत्रत्याकाशादेरपि गोत्वप्रसङ्गादिति चेत्, न चैतत्
पश्चादपि तत्रत्याकाशादिना सम्बध्यते । येन च पिण्डेन
सम्बध्यते, न तत्र कदापि तन्नास्ति । तत्कुतो विरोधः ।
“सङ्केतका विषय भी एक ही है” इस द्वितीय पक्षको तो अभीष्ट
होनेके कारण मूलकारने दूषित नहीं किया । क्योंकि इस पक्षमे सभी
गोव्यक्तियोमे वर्तमान एक गोत्वजातिको पूर्वपक्षीने भी सङ्केतका
विषय स्वीकार कर लिया ।
जातिके प्रति विरुद्ध धर्माध्यासरूप द्वितीय विकल्प भी बाधक नहीं
हो सकता है । क्योंकि अवयवीके समान ही इसका भी साधनप्रकार
है । अर्थात् अवयवीके सम्बन्धमें जैसे, “वह कार्त्स्न्येन अवयवोंमे
रहता है अथवा एकदेशेन” इस विकल्पका खण्डन किया गया है, वैसे
ही जातिके सम्बन्धमे भी कार्त्स्न्यैकदेशरूप विरुद्धधर्मके अध्यासका
खण्डन समझना चाहिये !
यदि कहो कि—जायमान पिण्डके साथ गोत्वका सम्बन्ध तीन प्रकार
से हो सकता है—(१) दूसरे पिण्डसे उस पिण्ड तक सङ्क्रमण द्वारा
(२) या यहाँ पहलेसे ही वर्तमान रहनेके कारण (३) अथवा उस जायमान
पिण्डके साथ साथ उत्पन्न होनेके कारण । ये तीनों ही गोत्वमें अनुप-
पन्न हैं । क्योंकि निष्क्रिय होनेसे जाति चल नहीं सकती है । एव
उस देशमें यदि पहलेसे गोत्व रहे तो उस देशको भी गौ कहने लगेंगे ।
तथा जातिके नित्य होनेसे पिण्डके साथ वह उत्पन्न भी नही कही जा
सकती है—तो तूने कैसे समझा कि गोत्व उस पिण्डस्थलमें पहलेसे
वर्तमान नही है ?
यदि कहो कि—वहाँ पहलेसे गोत्वके रहनेपर वहाँके आकाशमे भी
गोत्वप्रसङ्ग हो जायगा—तो यह गोत्व पीछे भी तो वहाके आकाशसे
सम्बद्ध नहीं होता है । अर्थात् गोत्वव्यवहारके लिये समवायसम्बन्धसे
क्षणभङ्गवादः १६७
अथ पिण्डमन्तर्गडुमुपादायोपलक्षणतया तत्रेति व्यवहारः,
तदा तदुपसर्पणापसर्पणोत्पत्तिविनाशैरेव तदुपपत्तौ न यातीत्या-
दिरपराद्धेषोरिव धानुष्कस्य कण्ठडम्बरः।
तथाहि पिण्डमधिकृत्योपसर्पणापसर्पणाभावः, तदुपलक्षितं
गोत्वकी सत्ता कारण है, इसलिये पिण्डकी उत्पत्तिके पूर्व या पीछे स्व-
रूपत गोत्वके रहनेपर भी आकाशके साथ उसका समवायसम्बन्ध
नहीं रहनेसे आकाशमें गोत्वप्रसङ्ग नहीं होता है।
यदि कहो कि—पिण्ड तो एक अन्तर्गडुमात्र (निरूपकमात्र) है,
न कि वह गोत्वका समवायेन आधार है। इसलिये उसे लेकर पिण्डमे
गोत्वका व्यवहार लाक्षणिक है, मुख्य नहीं है। और उस उपलक्षणभूत
पिण्डकी सत्तावस्थामे "इह गोत्वम्" तथा पिण्डशून्य आकाशमें
"नेह गोत्वम्" ऐसा व्यवहार होता है—तो वैसे ही पिण्डके उपसर्पण
अपसर्पण, उत्पत्ति एव विनाशसे ही गोत्वके सत्त्वासत्त्व व्यवहारोंकी भी
उपपत्ति हो जायगी, फिर—
न याति न च तत्रासीत् न चोत्पन्न न चाशवत्।
जहाति पूर्व नाधारमहो व्यसनसन्ततिः॥
इस प्रकारका जातिके सम्बन्धमें धर्मकीर्तिका कण्ठशोष भी वैसा ही है,
जैसा बाणके लक्ष्यसे विचलित होनेपर धनुर्धारीका होता है। अर्थात् धर्म-
कीर्तिने जातिके सम्बन्धमें विरोध उपस्थित किया है कि "गोत्वादि जाति
जायमान पिण्डदेशमे न जाती है, न वहाँ पहलेसे थी ही, न वहाँ
उत्पन्न ही होती है और न सावयव होती हुई पूर्व आधारको छोड़ती
या अन्य आधारको प्राप्त ही करती है, इस प्रकार जाति माननेमे कितनी
व्यसनपरम्परा है ?" परन्तु हमारे मतमे जातिको कहीं जाने या
उत्पन्न होनेकी आवश्यकता नहीं है, वह तो व्यापक और नित्य है।
जाना, आना, उत्पन्न और नष्ट होना पिंडगत धर्म है। इस प्रकार
जातिको लक्ष्य कर कीर्तिने जो विरोध प्रदर्शन किया है, वह व्यक्तिमे
संक्रान्त होकर निष्फल हो जाता है। अतः धर्मकीर्तिकी स्थिति लक्ष्य-
च्युत धानुष्कके समान है।
एवं, पिंड तक न जातिका उपसर्पण होता है और न किसी अन्य
१६८ आत्मतत्त्वविवेके
देशमधिकृत्य च सत्त्वासत्त्वे सामान्यस्येति किं केन सङ्गतम् ?
