आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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प्रतिक्षेपस्य च विरुद्धधर्माध्यासविरहप्रतिहतत्वात् । पारोक्ष्या-
पारोक्ष्यादेरसिद्धेः ।
विषयमप्रतिक्षिप्य तत्प्रामाण्यस्य प्रतिक्षेप्तुमशक्यत्वात्,
तदप्रतिक्षेपस्य च दर्शितत्वात् ।
इन्द्रियजत्वप्रतिक्षेपस्य चेन्द्रियान्वयव्यतिरेकानुविधान-
बाधितत्वात् । साक्षात्कारित्वविश्रान्ते च तदनुविधानस्या-
एव ज्ञानगत एकत्वका भी निराकरण नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ
विरुद्धधर्माध्यासका अभाव होनेसे एकत्वमें कोई बाधा नहीं है । अर्थात्
यद्यपि "तदेवेदम्" यह विज्ञान तत्पदार्थ और इदंपदार्थमे एक धर्म-
वत्त्वको सूचित करता हुआ सामान्यमें प्रमाण हो सकता है तथापि
तत्पदार्थ-ग्राहक और इदंपदार्थ ग्राहक विज्ञान एक न होकर यदि परस्पर
भिन्न भिन्न हो तो सामान्यकी सिद्धि कैसे हो सकेगी ? इस प्रकार
ज्ञानमे एकत्वके बाधसे सामान्यका भी बाध हो जाता है ।
किन्तु उक्त ज्ञानमे एकत्वका बाध तब होता यदि ज्ञानमे विरुद्ध
धर्मोंका अध्यास होता । तत्तांशमे परोक्षत्व और इदमाशमे अपरोक्षत्व
को लेकर तो ज्ञानमे विरुद्ध धर्माध्यास असिद्ध है। सस्कार या
स्मृतिके द्वारा उपनीत विशेषणांशमे भी विशिष्टज्ञान अपरोक्ष ही
होता है ।
एव, सामान्यज्ञानकी प्रामाणिकताका भी निराकरण नहीं हो सकता ।
क्योंकि सामान्य ( जाति ) रूप विषयका निराकरण किये बिना सामान्य-
ज्ञानके प्रामाण्यका निराकरण नहीं हो सकता और विषयनिराकरणकी
असम्भाव्यता पूर्वमे दिखाई जा चुकी है ।
यह भी नहीं कह सकते कि—जो ज्ञान प्रमाण होता है, वह इन्द्रिय-
जन्य होता है, सामान्यज्ञान तो इन्द्रियजन्य है नहीं। इसलिये उसमें
इन्द्रियजन्यत्वरूप व्यापकके अभावसे प्रामाण्यरूप व्याप्यका अभाव
सिद्ध हो जायगा—क्योंकि सामान्यज्ञान इन्द्रियके रहनेपर होता है और
इन्द्रियाभावकी दशामें नहीं होता। इस प्रकार चूंकि सामान्यज्ञान
इन्द्रियके साथ अन्वय और व्यतिरेकका अनुविधायी होता है, इस
कारण उसमे इन्द्रियजन्यत्वका निराकरण भी नहीं हो सकता है ।