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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 530 में से

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पृष्ठ 229

१८० आत्मतत्त्वविवेके
ज्ञाच्च, न ऽ विज्ञानस्य । न हि तस्यार्थक्रियाधीनं सत्त्वम्,
अपितु प्रतिभाससमात्राधीनम् । नापि तत्रार्थक्रियार्थिनः
काचित् प्रवृत्तिः, स्वरसवाहिविज्ञानप्रवाहातिरिक्ताया अर्थ-
क्रियायास्तदर्थिनश्चाभावात् । विवेचनाभावश्च परमो निर्वाहः,
स्वसंविदितरू ( द्रू ) पत्वादिति चेत्,
तन् किमङ्ग ! परिणतशान्तेराश्रमपदमिव विज्ञानमासाद्य
व्यालनकुलादेरिव नीलधवलादेः शाश्वतिकविरोधत्यागः ?
निभृतवैराणां तद्रूपत्यागो वा ?

का सङ्कर हो जायगा । एव दाहके लिये जलमें तथा प्यासकी शान्तिके
लिये आगमें प्राणियोंकी प्रवृत्ति होने लगेगी । इस प्रकार प्रवृत्तिका
भी सङ्कर हो जायगा । एवं, अभेद होनेपर नील और धवलका विवेचन
( भेदज्ञान ) नहीं हो सकेगा ।
विज्ञानको तो विरुद्धधर्माध्याससे कोई भय नहीं है । क्योंकि
अर्थक्रियाके अधीन विज्ञानकी सत्ता नहीं है, किन्तु स्वप्रकाश होनेसे
प्रतीतिमात्रके अधीन ही उसकी सत्ता है । साथ ही किसी अर्थक्रियाकी
इच्छासे विज्ञानमे किसीकी प्रवृत्ति भी नहीं होती है, क्योंकि मेरे मतमें
स्वरसवाही विज्ञानधाराके अतिरिक्त कोई अर्थक्रिया या उसका अर्थी
व्यक्ति ही नहीं होता ।
यदि “विरुद्धधर्मका अध्यास होनेपर भी विज्ञानमे अभेद माननेमें
नीलपीतादि विषयके भेदसे विज्ञानका विवेचन ( भेदज्ञान ) नहीं हो
सकेगा” यह अनुपपत्ति विज्ञानवादीके ऊपर दिया जाय तो यह
विज्ञानवादकी परम साधिका ही है, बाधिका नहीं । क्योंकि विज्ञान-
वादमें नीलपीतादि विषय और उसके विज्ञानमें भी अभेद ही इष्ट है ।
एवं विज्ञानको जाननेके लिये भी स्वभिन्न विज्ञानकी आवश्यकता
नहीं है । क्योंकि स्वप्रकाश होनेसे विज्ञान अपने आप विदितरूप
होता है ।
( उत्तरपक्ष ) तो क्या ? उच्चकोटिकी शान्तिवाले मुनिके आश्रम-
स्थानको पाकर सर्प और नेवलेके समान विज्ञानको पाकर नीलधवलादि