अथाप्यनुत्पन्ने पिण्डे तस्यासत्त्वं सुलभमेव तदसत्त्वादिति हृद-
यम्, तन्न, स्वरूपसत्त्वासत्त्वयोर्द्वितीयानपेक्षत्वात् । सम्बद्ध-
त्वासम्बद्धत्वे तु द्वितीयापेक्षे । ततस्तत्रासति नास्तीति
कोऽर्थः ?
तेनासता न सम्बध्यत इति चेत्, तच्चेष्टमेतत् । पश्चात्
कथ सम्बध्यतामिति चेत् , तस्य सत्त्वात् , असम्बद्धत्वस्य तद-
सत्त्वप्रयुक्तत्वात् । ततः प्रागसन् पिण्डः पश्चात् कथमुपपद्यतां-
मिति चोद्यनिष्ठा, सा च सत्कार्यवादमनुपततीत्युक्तवान्तिः ।
पिंडसे जाति बिलग ही होती है । इस मान्यताके कारण पिंडोपलक्षित
आकाशादिदेशोंमे जातिकी सत्ता या असत्ता कहना वैयधिकरण्यके कारण
एकदम असङ्गत है ।
यदि आपका आशय हो कि—स्वरूपत जाति पिण्डोपलक्षित आका-
शादि देशोंमें भले ही रहे और जो पिण्ड उत्पन्न हो चुका है, उसमे भी
वह भले ही रहे, किन्तु जो पिंड अभी तक उत्पन्न ही नहीं है, उसमे तो
उस जातिका अभाव सुतराम् सुलभ है । क्योंकि उस जातिका आधार-
भूत पिण्ड ही नहीं है—तो यह ठीक नहीं है । क्योंकि जातिकी स्वरूपत
सत्ता या असत्ताके लिए पिंडादिरूप द्वितीयकी अपेक्षा ही नहीं है । हाँ,
सम्बद्ध या असम्बद्ध होनेके लिए तो जाति किसी द्वितीयकी अपेक्षा
रखती है । अर्थात् पिंडके उत्पन्न होनेपर उसमे जाति सम्बद्ध रहती
है, नहीं तो स्वरूपत विद्यमान भी जाति असम्बद्ध ही रहती है ।
ऐसी स्थितिमे “असत्पिण्डमे जाति नहीं है' आपके इस कथनका
क्या अर्थ है ?
यदि "उस असत् पिण्डके साथ जातिका सम्बन्ध नहीं है' यह अर्थ
लें तो वह ठीक ही है । यदि पूछें कि—पीछे उस पिण्डके साथ जाति
क्यों सम्बद्ध हो जाती है ?—तो उत्तर होगा, पिंडकी सत्ता हो जानेके
कारण । क्योंकि पिंडसे जातिकी असम्बद्धता पिंडकी असत्ताके कारण
ही रहती है । उसके बाद आपके पूर्वपक्षकी निष्ठा (पर्यवसान या
क्षणभङ्गवादः १६९
तथापि सामान्यतद्वतोरत्यन्तभेदे कथं सामानाधिकरण्य-
मिति चेत्, किमिदम् ? समानेनाधिकरणेन हि सम्बन्धः सामा-
नाधिकरण्यम्, तस्य च भेदेन को विरोध इति नाधिगच्छामः ।
गवाश्वयोरपि तथाभावप्रसङ्ग इति चेत्, ननु व्यतिरेकदृष्टान्त-
स्थानं तत्, न तु विरोधस्थानम् । तन्न मैत्रतनयोऽपि यदि
कश्चिदश्यामः स्यात् परिदृश्यमानानामपि तथाभावप्रसङ्ग इति
क्व नाम दुर्लभम् ?
