आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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आगमस्य तत्त्वार्थपरिस्पर्शित्वविरोधे न स्वर्गापवर्गार्थिनां
प्रवृत्तिः सिध्यतीति प्रयोजनमस्मद्विचारस्यैव परं सुन्दरम् ।
तस्माच्छब्दैः किं वाच्यमित्यनुयोगे किं प्रतिभासात् ?
अथाध्यवसायात् ? यद्वा तत्त्वतः ? इति विकल्पे विकल्पस्थो-
ऽन्यापोढाकारः, अन्यापोढस्वलक्षणं, न किञ्चिदिति यत् क्रमेण
प्रत्युक्तम्—तत्र प्रथमे समयविपर्यासः, विकल्पाकारस्य समया-
विषयत्वात् ।
द्वारा कल्पनाजालके ध्वंसमे शब्दका विधिनिषेधव्यवहार नहीं होता”
ऐसा कहनेवाले तुम्हें स्ववचनविरोध होगा ही ।
मेरे मतमे तो आगमको तत्त्वार्थप्रतिपादक न माननेपर स्वर्गार्थियों
और मोक्षार्थियोंकी प्रवृत्ति ही न हो सकेगी । इसप्रकार आगमको
प्रमाण माननेका प्रयोजन मेरे विचारानुसार ही परम सुन्दर है । अर्थात्
स्वर्ग और मोक्षमे प्रवृत्तिरूप प्रयोजनसिद्धिके लिये मैं तत्त्वप्रतिपादनमे
आगमको प्रमाण मानता हूँ । किन्तु आगमको प्रमाण नहीं माननेवाले
तुम्हें अपोहसिद्धिद्वारा समाधिप्राप्तिरूप प्रयोजनकी सिद्धि कैसे हो
सकेगी ? क्योंकि अपोहमे प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण हैं नहीं और
आगमको तुम प्रमाण मानते नहीं ।
इसलिये, शब्दोंका वाच्य अर्थ क्या है ? नैयायिकद्वारा इस प्रश्नके
किये जानेपर ज्ञानश्रीने तीन प्रकारके विकल्प किये हैं कि—१ शब्दजन्य
ज्ञानका विषय क्या है ? यह प्रश्न है ? या २—शब्दजन्यप्रवृत्तिका
विषय क्या है ? यह प्रश्न है ? अथवा ३—वस्तुत शब्दका वाच्य क्या
है ? यह प्रश्न है । और तीनोंका क्रमश उत्तर देते हुए कहा है कि—
यदि प्रथम प्रश्न हो 'तो उत्तर होगा कि सविकल्पकज्ञाननिष्ठ जो अन्य-
व्यावृत्त आकार, वही शब्दजन्य ज्ञानका विषय है । यदि द्वितीय प्रश्न
हो तो उत्तर होगा कि अन्यापोढ स्वलक्षणात्मक वस्तुमें ही शब्दद्वारा
प्रवृत्ति होती है । यदि तृतीय प्रश्न हो तो उत्तर होगा कि कोई भी वस्तु
शब्दका वाच्य नहीं होती ।
किन्तु यहाँ ज्ञानश्रीके प्रथम उत्तरमे सङ्केतका विपर्यय (अभाव) हो