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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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क्षणभङ्गवादः १६५

शब्दवासनादिकारणान्तरविध्वंसादिति तूष्णीम्भव ।
अन्तराले किमिति नोपलभ्यत इति चेत् , उपलब्धिकार-
णाभावात् ।
पिण्ड एव कुण्डे बदरवत् कुतो नोपलभ्यत इति चेत् , न,
अनन्यदेशत्वात् । भेदेन तूपलभ्यत एव, पिण्डान्तरासंसर्गिणि
पिण्डेऽनुभूयमाने तत्संसर्गितयाऽनुभवात् ।
चुका हूँ कि शब्दसङ्केतग्रह या उसकी वासना आदि अन्य कारणोंके
अभावमें भी "गौरयम्" ऐसी सविकल्पक प्रतीति गोत्वनामक अनुगत
धर्मके कारण ही होती है । इसलिये गोत्व भी वस्तुभूत ही है । अतः
अब कुछ कहनेमे मौन हो जा ।
“गोत्वजाति यदि व्यापक है तो दो पिण्डोंके मध्यदेशमे क्यों नहीं
उपलब्ध होती है ? एव यदि नित्य है तो एक पिण्डके नष्ट होनेपर
पिण्डान्तरकी उत्पत्तिके पूर्वकालमे क्यों नहीं उपलब्ध होती है ? तो
इस प्रश्नका उत्तर है कि नित्य और व्यापक होनेपर भी दो पिण्डोंके
अन्तरालमें जातिकी उपलब्धि इसलिये नहीं होती है कि उसकी अभिव्य-
ञ्जिका सास्नादिमती व्यक्तिका वहाँ अभाव है ।
यदि कहो कि -पिण्डमे यदि कोई जाति है तो जैसे कुण्डमे पृथक्-
रूपसे बदरकी उपलब्धि होती है ? वैसे पिण्डमें पृथक्रूपसे जातिकी
उपलब्धि क्यों नहीं होती है ?-तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि
पृथक् उपलब्धिका अर्थ यदि पिण्डसे भिन्न देशमे उपलब्धि हो तो
जातिका पिण्डसे अतिरिक्त कोई देश ही नहीं है । बदरका तो कुण्डसे
अतिरिक्त अपना अवयव ही देश है । एव पृथक् उपलब्धिका अर्थ
यदि पिण्डसे भिन्नरूपमे उपलब्धि हो तो पिण्डसे भिन्नरूपमें जातिकी
उपलब्धि होती ही है । क्योंकि एक पिण्ड दूसरे पिण्डका असंसर्गी
होकर भासित होता है और उससे भी सम्बद्ध वह जाति होती है ।
अर्थात् पिण्ड और जातिमे यदि अभेद होता तो उस पिण्डसे असम्बद्ध
दूसरे पिण्डमें उस जातिका अनुभव नहीं होता ।