आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः १७३
ममनुत्पत्तेः पूर्वस्मरणदिसहकारिवैधुर्यादिनिबन्धनत्वादि-
त्येषा दिक्।
अस्तु तर्हि प्रयोजनानुरोधादपोहस्वीकारः, सर्वधर्मावा-
च्यत्वसिद्धिर्हि परमं प्रयोजनम्, कल्पनाजालविधूननेन गम्भी-
रोदारसमाधिसमधिगमादिति चेत्, निष्प्रमाणमिदं कः श्रद्द-
ध्यात् ? प्रमाणं चात्र न प्रत्यक्षानुमाने । आगमश्च न
किञ्चिद् वदतीति त्वयैव ग्राहितः शिष्यः।
मात्रसे सविकल्पकी उत्पत्ति इसलिये नहीं होती, क्योंकि वह सहकारीके
रूपमें पूर्ववर्ती निर्विकल्पकी अपेक्षा करती है, तथा वही इन्द्रिय प्रत्य-
भिज्ञात्मक साक्षात्कारी ज्ञानकी उत्पत्तिके लिये सहकारीके रूपमें तत्तांशके
स्मरणकी अपेक्षा करती है, और इन्द्रियसम्पातक्षणमे उक्त सहकारियोंका
अभाव रहता है। यहाँ सामान्यज्ञानके प्रामाण्यकी उपत्तिके लिये
उसके इन्द्रियजन्यत्वका साधन तो एक दिग्दर्शनमात्र है। वस्तुतस्तु
विषय के अबाधित होनेसे ही कोई ज्ञान प्रामाणिक होता है। इसीलिये
इन्द्रियजन्य नहीं होनेपर भी अनुमित्यादि ज्ञान प्रमाण होता है।
(पूर्वपक्ष) "तो प्रयोजनके अनुरोधसे ही अपोह स्वीकार करना चाहिये
और गवादि शब्दोंके वाच्य गोत्व आदि धर्म नहीं होते, यह सिद्ध करना
ही यहाँ परम प्रयोजन है। क्योंकि अपोहस्वीकारद्वारा जात्यादि-
कल्पनाजालका उन्मूलन होकर वासनासहित मिथ्याज्ञानके उन्मूलनमे
समर्थ एव मुक्तिफलका प्रदान करनेवाले समाधिकी प्राप्ति हो जायगी।
अर्थात् जात्यादिक जब पारमार्थिक नहीं रहेंगे तो तुच्छ समझकर उसमें
प्रवृत्त्यादि नहीं होगी। इस प्रकार बाह्यव्यापारसे उपरत होकर मन
नैरात्म्यभावनामे समाहित होगा और मुक्त हो जायगा"
(उत्तरपक्ष) इस प्रमाणशून्य कथनमे कौन श्रद्धा करेगा? अर्थात्
अपोहका स्वीकार समाधिप्राप्तिका कारण है, यह कथन अप्रामाणिक
होनेसे अश्रद्धेय है। क्योंकि इसमें प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण नहीं
हैं। यदि कहो कि इसमे बौद्ध आगम प्रमाण है, तो शब्दरूप होनेसे
आगम भी किसी वस्तुको नहीं कह सकता यह बात तो तुमने ही अपने
शिष्योंको सिखा दी है।