आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवाद. १७७
द्वितीये तु प्रवृत्तिविपर्यासः, अदृष्टे नियामकाभावात् ।
तृतीये स्ववाङ्निरोधः, अस्यैवार्थस्यानेन तत्त्वतावचनात् ।
अवचने वा तत्त्वतोऽनुत्तरत्वादित्युपसंहारः । तत् सिद्धमेतत्,
न क्षणिकत्वमात्मनि बाधकमिति ॥
॥ इति क्षणभङ्गवादनिरासः ॥
जाता है। क्योंकि ज्ञानका आकार सङ्केतका विषय नहीं होता, किन्तु
बाह्यवस्तु ही सङ्केतका विषय होती है। ऐसी स्थितिमे विकल्पगत
आकार शब्दजन्य ज्ञानका विषय नहीं हो सकता है।
द्वितीय उत्तरमे प्रवृत्तिका विपर्यय (अभाव) हो जाता है। क्योंकि
स्वलक्षणात्मक वस्तुओंके विकल्पका अविषय होनेके कारण विकल्पद्वारा
किस स्वलक्षणमे प्रवृत्ति हो और किसमे न हो, इसका नियामक नहीं
होनेसे कहीं भी प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी।
तृतीय उत्तरमे स्ववचन विरोध हो जाता है। क्योंकि “तत्त्वत
कोई अर्थ शब्दका वाच्य नहीं होता है” इसी अर्थकी तात्त्विकताको
“शब्दस्य किञ्चित् तत्त्वतो न वाच्यम्” यह आपका शब्द जब बता रहा
है, तब कोई भी शब्द किसी अर्थको नहीं बताता, ऐसा कहनेमें स्ववचन
विरोध अवश्य होगा। इससे बचनेके लिये यदि तृतीय प्रश्नका उत्तर
ही न दो तो उत्तर न देनेसे अप्रतिभा नामक निग्रहस्थानसे निगृहीत हो
जाओगे। इस प्रकार अपोहनिराकरणका यह प्रसङ्ग समाप्त होता है।
अतः यह बात सिद्ध हो गयी कि क्षणिकवाद आत्माकी सिद्धिमे
बाधक नहीं हो सकता।
इति क्षणभङ्गवादनिरास ।
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