आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः १७५
अस्त्येव चेत्, कथमियन्ति न दूषणानि ?
नास्त्येव चेत्, स्ववचनप्रतिरोधसिद्धिः ॥
इति तवैव¹ विषयसञ्चारमात्रेण श्लोकः ।
न चास्माकमिव तवाप्यत्र मूकतैव शरणम् । सर्वथा
वचनविरोधे ह्युदासीनस्य सा शोभते, न चात्र विधौ विरोधः
कश्चित् । न च² त्वमुदासीनः, प्रयोजने प्रवृत्तत्वात् । तस्मादल-
मङ्गुलीदीपिकया ध्वान्तध्वंसविधिमनुष्ठायेति ।
अस्त्येव चेत्, कथमियन्ति न दूषणानि ?
नास्त्येव चेत्, स्ववचनप्रतिरोधसिद्धिः ॥
हमने जैसे तुम्हारी गाथाके प्रति मूकता गृहीत कर ली, वैसे ही विषय
बदल कर पढ़ी गयी मेरी गाथाके प्रति तुम्हारी भी मूकता ही शरण नहीं
बन सकती । क्योंकि हर हालतमें वचनविरोध होनेपर उदासीन हुए
व्यक्तिके लिये ही वह मूकता शोभा देती है । यहाँ विधिपक्षमें तो
कोई विरोध नहीं है और तुम उदासीन भी नहीं हो । क्योंकि अपोह-
सिद्धिद्वारा कल्पनाजालका ध्वंस कर समाधिप्राप्तिरूप प्रयोजनमें प्रवृत्त
हुए हो । इसलिये अङ्गुलीकी दीपिकासे अन्धकारको नष्ट करनेकी
चेष्टा न करो ।
अर्थात् 'यत् सत् तत् क्षणिकम्' इस अनुमानमें व्यतिरेकदृष्टान्तके
रूपमें तुमने कूर्मरोमका दृष्टान्त दिया है । उसका यदि मैं निषेध करूँ तो
कूर्मरोममें सत्त्वापत्ति हो जायगी, इस प्रकार उसे असत् माननेवाले
मुझे स्ववचनविरोध हो जायगा । अत मैंने मूकता स्वीकार कर ली ।
किन्तु तुम यहाँ मूकता का ग्रहण नहीं कर सकते । क्योंकि "अपोहसिद्धि-
१ यहाँ बौद्धकारिका यह है—
धर्मस्य शब्दस्य कस्यचिद्वस्तुनि मानसिद्धा ।
बाधाविधिप्रवृत्तिः क्वचिदस्ति नो वा ?
अस्त्येव चेत्, कथमियन्ति न दूषणानि ?
नास्त्येव चेत्, स्ववचनप्रतिरोध एव (सिद्धिः) ॥
२ न वा—इति शङ्करमिश्रसम्मतः पाठः ।