आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ बाह्यार्थभङ्गवादः
विज्ञानवादिनि जागरूके बाह्यमेव नास्ति, कुत आत्मेति
चेत्, स तावदिदं पृष्टो व्याचष्टाम्—किं ते ग्राह्यग्राहक-
भागयोः परमार्थसतोरेवाभेदो विवक्षितः ? उताहो अभिन्न-
जातीयत्वम् ? अथ ग्राह्यांशस्यालीकत्वमिति ?
तत्र प्रथमे साध्ये यः कश्चिद्धेतुरुपादीयते सहोपलम्भ-
नियमो वा, ग्राह्यत्वं वा, प्रकाशमानत्वं वा, स व्यक्तमाभासः।
योगाचारमतखण्डन
(पूर्वपक्ष) विज्ञानवादीके सजग रहते बाह्य कोई वस्तु ही सिद्ध
नहीं है, फिर तदन्तर्गत आत्माकी सत्ता कैसे हो सकती है ? अर्थात् एक
विज्ञान ही परमार्थ सत् है, उससे भिन्न सभी बाह्य असत् हैं। तथा
नैयायिकोंका आत्मा भी ज्ञानसे भिन्न होनेसे बाह्य और असत् है।
(उत्तरपक्ष) ऐसा कहनेवाला विज्ञानवादी इन प्रश्नोंका उत्तर
कहे कि क्या उसे वस्तुभूत ग्राह्य (विषय) और ग्राहक-(ज्ञान) भागोंका
अभेद विवक्षित है ? या उन दोनोंके एक जातिका होना विवक्षित है ?
अथवा ग्राह्यांश (विषयभाग) का मिथ्यात्व अभिप्रेत है ?
इनमे यदि प्रथम साध्य अभिप्रेत हो तो उसकी सिद्धिके लिये जो
कोई हेतु दिया जायगा, वह चाहे सहोपलम्भनियम हो या ग्राह्यत्व हो
अथवा प्रकाशमानत्व हो, वह स्पष्ट ही हेत्वाभास है, हेतु नहीं है।
अर्थात् ज्ञान और विषय अभिन्न है, क्योंकि विषयके साथ ही ज्ञानका
भी नियमतः भान विज्ञानवादी मानता है। एवं घटविषय घटज्ञानसे
अभिन्न है, क्योंकि वह ग्राह्य है। तथा घटज्ञान घटसे अभिन्न है,
क्योंकि ज्ञान स्वप्रकाशक है। ये तीनों ही हेतु हेत्वाभास हैं।
क्योंकि आपके मतानुसार ग्राह्य और ग्राहकमें अभेद होनेसे परामर्श
हेतु, पक्ष, साध्य और अनुमितिमें अभेद होगा, अत इनमें परस्पर