निचोड ) यही है कि—पहले असत् पिड पीछे कैसे सत् हो सकता
है ?—किन्तु वह तो सांख्यके सत्कार्यवादका अनुगमन कर रही है, जो
आपके द्वारा कभी भी स्वीकृत नहीं हुए रहनेके कारण बिना कुछ खाये
वमनके समान है ।
"तथापि जाति ( धर्म ) और जातिमान् ( धर्मी ) मे यदि अत्यन्तभेद
हो तो उनमें परस्पर सामानाधिकरण्य कैसे हो सकता है ? अतः धर्म
और धर्मीमे अत्यन्तभेद न मानकर आंशिकभेद अर्थात् भेदाभेद ही
मानना चाहिये" तो यह क्या कह रहे हो ? अर्थात् ऐसा नहीं कह
सकते । क्योंकि समान अधिकरणसे सम्बन्ध ही तो सामानाधिकरण्य
कहाता है और उसे भेदसे क्या विरोध है ? यह हम नहीं समझते ।
यदि कहो कि—अत्यन्तभेदमे सामानाधिकरण्य माननेपर गो और
अश्वमें भी सामानाधिकरण्य होने लगेगा—तो हम यह नहीं कहते कि
१७० आत्मतत्त्वविवेके
तथापि विशेषो वाच्य इति चेत्, अस्ति स्वाभाविको
विशेषो यत् किञ्चिदेव केनचित् सम्बद्धं न सर्वं सर्वेणेति ।
तथाऽनुगमनियमोऽपि स्वभावादेव किं न स्यादिति चेत्, एक-
स्यानेक सम्बन्धेऽनेकस्य चैकसम्बन्धेऽविरोधात्, एकानेकयो-
रनेकैकव्यवहारविरोधादिति ।
नापि ज्ञानतो बाधकम्, तत्स्वरूपप्रतिक्षेपस्यानुभवबाधि-
तत्वात् । कारणप्रतिक्षेपस्य च जन्मनैवापास्तत्वात् । एकत्व-
"फिर भी परस्पर भिन्नोंमें भी कहीं सामानाधिकरण्य होता है और
कहीं नहीं होता, इसका नियामकविशेष बताना चाहिये—तो स्वभाव
ही वह नियामकविशेष है, जिससे कोई ही किसीसे सम्बद्ध होता है,
सब सबसे नहीं ।
यदि कहो कि "वैसे अनुगत व्यवहारका नियम भी स्वभावप्रयुक्त
ही क्यों न होगा ? अत उसके लिये सामान्य ( जाति ) माननेकी कोई
आवश्यकता नहीं है" तो यह कह सकते हो । क्योंकि एकका अनेकके
साथ सम्बन्ध होनेमें या अनेकका एकके साथ सम्बन्ध होनेमें कोई
विरोध नहीं है। अर्थात् एक सामान्यका अनेक पिण्डोंके साथ
और अनेक पिण्डोंका एक सामान्यके साथ सम्बन्ध होनेमें कोई भी
विरोध नहीं है। विरोध केवल इसीमे है कि एकसे अनेक व्यवहार
नहीं हो सकता और अनेकसे एक व्यवहार नहीं हो सकता। अर्थात्
अनेक पिण्डसे एक अनुगत व्यवहार नहीं हो सकता है। अत जाति
स्वीकार करना अनिवार्य है।
' एवं सामान्यज्ञानका कोई बाधक भी नहीं है । क्योंकि वह ज्ञान-
। बाधक होगा, या उसके कारणका, अथवा उसके एकत्वका, या
उसके प्रामाण्यका, अथवा प्रामाण्यव्यापक इन्द्रियजत्वका, या साक्षात्-
कारित्वका बाधक होगा ?
इनमें सामान्यज्ञानके स्वरूपका निराकरण अनुभवबाधित है।
अर्थात् सामान्यज्ञान तो सर्वजनानुभव सिद्ध है। सामान्यज्ञानके
कारणका निराकरण तो सामान्यज्ञानकी उत्पत्तिसे ही खण्डित है,
क्योंकि कारणके बिना सामान्यज्ञानकी उत्पत्ति होती कैसे है ?
१७१
प्रतिक्षेपस्य च विरुद्धधर्माध्यासविरहप्रतिहतत्वात् । पारोक्ष्या-
पारोक्ष्यादेरसिद्धेः ।
विषयमप्रतिक्षिप्य तत्प्रामाण्यस्य प्रतिक्षेप्तुमशक्यत्वात्,
तदप्रतिक्षेपस्य च दर्शितत्वात् ।
इन्द्रियजत्वप्रतिक्षेपस्य चेन्द्रियान्वयव्यतिरेकानुविधान-
बाधितत्वात् । साक्षात्कारित्वविश्रान्ते च तदनुविधानस्या-
एव ज्ञानगत एकत्वका भी निराकरण नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ
विरुद्धधर्माध्यासका अभाव होनेसे एकत्वमें कोई बाधा नहीं है । अर्थात्
यद्यपि "तदेवेदम्" यह विज्ञान तत्पदार्थ और इदंपदार्थमे एक धर्म-
वत्त्वको सूचित करता हुआ सामान्यमें प्रमाण हो सकता है तथापि
तत्पदार्थ-ग्राहक और इदंपदार्थ ग्राहक विज्ञान एक न होकर यदि परस्पर
भिन्न भिन्न हो तो सामान्यकी सिद्धि कैसे हो सकेगी ? इस प्रकार
ज्ञानमे एकत्वके बाधसे सामान्यका भी बाध हो जाता है ।
किन्तु उक्त ज्ञानमे एकत्वका बाध तब होता यदि ज्ञानमे विरुद्ध
धर्मोंका अध्यास होता । तत्तांशमे परोक्षत्व और इदमाशमे अपरोक्षत्व
को लेकर तो ज्ञानमे विरुद्ध धर्माध्यास असिद्ध है। सस्कार या
स्मृतिके द्वारा उपनीत विशेषणांशमे भी विशिष्टज्ञान अपरोक्ष ही
होता है ।
एव, सामान्यज्ञानकी प्रामाणिकताका भी निराकरण नहीं हो सकता ।
