आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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न चैवं चेतनो ग्राहयितुमपि शक्यते, स्ववाग्विरोधस्यो-
द्भटत्वात् । तथाहि—
शब्दस्य कस्यचिदपि¹ वस्तुनि मानसिद्धा
बाधा²विधिव्यवहृतिः क्वचिदस्ति नो वा ?
साथ ही इस प्रकारकी सीख किसी सचेतन व्यक्तिको नहीं दी जा
-सकती, क्योंकि उत्कट स्ववचनविरोध हो जायगा । अर्थात् "आगमो न
किञ्चिद् वक्ति" यह भी तो आगम ही है और कुछ विषयको भी कहता
है । फिर "आगम किसी वस्तुको नहीं कहता" ऐसा कहनेमें स्ववचन
विरोध क्यों न होगा ? एवं किसी शब्दद्वारा स्वलक्षणात्मक वस्तुमें
प्रामाणिक विधि और निषेधका व्यवहार होता है या नहीं ? यदि होता
है तो क्यों नहीं वे सम्पूर्ण दोष यहाँ भी हो जायेंगे ? जो तुम्हारे द्वारा
मेरे प्रति दिये गये हैं । अर्थात् अननुगत होनेसे स्वलक्षणात्मक वस्तु
शब्दसङ्केतका विषय नहीं हो सकता और शाब्दज्ञानका भी विषय नहीं
हो सकता । क्योंकि स्वलक्षणज्ञानको शब्दप्रयोगद्वारा अभिव्यक्त नहीं
किया जा सकता है ।
एवं अतद्व्यावृत्तिरूप अनुगतधर्मको मान कर भी स्वलक्षण वस्तु
शब्दका वाच्य नहीं हो सकती । क्योंकि वस्तुभूत स्वलक्षण अतद्व्या-
वृत्तिरूप अलीक (मिथ्या) धर्मका आश्रय नहीं हो सकता है, इत्यादि
दोष तुम्हारे पक्षमें भी हो जायेंगे ।
यदि कहो कि—स्वलक्षणात्मक वस्तुमें शब्दद्वारा विधि-निषेध
व्यवहार नहीं होता—तो यहाँ स्ववचनविरोध स्पष्ट है । क्योंकि उक्त
शब्दद्वारा भी वस्तुका ही व्यवहार किया गया है । इस प्रकार अवस्तुकी
जगहपर वस्तुपदका सन्निवेश कर तुम्हारे ही श्लोकको तुम्हारे विरोधमें
पढ़ा जा सकता है । जैसे—
शब्दस्य कस्यचिदपि वस्तुनि मानसिद्धा
बाधाविधिव्यवहृतिः क्वचिदस्ति नो वा ?
१ काचिदपि—इति क्वचित् पाठः ।
२ निषेधविधीत्यर्थः ।