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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 530 में से

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पृष्ठ 211

शङ्कयाऽप्युपहन्येत । ततो बाधकव्यसनमपहायानुगमव्यव-
हतिरन्यथाऽप्युपपाद्यताम् । न चैतच्छक्यम्, गत्यन्तराभावात् ।
न च बाधकमप्यस्ति । तद्धि स्वरूपतो वा स्यात् ज्ञानतो
वा स्यात् । स्वरूपतोऽप्यनुपलम्भो वा विरुद्धधर्माध्यासो वा ।
न प्रथमः, असिद्धेः । स्फुरत एव हि साधारणाकारस्य
शरीरं चिन्तयितुमारब्धं नास्फुरतः । अध्यक्षे साधारणस्फुरणं
व्यसेधामो न तु विकल्पे, तस्य समानसङ्केतग्रहतिमिरनिकुर-

निश्चित दोनों ही प्रकारका बाधक नहीं हो सकता है । कारण, जातिको
स्वीकार किये बिना किसी अन्य प्रकारसे जब अनुगत व्यवहारकी
सिद्धि ही नहीं की जा सकती है, तब जातिबाधककी शंका ही कहाँ
है ! अर्थात् अनुगत व्यवहारकी अनन्यथासिद्धि ही बाधक-शङ्काको दूर
कर देती है । अन्यथा विपक्षमें बलवान् बाधकको पाकर अनन्यथा
सिद्धिसे परिपुष्ट भी आपका स्वभावहेतु (अनुमापक हेतु) बाधककी
आशङ्कामात्रसे दूषित हो जायगा । इसलिये बाधकके व्यसनको छोड़कर
जातिके बिना भी अनुगतव्यवहारका उपपादन करनेका प्रयास करो ।
किन्तु जाति माने बिना कोई गति नहीं होनेसे अनुगतव्यवहारका उप-
पादन अशक्य है । क्योंकि अन्यापोहद्वारा अनुगत व्यवहारकी अनुप-
पत्ति दिखायी जा चुकी है ।
एव जातिके प्रति कोई निश्चित बाधक भी नहीं है । क्योंकि वह
जातिस्वरूपका बाधक होगा या उसके ज्ञानका ? स्वरूपपक्षमें भी जाति-
स्वरूपका अनुपलम्भ होगा अथवा विरुद्धधर्मका अध्यास होगा ?
। इसमें अनुपलम्भवाला प्रथम पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि अनुपलम्भ
असिद्ध है । कारण, यहाँ नाना गवादिव्यक्तियोंमें भासित होनेवाले ही
गोत्वादि सामान्यका स्वरूपचिन्तन प्रारम्भ किया गया है न कि नहीं
भासित होनेवालेका । अतः गोत्वादिसामान्यका अनुपलम्भ कहना
असङ्गत है ।
यह कथन भी कि—प्रत्यक्ष (निर्विकल्पक) में ही हम साधारण
धर्मस्फुरणका निषेध करते हैं, न कि सविकल्पकमें । निर्विकल्पक ज्ञानमें