क्योंकि सामान्य ( जाति ) रूप विषयका निराकरण किये बिना सामान्य-
ज्ञानके प्रामाण्यका निराकरण नहीं हो सकता और विषयनिराकरणकी
असम्भाव्यता पूर्वमे दिखाई जा चुकी है ।
यह भी नहीं कह सकते कि—जो ज्ञान प्रमाण होता है, वह इन्द्रिय-
जन्य होता है, सामान्यज्ञान तो इन्द्रियजन्य है नहीं। इसलिये उसमें
इन्द्रियजन्यत्वरूप व्यापकके अभावसे प्रामाण्यरूप व्याप्यका अभाव
सिद्ध हो जायगा—क्योंकि सामान्यज्ञान इन्द्रियके रहनेपर होता है और
इन्द्रियाभावकी दशामें नहीं होता। इस प्रकार चूंकि सामान्यज्ञान
इन्द्रियके साथ अन्वय और व्यतिरेकका अनुविधायी होता है, इस
कारण उसमे इन्द्रियजन्यत्वका निराकरण भी नहीं हो सकता है ।
१७२ आत्मतत्त्वविवेके
व्यभिचारात् । अन्यथा निर्विकल्पकस्याप्यनिन्द्रियजत्वप्रस-
ङ्गात् । कामातुरकामिनीज्ञानस्य तदन्तरेणाप्युपपत्तेः । बाध-
काभावाच्च दर्शनगतव्यापारौपाधिकत्वकल्पनानवकाशात् । अव-
काशे वा विपर्ययकल्पनाया अपि प्रसङ्गात् ।
इन्द्रियमनपेक्ष्य साक्षात्कारिसमनन्तरप्रत्ययमहिममात्रेण
साक्षात्कारिविकल्पोपपत्तौ तद्विपरीतानुत्पत्तिप्रसङ्गात् । प्रथ-
यद्यपि इन्द्रियव्यापारके विना भी शशविषाणादिविकल्पकी उत्पत्ति
होती है, इसलिये सविकल्पक ज्ञानके प्रति इन्द्रियसन्निकर्षकी कारणता
नहीं है। तथापि साक्षात्कारित्वावच्छिन्न ज्ञानके प्रति तो इन्द्रियका
अन्वयव्यतिरेकानुविधान नियमितरूपसे है ही। अन्यथा निर्विकल्पक
ज्ञानके प्रति भी इन्द्रियकी कारणता लुप्त हो जायगी। क्योंकि जब
कामातुरव्यक्तिको बिना इन्द्रियसन्निकर्षके ही केवल भावनावशसे निर्वि-
कल्पक
क्षणभङ्गवादः १७३
ममनुत्पत्तेः पूर्वस्मरणदिसहकारिवैधुर्यादिनिबन्धनत्वादि-
त्येषा दिक्।
अस्तु तर्हि प्रयोजनानुरोधादपोहस्वीकारः, सर्वधर्मावा-
च्यत्वसिद्धिर्हि परमं प्रयोजनम्, कल्पनाजालविधूननेन गम्भी-
रोदारसमाधिसमधिगमादिति चेत्, निष्प्रमाणमिदं कः श्रद्द-
ध्यात् ? प्रमाणं चात्र न प्रत्यक्षानुमाने । आगमश्च न
किञ्चिद् वदतीति त्वयैव ग्राहितः शिष्यः।
मात्रसे सविकल्पकी उत्पत्ति इसलिये नहीं होती, क्योंकि वह सहकारीके
रूपमें पूर्ववर्ती निर्विकल्पकी अपेक्षा करती है, तथा वही इन्द्रिय प्रत्य-
भिज्ञात्मक साक्षात्कारी ज्ञानकी उत्पत्तिके लिये सहकारीके रूपमें तत्तांशके
स्मरणकी अपेक्षा करती है, और इन्द्रियसम्पातक्षणमे उक्त सहकारियोंका
अभाव रहता है। यहाँ सामान्यज्ञानके प्रामाण्यकी उपत्तिके लिये
उसके इन्द्रियजन्यत्वका साधन तो एक दिग्दर्शनमात्र है। वस्तुतस्तु
विषय के अबाधित होनेसे ही कोई ज्ञान प्रामाणिक होता है। इसीलिये
इन्द्रियजन्य नहीं होनेपर भी अनुमित्यादि ज्ञान प्रमाण होता है।
(पूर्वपक्ष) "तो प्रयोजनके अनुरोधसे ही अपोह स्वीकार करना चाहिये
और गवादि शब्दोंके वाच्य गोत्व आदि धर्म नहीं होते, यह सिद्ध करना
ही यहाँ परम प्रयोजन है। क्योंकि अपोहस्वीकारद्वारा जात्यादि-
कल्पनाजालका उन्मूलन होकर वासनासहित मिथ्याज्ञानके उन्मूलनमे
समर्थ एव मुक्तिफलका प्रदान करनेवाले समाधिकी प्राप्ति हो जायगी।
अर्थात् जात्यादिक जब पारमार्थिक नहीं रहेंगे तो तुच्छ समझकर उसमें
प्रवृत्त्यादि नहीं होगी। इस प्रकार बाह्यव्यापारसे उपरत होकर मन
नैरात्म्यभावनामे समाहित होगा और मुक्त हो जायगा"
(उत्तरपक्ष) इस प्रमाणशून्य कथनमे कौन श्रद्धा करेगा? अर्थात्
अपोहका स्वीकार समाधिप्राप्तिका कारण है, यह कथन अप्रामाणिक
होनेसे अश्रद्धेय है। क्योंकि इसमें प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण नहीं
हैं। यदि कहो कि इसमे बौद्ध आगम प्रमाण है, तो शब्दरूप होनेसे
आगम भी किसी वस्तुको नहीं कह सकता यह बात तो तुमने ही अपने
शिष्योंको सिखा दी है।
१७४ आत्मतत्त्वविवेके
न चैवं चेतनो ग्राहयितुमपि शक्यते, स्ववाग्विरोधस्यो-
द्भटत्वात् । तथाहि—
शब्दस्य कस्यचिदपि¹ वस्तुनि मानसिद्धा
बाधा²विधिव्यवहृतिः क्वचिदस्ति नो वा ?
