आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 215, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें१६६ आत्मतत्त्वविवेके
नापि द्वितीयं बाधकम्, अवयविसमानयोगक्षेमत्वात् ।
जायमानपिण्डसम्बन्धानुपपत्तिरप्रतिसंक्रमात् तत्रासत्त्वात् अनु-
त्पादाच्चेति चेत्, कथं पुनस्तत्रासत्त्वं त्वया व्यज्ञायि ? तत्र
सत्त्वे तत्रत्याकाशादेरपि गोत्वप्रसङ्गादिति चेत्, न चैतत्
पश्चादपि तत्रत्याकाशादिना सम्बध्यते । येन च पिण्डेन
सम्बध्यते, न तत्र कदापि तन्नास्ति । तत्कुतो विरोधः ।
“सङ्केतका विषय भी एक ही है” इस द्वितीय पक्षको तो अभीष्ट
होनेके कारण मूलकारने दूषित नहीं किया । क्योंकि इस पक्षमे सभी
गोव्यक्तियोमे वर्तमान एक गोत्वजातिको पूर्वपक्षीने भी सङ्केतका
विषय स्वीकार कर लिया ।
जातिके प्रति विरुद्ध धर्माध्यासरूप द्वितीय विकल्प भी बाधक नहीं
हो सकता है । क्योंकि अवयवीके समान ही इसका भी साधनप्रकार
है । अर्थात् अवयवीके सम्बन्धमें जैसे, “वह कार्त्स्न्येन अवयवोंमे
रहता है अथवा एकदेशेन” इस विकल्पका खण्डन किया गया है, वैसे
ही जातिके सम्बन्धमे भी कार्त्स्न्यैकदेशरूप विरुद्धधर्मके अध्यासका
खण्डन समझना चाहिये !
यदि कहो कि—जायमान पिण्डके साथ गोत्वका सम्बन्ध तीन प्रकार
से हो सकता है—(१) दूसरे पिण्डसे उस पिण्ड तक सङ्क्रमण द्वारा
(२) या यहाँ पहलेसे ही वर्तमान रहनेके कारण (३) अथवा उस जायमान
पिण्डके साथ साथ उत्पन्न होनेके कारण । ये तीनों ही गोत्वमें अनुप-
पन्न हैं । क्योंकि निष्क्रिय होनेसे जाति चल नहीं सकती है । एव
उस देशमें यदि पहलेसे गोत्व रहे तो उस देशको भी गौ कहने लगेंगे ।
तथा जातिके नित्य होनेसे पिण्डके साथ वह उत्पन्न भी नही कही जा
सकती है—तो तूने कैसे समझा कि गोत्व उस पिण्डस्थलमें पहलेसे
वर्तमान नही है ?
यदि कहो कि—वहाँ पहलेसे गोत्वके रहनेपर वहाँके आकाशमे भी
गोत्वप्रसङ्ग हो जायगा—तो यह गोत्व पीछे भी तो वहाके आकाशसे
सम्बद्ध नहीं होता है । अर्थात् गोत्वव्यवहारके लिये समवायसम्बन्धसे