आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः १८१
न तावत् प्रथमः, परस्परनिषेधविधिनान्तरीयकविधि-
निषेधयोरविरोधे जगति विरोधोच्छेदप्रसङ्गात् । न चैवमस्त्वि-
त्युत्तरेऽपि निर्वृतिः, कथमप्युक्तरूपताया अनिवृत्तेः, ताव-
न्मात्रशरीरत्वाच्च विरोधस्य । तत्सिद्धेरेव च भेदसिद्धिः ।
अतो न द्वितीयोऽपि ।
यस्तु बाह्ये विरोधपरिपालनाय विशेषो दर्शितः, स तेषा-
मेवास्तु । यदि हि विरुद्धधर्माध्यासस्य भेदसाधकत्वं प्रति
विरोधी धर्मोंका सदातन विरोध हट जाता है ? अथवा विरोधके रहते
हुए भी विरोधका फल हट जाता है ? अर्थात् नीलधवलादि विरोधी
विषयोंके कारण विज्ञानमें भेद नहीं आता ?
यहाँ प्रथम पक्ष ठीक नहीं है । क्योंकि परस्परके निषेध और विधि
का व्याप्य जो परस्परका विधि और निषेध, उसमें यदि अविरोध हो जाय
तो जगत्मात्रसे विरोधका उच्छेद हो जायगा । अर्थात् नीलत्व पीतत्वा-
भावका व्याप्य होता है और पीतत्व नीलत्वाभावका व्याप्य होता है ।
इस प्रकार परस्पर अत्यन्त विरोधी नील और पीतमें भी यदि विरोध
हट जाय तो संसारसे विरोधका नाम ही हट जायगा ।
(शंका) विज्ञानवादमें सभी वस्तुके विज्ञानसे अभिन्न होनेके कारण
विरोधकी स्वतन्त्रसत्ताका उच्छेद हो जाना भी अभीष्ट ही है ।
(उत्तर) तुम्हारे इस उत्तरसे भी शान्ति नहीं मिल सकती है।
क्योंकि नीलपीतादिमें किसी भी प्रकारसे परस्परविरहव्याप्यता (विरुद्ध-
रूपता) की निवृत्ति नहीं हो सकती है। कारण, परस्पर विरह-
व्याप्यरूपता ही विरोधका स्वरूप है । एवं, नीलपीतादिके विरोधकी
सिद्धि ही नीलपीतविषयक विज्ञानके भेदकी भी सिद्धि है । इसलिये
“विरोधके रहते हुए भी विज्ञानमें भेद नहीं होता” यह द्वितीय पक्ष
भी ठीक नहीं है ।
जो तो बौद्धोंने नीलपीतादि बाह्यवस्तुमें विरोधकी रक्षाके लिये अर्थ-
क्रियाप्रतिनियम (अर्थक्रियाकी व्यवस्था) को दर्शाया है, वह अर्थक्रिया-
प्रतिनियमरूप विशेष उन्हींके यहाँ रहे। क्योंकि “विरुद्धधर्माध्यास