साथ ही इस प्रकारकी सीख किसी सचेतन व्यक्तिको नहीं दी जा
-सकती, क्योंकि उत्कट स्ववचनविरोध हो जायगा । अर्थात् "आगमो न
किञ्चिद् वक्ति" यह भी तो आगम ही है और कुछ विषयको भी कहता
है । फिर "आगम किसी वस्तुको नहीं कहता" ऐसा कहनेमें स्ववचन
विरोध क्यों न होगा ? एवं किसी शब्दद्वारा स्वलक्षणात्मक वस्तुमें
प्रामाणिक विधि और निषेधका व्यवहार होता है या नहीं ? यदि होता
है तो क्यों नहीं वे सम्पूर्ण दोष यहाँ भी हो जायेंगे ? जो तुम्हारे द्वारा
मेरे प्रति दिये गये हैं । अर्थात् अननुगत होनेसे स्वलक्षणात्मक वस्तु
शब्दसङ्केतका विषय नहीं हो सकता और शाब्दज्ञानका भी विषय नहीं
हो सकता । क्योंकि स्वलक्षणज्ञानको शब्दप्रयोगद्वारा अभिव्यक्त नहीं
किया जा सकता है ।
एवं अतद्व्यावृत्तिरूप अनुगतधर्मको मान कर भी स्वलक्षण वस्तु
शब्दका वाच्य नहीं हो सकती । क्योंकि वस्तुभूत स्वलक्षण अतद्व्या-
वृत्तिरूप अलीक (मिथ्या) धर्मका आश्रय नहीं हो सकता है, इत्यादि
दोष तुम्हारे पक्षमें भी हो जायेंगे ।
यदि कहो कि—स्वलक्षणात्मक वस्तुमें शब्दद्वारा विधि-निषेध
व्यवहार नहीं होता—तो यहाँ स्ववचनविरोध स्पष्ट है । क्योंकि उक्त
शब्दद्वारा भी वस्तुका ही व्यवहार किया गया है । इस प्रकार अवस्तुकी
जगहपर वस्तुपदका सन्निवेश कर तुम्हारे ही श्लोकको तुम्हारे विरोधमें
पढ़ा जा सकता है । जैसे—
शब्दस्य कस्यचिदपि वस्तुनि मानसिद्धा
बाधाविधिव्यवहृतिः क्वचिदस्ति नो वा ?
१ काचिदपि—इति क्वचित् पाठः ।
२ निषेधविधीत्यर्थः ।
क्षणभङ्गवादः १७५
अस्त्येव चेत्, कथमियन्ति न दूषणानि ?
नास्त्येव चेत्, स्ववचनप्रतिरोधसिद्धिः ॥
इति तवैव¹ विषयसञ्चारमात्रेण श्लोकः ।
न चास्माकमिव तवाप्यत्र मूकतैव शरणम् । सर्वथा
वचनविरोधे ह्युदासीनस्य सा शोभते, न चात्र विधौ विरोधः
कश्चित् । न च² त्वमुदासीनः, प्रयोजने प्रवृत्तत्वात् । तस्मादल-
मङ्गुलीदीपिकया ध्वान्तध्वंसविधिमनुष्ठायेति ।
अस्त्येव चेत्, कथमियन्ति न दूषणानि ?
नास्त्येव चेत्, स्ववचनप्रतिरोधसिद्धिः ॥
हमने जैसे तुम्हारी गाथाके प्रति मूकता गृहीत कर ली, वैसे ही विषय
बदल कर पढ़ी गयी मेरी गाथाके प्रति तुम्हारी भी मूकता ही शरण नहीं
बन सकती । क्योंकि हर हालतमें वचनविरोध होनेपर उदासीन हुए
व्यक्तिके लिये ही वह मूकता शोभा देती है । यहाँ विधिपक्षमें तो
कोई विरोध नहीं है और तुम उदासीन भी नहीं हो । क्योंकि अपोह-
सिद्धिद्वारा कल्पनाजालका ध्वंस कर समाधिप्राप्तिरूप प्रयोजनमें प्रवृत्त
हुए हो । इसलिये अङ्गुलीकी दीपिकासे अन्धकारको नष्ट करनेकी
चेष्टा न करो ।
अर्थात् 'यत् सत् तत् क्षणिकम्' इस अनुमानमें व्यतिरेकदृष्टान्तके
रूपमें तुमने कूर्मरोमका दृष्टान्त दिया है । उसका यदि मैं निषेध करूँ तो
कूर्मरोममें सत्त्वापत्ति हो जायगी, इस प्रकार उसे असत् माननेवाले
मुझे स्ववचनविरोध हो जायगा । अत मैंने मूकता स्वीकार कर ली ।
किन्तु तुम यहाँ मूकता का ग्रहण नहीं कर सकते । क्योंकि "अपोहसिद्धि-
१ यहाँ बौद्धकारिका यह है—
धर्मस्य शब्दस्य कस्यचिद्वस्तुनि मानसिद्धा ।
बाधाविधिप्रवृत्तिः क्वचिदस्ति नो वा ?
अस्त्येव चेत्, कथमियन्ति न दूषणानि ?
नास्त्येव चेत्, स्ववचनप्रतिरोध एव (सिद्धिः) ॥
२ न वा—इति शङ्करमिश्रसम्मतः पाठः ।
१७६ आत्मतत्त्वविवेके
आगमस्य तत्त्वार्थपरिस्पर्शित्वविरोधे न स्वर्गापवर्गार्थिनां
प्रवृत्तिः सिध्यतीति प्रयोजनमस्मद्विचारस्यैव परं सुन्दरम् ।
तस्माच्छब्दैः किं वाच्यमित्यनुयोगे किं प्रतिभासात् ?
