आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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सोऽयं सास्नादिमतीषु व्यक्तिषु साधारणं रूपं न पश्यति,
पश्यति तु गोशब्दवाच्येषु दशस्विति किमत्र वक्तव्यम् । नून
रुचिरेवास्य१ लोचनमिति । शक्यमिदमितरेणापि वक्तुमिति
चेत्, शक्यम्, न तु व्यवहारस्तन्मूलो विपर्यासयितुम् ।
नन्वेतावतापि विकल्पः सिद्ध्यतु, अनुभवस्तु कथम् ?
सवस्तुकविकल्पसिद्धेरेव । कथ तस्य सवस्तुकतेति चेत्,
देखता है और गोपदके दश वाच्यार्थों में तो देखता है, यहाँ हम क्या
कहें ? निश्चित ही इसकी अपनी रुचि ही नेत्र है ।
यदि कहो कि—इस प्रकारकी बात बौद्ध भी कह सकता है ।
अर्थात् नैयायिक भी गोपदवाच्यार्थ स्वर्ग आदिमे साधारणरूप
(गोत्व) नहीं देखता है और गोपदवाच्य सास्नामती व्यक्तियोंमे तो
गोत्वको देखता है, ऐसा क्यों ?—तो बौद्ध भी भले ही ऐसा कहे
किन्तु अनुगतधर्ममूलक समानाकारव्यवहारको अन्यथा नहीं कर सकता ।
यहाँ समाधानका आशय यह है कि स्वर्गादिमे भी जो अनुगतरूपसे
गोव्यवहार होता है, उसका कारण है गोशब्दवाच्यत्वरूप अनुगत धर्म ।
कि तु सास्नादिमती व्यक्तियोंमें होनेवाले अनुगत गोव्यवहारका कारण
गोशब्दवाच्यत्वरूप अनुगत धर्म नहीं है, किन्तु गोत्व जाति ही है ।
क्योंकि जिसे गो०व्यक्तियोंमे गोशब्दवाच्यत्वकी व्युत्पत्ति नहीं है, उसे
भी उनमें अनुगतरूपसे गोप्रतीति होती है ।
यदि कहो कि—पूर्वोक्त युक्तिवादसे भी सविकल्पक ज्ञान अनुगत-
जातिविषयक भले ही सिद्ध होवे किन्तु अनुभव (निर्विकल्पक ज्ञान)
जातिविषयक कैसे सिद्ध होगा ?—तो मैं कहूँगा, कि गोत्वरूप वस्तु
विषयक सविकल्पक ही निर्विकल्पक ज्ञानके भी गोत्वविषयक होनेमें
प्रमाण है । क्योंकि कोई बाधक नहीं रहनेपर सविकल्पकज्ञानका
विषय ही निर्विकल्पका भी विषय होता है ।
यदि कहो कि—सविकल्पक ज्ञानकी सवस्तुकता ही अभी तक कहाँ
सिद्ध हुई है ? अर्थात् वह तो अलीकविषयक होता है—तो मैं बता
१ रुचिरेवेवास्य इति क्वचित् पाठ ।