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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 530 में से

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पृष्ठ 217

१६८ आत्मतत्त्वविवेके
देशमधिकृत्य च सत्त्वासत्त्वे सामान्यस्येति किं केन सङ्गतम् ?
अथाप्यनुत्पन्ने पिण्डे तस्यासत्त्वं सुलभमेव तदसत्त्वादिति हृद-
यम्, तन्न, स्वरूपसत्त्वासत्त्वयोर्द्वितीयानपेक्षत्वात् । सम्बद्ध-
त्वासम्बद्धत्वे तु द्वितीयापेक्षे । ततस्तत्रासति नास्तीति
कोऽर्थः ?
तेनासता न सम्बध्यत इति चेत्, तच्चेष्टमेतत् । पश्चात्
कथ सम्बध्यतामिति चेत् , तस्य सत्त्वात् , असम्बद्धत्वस्य तद-
सत्त्वप्रयुक्तत्वात् । ततः प्रागसन् पिण्डः पश्चात् कथमुपपद्यतां-
मिति चोद्यनिष्ठा, सा च सत्कार्यवादमनुपततीत्युक्तवान्तिः ।
पिंडसे जाति बिलग ही होती है । इस मान्यताके कारण पिंडोपलक्षित
आकाशादिदेशोंमे जातिकी सत्ता या असत्ता कहना वैयधिकरण्यके कारण
एकदम असङ्गत है ।
यदि आपका आशय हो कि—स्वरूपत जाति पिण्डोपलक्षित आका-
शादि देशोंमें भले ही रहे और जो पिण्ड उत्पन्न हो चुका है, उसमे भी
वह भले ही रहे, किन्तु जो पिंड अभी तक उत्पन्न ही नहीं है, उसमे तो
उस जातिका अभाव सुतराम् सुलभ है । क्योंकि उस जातिका आधार-
भूत पिण्ड ही नहीं है—तो यह ठीक नहीं है । क्योंकि जातिकी स्वरूपत
सत्ता या असत्ताके लिए पिंडादिरूप द्वितीयकी अपेक्षा ही नहीं है । हाँ,
सम्बद्ध या असम्बद्ध होनेके लिए तो जाति किसी द्वितीयकी अपेक्षा
रखती है । अर्थात् पिंडके उत्पन्न होनेपर उसमे जाति सम्बद्ध रहती
है, नहीं तो स्वरूपत विद्यमान भी जाति असम्बद्ध ही रहती है ।
ऐसी स्थितिमे “असत्पिण्डमे जाति नहीं है' आपके इस कथनका
क्या अर्थ है ?
यदि "उस असत् पिण्डके साथ जातिका सम्बन्ध नहीं है' यह अर्थ
लें तो वह ठीक ही है । यदि पूछें कि—पीछे उस पिण्डके साथ जाति
क्यों सम्बद्ध हो जाती है ?—तो उत्तर होगा, पिंडकी सत्ता हो जानेके
कारण । क्योंकि पिंडसे जातिकी असम्बद्धता पिंडकी असत्ताके कारण
ही रहती है । उसके बाद आपके पूर्वपक्षकी निष्ठा (पर्यवसान या