अथाध्यवसायात् ? यद्वा तत्त्वतः ? इति विकल्पे विकल्पस्थो-
ऽन्यापोढाकारः, अन्यापोढस्वलक्षणं, न किञ्चिदिति यत् क्रमेण
प्रत्युक्तम्—तत्र प्रथमे समयविपर्यासः, विकल्पाकारस्य समया-
विषयत्वात् ।
द्वारा कल्पनाजालके ध्वंसमे शब्दका विधिनिषेधव्यवहार नहीं होता”
ऐसा कहनेवाले तुम्हें स्ववचनविरोध होगा ही ।
मेरे मतमे तो आगमको तत्त्वार्थप्रतिपादक न माननेपर स्वर्गार्थियों
और मोक्षार्थियोंकी प्रवृत्ति ही न हो सकेगी । इसप्रकार आगमको
प्रमाण माननेका प्रयोजन मेरे विचारानुसार ही परम सुन्दर है । अर्थात्
स्वर्ग और मोक्षमे प्रवृत्तिरूप प्रयोजनसिद्धिके लिये मैं तत्त्वप्रतिपादनमे
आगमको प्रमाण मानता हूँ । किन्तु आगमको प्रमाण नहीं माननेवाले
तुम्हें अपोहसिद्धिद्वारा समाधिप्राप्तिरूप प्रयोजनकी सिद्धि कैसे हो
सकेगी ? क्योंकि अपोहमे प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण हैं नहीं और
आगमको तुम प्रमाण मानते नहीं ।
इसलिये, शब्दोंका वाच्य अर्थ क्या है ? नैयायिकद्वारा इस प्रश्नके
किये जानेपर ज्ञानश्रीने तीन प्रकारके विकल्प किये हैं कि—१ शब्दजन्य
ज्ञानका विषय क्या है ? यह प्रश्न है ? या २—शब्दजन्यप्रवृत्तिका
विषय क्या है ? यह प्रश्न है ? अथवा ३—वस्तुत शब्दका वाच्य क्या
है ? यह प्रश्न है । और तीनोंका क्रमश उत्तर देते हुए कहा है कि—
यदि प्रथम प्रश्न हो 'तो उत्तर होगा कि सविकल्पकज्ञाननिष्ठ जो अन्य-
व्यावृत्त आकार, वही शब्दजन्य ज्ञानका विषय है । यदि द्वितीय प्रश्न
हो तो उत्तर होगा कि अन्यापोढ स्वलक्षणात्मक वस्तुमें ही शब्दद्वारा
प्रवृत्ति होती है । यदि तृतीय प्रश्न हो तो उत्तर होगा कि कोई भी वस्तु
शब्दका वाच्य नहीं होती ।
किन्तु यहाँ ज्ञानश्रीके प्रथम उत्तरमे सङ्केतका विपर्यय (अभाव) हो
क्षणभङ्गवाद. १७७
द्वितीये तु प्रवृत्तिविपर्यासः, अदृष्टे नियामकाभावात् ।
तृतीये स्ववाङ्निरोधः, अस्यैवार्थस्यानेन तत्त्वतावचनात् ।
अवचने वा तत्त्वतोऽनुत्तरत्वादित्युपसंहारः । तत् सिद्धमेतत्,
न क्षणिकत्वमात्मनि बाधकमिति ॥
॥ इति क्षणभङ्गवादनिरासः ॥
जाता है। क्योंकि ज्ञानका आकार सङ्केतका विषय नहीं होता, किन्तु
बाह्यवस्तु ही सङ्केतका विषय होती है। ऐसी स्थितिमे विकल्पगत
आकार शब्दजन्य ज्ञानका विषय नहीं हो सकता है।
द्वितीय उत्तरमे प्रवृत्तिका विपर्यय (अभाव) हो जाता है। क्योंकि
स्वलक्षणात्मक वस्तुओंके विकल्पका अविषय होनेके कारण विकल्पद्वारा
किस स्वलक्षणमे प्रवृत्ति हो और किसमे न हो, इसका नियामक नहीं
होनेसे कहीं भी प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी।
तृतीय उत्तरमे स्ववचन विरोध हो जाता है। क्योंकि “तत्त्वत
कोई अर्थ शब्दका वाच्य नहीं होता है” इसी अर्थकी तात्त्विकताको
“शब्दस्य किञ्चित् तत्त्वतो न वाच्यम्” यह आपका शब्द जब बता रहा
है, तब कोई भी शब्द किसी अर्थको नहीं बताता, ऐसा कहनेमें स्ववचन
विरोध अवश्य होगा। इससे बचनेके लिये यदि तृतीय प्रश्नका उत्तर
ही न दो तो उत्तर न देनेसे अप्रतिभा नामक निग्रहस्थानसे निगृहीत हो
जाओगे। इस प्रकार अपोहनिराकरणका यह प्रसङ्ग समाप्त होता है।
अतः यह बात सिद्ध हो गयी कि क्षणिकवाद आत्माकी सिद्धिमे
बाधक नहीं हो सकता।
इति क्षणभङ्गवादनिरास ।
१२
अथ बाह्यार्थभङ्गवादः
विज्ञानवादिनि जागरूके बाह्यमेव नास्ति, कुत आत्मेति
चेत्, स तावदिदं पृष्टो व्याचष्टाम्—किं ते ग्राह्यग्राहक-
भागयोः परमार्थसतोरेवाभेदो विवक्षितः ? उताहो अभिन्न-
जातीयत्वम् ? अथ ग्राह्यांशस्यालीकत्वमिति ?
