आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः १६७
अथ पिण्डमन्तर्गडुमुपादायोपलक्षणतया तत्रेति व्यवहारः,
तदा तदुपसर्पणापसर्पणोत्पत्तिविनाशैरेव तदुपपत्तौ न यातीत्या-
दिरपराद्धेषोरिव धानुष्कस्य कण्ठडम्बरः।
तथाहि पिण्डमधिकृत्योपसर्पणापसर्पणाभावः, तदुपलक्षितं
गोत्वकी सत्ता कारण है, इसलिये पिण्डकी उत्पत्तिके पूर्व या पीछे स्व-
रूपत गोत्वके रहनेपर भी आकाशके साथ उसका समवायसम्बन्ध
नहीं रहनेसे आकाशमें गोत्वप्रसङ्ग नहीं होता है।
यदि कहो कि—पिण्ड तो एक अन्तर्गडुमात्र (निरूपकमात्र) है,
न कि वह गोत्वका समवायेन आधार है। इसलिये उसे लेकर पिण्डमे
गोत्वका व्यवहार लाक्षणिक है, मुख्य नहीं है। और उस उपलक्षणभूत
पिण्डकी सत्तावस्थामे "इह गोत्वम्" तथा पिण्डशून्य आकाशमें
"नेह गोत्वम्" ऐसा व्यवहार होता है—तो वैसे ही पिण्डके उपसर्पण
अपसर्पण, उत्पत्ति एव विनाशसे ही गोत्वके सत्त्वासत्त्व व्यवहारोंकी भी
उपपत्ति हो जायगी, फिर—
न याति न च तत्रासीत् न चोत्पन्न न चाशवत्।
जहाति पूर्व नाधारमहो व्यसनसन्ततिः॥
इस प्रकारका जातिके सम्बन्धमें धर्मकीर्तिका कण्ठशोष भी वैसा ही है,
जैसा बाणके लक्ष्यसे विचलित होनेपर धनुर्धारीका होता है। अर्थात् धर्म-
कीर्तिने जातिके सम्बन्धमें विरोध उपस्थित किया है कि "गोत्वादि जाति
जायमान पिण्डदेशमे न जाती है, न वहाँ पहलेसे थी ही, न वहाँ
उत्पन्न ही होती है और न सावयव होती हुई पूर्व आधारको छोड़ती
या अन्य आधारको प्राप्त ही करती है, इस प्रकार जाति माननेमे कितनी
व्यसनपरम्परा है ?" परन्तु हमारे मतमे जातिको कहीं जाने या
उत्पन्न होनेकी आवश्यकता नहीं है, वह तो व्यापक और नित्य है।
जाना, आना, उत्पन्न और नष्ट होना पिंडगत धर्म है। इस प्रकार
जातिको लक्ष्य कर कीर्तिने जो विरोध प्रदर्शन किया है, वह व्यक्तिमे
संक्रान्त होकर निष्फल हो जाता है। अतः धर्मकीर्तिकी स्थिति लक्ष्य-
च्युत धानुष्कके समान है।
एवं, पिंड तक न जातिका उपसर्पण होता है और न किसी अन्य