आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 212, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंन्वकरम्बितदृष्टिभिरेवोपपादनात् न त्वस्माभिः, कल्पनाकोप-
स्यानन्तप्रसरतया तत्त्वाव्यवस्थापकत्वादिति चेत्, शब्दानु-
सन्धानविरहेऽपि जायमानत्वात् ।
तथापि तद्वासनात एवेति चेत्, किमेकसङ्केतविषयाभा-
वेऽपि समानशब्दसङ्केतग्रहवासनावशादेकाकारपरामर्शस्तत्स-
द्भावे वा ? न तावदाद्यः, नानासास्नादिमद्व्यक्तिवत् स्वर्ग-
लोचनबाणाम्बुकुलिशादिष्वपि गोशब्दसङ्केतग्रहवासनावशात्
तथाविधप्रत्ययानुगमप्रसङ्गात् । इष्ट एवासावर्थ१ इति चेत्,
साधारणधर्मभानका उपपादन तो वे ही करते हैं, जिनका दृष्टि सभी
गोव्यक्तियोंमें समान गवादिशब्दके सङ्केतग्रहरूपी अन्धकारसमूहसे
कलुषित हो गयी है, हम नहीं। कारण कल्पनाकोपके विस्तारका अन्त
नही होनेसे कल्पनाके आधारतत्त्वकी व्यवस्था नहीं हो सकती है। अर्थात्
सविकल्पकज्ञानमें काल्पनिक ही भान होनेसे उसके आधारपर जा