तत्र प्रथमे साध्ये यः कश्चिद्धेतुरुपादीयते सहोपलम्भ-
नियमो वा, ग्राह्यत्वं वा, प्रकाशमानत्वं वा, स व्यक्तमाभासः।
योगाचारमतखण्डन
(पूर्वपक्ष) विज्ञानवादीके सजग रहते बाह्य कोई वस्तु ही सिद्ध
नहीं है, फिर तदन्तर्गत आत्माकी सत्ता कैसे हो सकती है ? अर्थात् एक
विज्ञान ही परमार्थ सत् है, उससे भिन्न सभी बाह्य असत् हैं। तथा
नैयायिकोंका आत्मा भी ज्ञानसे भिन्न होनेसे बाह्य और असत् है।
(उत्तरपक्ष) ऐसा कहनेवाला विज्ञानवादी इन प्रश्नोंका उत्तर
कहे कि क्या उसे वस्तुभूत ग्राह्य (विषय) और ग्राहक-(ज्ञान) भागोंका
अभेद विवक्षित है ? या उन दोनोंके एक जातिका होना विवक्षित है ?
अथवा ग्राह्यांश (विषयभाग) का मिथ्यात्व अभिप्रेत है ?
इनमे यदि प्रथम साध्य अभिप्रेत हो तो उसकी सिद्धिके लिये जो
कोई हेतु दिया जायगा, वह चाहे सहोपलम्भनियम हो या ग्राह्यत्व हो
अथवा प्रकाशमानत्व हो, वह स्पष्ट ही हेत्वाभास है, हेतु नहीं है।
अर्थात् ज्ञान और विषय अभिन्न है, क्योंकि विषयके साथ ही ज्ञानका
भी नियमतः भान विज्ञानवादी मानता है। एवं घटविषय घटज्ञानसे
अभिन्न है, क्योंकि वह ग्राह्य है। तथा घटज्ञान घटसे अभिन्न है,
क्योंकि ज्ञान स्वप्रकाशक है। ये तीनों ही हेतु हेत्वाभास हैं।
क्योंकि आपके मतानुसार ग्राह्य और ग्राहकमें अभेद होनेसे परामर्श
हेतु, पक्ष, साध्य और अनुमितिमें अभेद होगा, अत इनमें परस्पर
तथाहि नीलधवलादिपरस्परविरुद्धाकारनिकरावगाहि विज्ञान-
मनुभूयते, तदिदं तस्य स्ववधाय कृत्योत्थापनम् ।
यदि हि मिथः प्रत्यनीकधर्मानुल्लिखेत्, कथमेकं सत्
तदात्मकं भवेत् ? न चेदुल्लिखेत् कथं तदाकारं नाम ? स्व-
संवेदनस्यानुल्लिखितरूपाभावात् ।
बाह्यस्यैतन्मिथविरुद्धधर्माध्यासाद् भयम् , तथात्वेऽप्यभेदे-
ऽर्थक्रियाचेतनप्रवृत्तीनां सङ्करप्रसङ्गात्, विवेचनानुपपत्तिप्रस-
हेतुहेतुमद्भाव कैसे हो सकता है ? एव नील, धवल, पीत आदि
परस्पर विरुद्ध आकारोंका अवगाहन करनेवाला चित्ररूपका ज्ञान सबको
अनुभूत होता है । जो उस ज्ञानके अपने ही वधके लिये कृत्याको
जगानेके समान है । अर्थात् परस्पर विरुद्ध अनेक आकारोंको विषय
करनेवाला एक चित्रज्ञान होता है । यहाँ यदि ग्राह्य-ग्राहकमें अभेद
हो तो एक ज्ञान अनेक 'विरुद्धस्वरूपवाला कैसे हो सकता है ? ।
अतः चित्रज्ञानको भी आकारभेदसे भिन्न मानना पड़ेगा । इसस्थितिमें
चित्राकार एकज्ञान नहीं रह जायगा और स्वयं उसका ही विलय
हो जायगा ।
क्योंकि चित्रज्ञान यदि परस्पर विरोधी धर्मोंका उल्लेख करता है तो
वह ज्ञान एक होता हुआ उन अनेक विरोधी धर्मोंसे अभिन्न कैसे हो
सकता है ? और यदि उन विरोधी धर्मोंका उल्लेख नहीं करता है तो
वह नीलाकार धवलाकार आदि कैसे हो सकता है ?
यदि कहें कि—बिना उल्लेख हुए ही नील धवल आदि विरोधी
धर्म चित्रज्ञानके विषय होंगे—तो यह नहीं हो सकता है । क्योंकि
स्वप्रकाशपक्षमें विषयोंका उल्लेख किये बिना कोई ज्ञान ही नहीं
नहीं होता है ।
( पूर्वपक्ष ) बाह्य वस्तुको ही विरुद्धधर्माध्याससे भय है । क्योंकि
विरुद्धधर्मोंका अध्यास होनेपर भी यदि अभेद हो तो वस्तुओंमें अर्थ-
क्रिया एवं उनमें चेतनप्रवृत्तिका सङ्कर हो जायगा । अर्थात् आगसे भी
प्यासकी शान्ति और जलसे भी दाह होने लगेगा । इस प्रकार अर्थक्रिया
१८० आत्मतत्त्वविवेके
ज्ञाच्च, न ऽ विज्ञानस्य । न हि तस्यार्थक्रियाधीनं सत्त्वम्,
अपितु प्रतिभाससमात्राधीनम् । नापि तत्रार्थक्रियार्थिनः
काचित् प्रवृत्तिः, स्वरसवाहिविज्ञानप्रवाहातिरिक्ताया अर्थ-
क्रियायास्तदर्थिनश्चाभावात् । विवेचनाभावश्च परमो निर्वाहः,
स्वसंविदितरू ( द्रू ) पत्वादिति चेत्,
तन् किमङ्ग ! परिणतशान्तेराश्रमपदमिव विज्ञानमासाद्य
व्यालनकुलादेरिव नीलधवलादेः शाश्वतिकविरोधत्यागः ?
