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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 221

१७२ आत्मतत्त्वविवेके
व्यभिचारात् । अन्यथा निर्विकल्पकस्याप्यनिन्द्रियजत्वप्रस-
ङ्गात् । कामातुरकामिनीज्ञानस्य तदन्तरेणाप्युपपत्तेः । बाध-
काभावाच्च दर्शनगतव्यापारौपाधिकत्वकल्पनानवकाशात् । अव-
काशे वा विपर्ययकल्पनाया अपि प्रसङ्गात् ।
इन्द्रियमनपेक्ष्य साक्षात्कारिसमनन्तरप्रत्ययमहिममात्रेण
साक्षात्कारिविकल्पोपपत्तौ तद्विपरीतानुत्पत्तिप्रसङ्गात् । प्रथ-
यद्यपि इन्द्रियव्यापारके विना भी शशविषाणादिविकल्पकी उत्पत्ति
होती है, इसलिये सविकल्पक ज्ञानके प्रति इन्द्रियसन्निकर्षकी कारणता
नहीं है। तथापि साक्षात्कारित्वावच्छिन्न ज्ञानके प्रति तो इन्द्रियका
अन्वयव्यतिरेकानुविधान नियमितरूपसे है ही। अन्यथा निर्विकल्पक
ज्ञानके प्रति भी इन्द्रियकी कारणता लुप्त हो जायगी। क्योंकि जब
कामातुरव्यक्तिको बिना इन्द्रियसन्निकर्षके ही केवल भावनावशसे निर्वि-
कल्पक