निभृतवैराणां तद्रूपत्यागो वा ?
का सङ्कर हो जायगा । एव दाहके लिये जलमें तथा प्यासकी शान्तिके
लिये आगमें प्राणियोंकी प्रवृत्ति होने लगेगी । इस प्रकार प्रवृत्तिका
भी सङ्कर हो जायगा । एवं, अभेद होनेपर नील और धवलका विवेचन
( भेदज्ञान ) नहीं हो सकेगा ।
विज्ञानको तो विरुद्धधर्माध्याससे कोई भय नहीं है । क्योंकि
अर्थक्रियाके अधीन विज्ञानकी सत्ता नहीं है, किन्तु स्वप्रकाश होनेसे
प्रतीतिमात्रके अधीन ही उसकी सत्ता है । साथ ही किसी अर्थक्रियाकी
इच्छासे विज्ञानमे किसीकी प्रवृत्ति भी नहीं होती है, क्योंकि मेरे मतमें
स्वरसवाही विज्ञानधाराके अतिरिक्त कोई अर्थक्रिया या उसका अर्थी
व्यक्ति ही नहीं होता ।
यदि “विरुद्धधर्मका अध्यास होनेपर भी विज्ञानमे अभेद माननेमें
नीलपीतादि विषयके भेदसे विज्ञानका विवेचन ( भेदज्ञान ) नहीं हो
सकेगा” यह अनुपपत्ति विज्ञानवादीके ऊपर दिया जाय तो यह
विज्ञानवादकी परम साधिका ही है, बाधिका नहीं । क्योंकि विज्ञान-
वादमें नीलपीतादि विषय और उसके विज्ञानमें भी अभेद ही इष्ट है ।
एवं विज्ञानको जाननेके लिये भी स्वभिन्न विज्ञानकी आवश्यकता
नहीं है । क्योंकि स्वप्रकाश होनेसे विज्ञान अपने आप विदितरूप
होता है ।
( उत्तरपक्ष ) तो क्या ? उच्चकोटिकी शान्तिवाले मुनिके आश्रम-
स्थानको पाकर सर्प और नेवलेके समान विज्ञानको पाकर नीलधवलादि
बाह्यार्थभङ्गवादः १८१
न तावत् प्रथमः, परस्परनिषेधविधिनान्तरीयकविधि-
निषेधयोरविरोधे जगति विरोधोच्छेदप्रसङ्गात् । न चैवमस्त्वि-
त्युत्तरेऽपि निर्वृतिः, कथमप्युक्तरूपताया अनिवृत्तेः, ताव-
न्मात्रशरीरत्वाच्च विरोधस्य । तत्सिद्धेरेव च भेदसिद्धिः ।
अतो न द्वितीयोऽपि ।
यस्तु बाह्ये विरोधपरिपालनाय विशेषो दर्शितः, स तेषा-
मेवास्तु । यदि हि विरुद्धधर्माध्यासस्य भेदसाधकत्वं प्रति
विरोधी धर्मोंका सदातन विरोध हट जाता है ? अथवा विरोधके रहते
हुए भी विरोधका फल हट जाता है ? अर्थात् नीलधवलादि विरोधी
विषयोंके कारण विज्ञानमें भेद नहीं आता ?
यहाँ प्रथम पक्ष ठीक नहीं है । क्योंकि परस्परके निषेध और विधि
का व्याप्य जो परस्परका विधि और निषेध, उसमें यदि अविरोध हो जाय
तो जगत्मात्रसे विरोधका उच्छेद हो जायगा । अर्थात् नीलत्व पीतत्वा-
भावका व्याप्य होता है और पीतत्व नीलत्वाभावका व्याप्य होता है ।
इस प्रकार परस्पर अत्यन्त विरोधी नील और पीतमें भी यदि विरोध
हट जाय तो संसारसे विरोधका नाम ही हट जायगा ।
(शंका) विज्ञानवादमें सभी वस्तुके विज्ञानसे अभिन्न होनेके कारण
विरोधकी स्वतन्त्रसत्ताका उच्छेद हो जाना भी अभीष्ट ही है ।
(उत्तर) तुम्हारे इस उत्तरसे भी शान्ति नहीं मिल सकती है।
क्योंकि नीलपीतादिमें किसी भी प्रकारसे परस्परविरहव्याप्यता (विरुद्ध-
रूपता) की निवृत्ति नहीं हो सकती है। कारण, परस्पर विरह-
व्याप्यरूपता ही विरोधका स्वरूप है । एवं, नीलपीतादिके विरोधकी
सिद्धि ही नीलपीतविषयक विज्ञानके भेदकी भी सिद्धि है । इसलिये
“विरोधके रहते हुए भी विज्ञानमें भेद नहीं होता” यह द्वितीय पक्ष
भी ठीक नहीं है ।
जो तो बौद्धोंने नीलपीतादि बाह्यवस्तुमें विरोधकी रक्षाके लिये अर्थ-
क्रियाप्रतिनियम (अर्थक्रियाकी व्यवस्था) को दर्शाया है, वह अर्थक्रिया-
प्रतिनियमरूप विशेष उन्हींके यहाँ रहे। क्योंकि “विरुद्धधर्माध्यास